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Srinagar News: 17 साल पुराने टेरर फंडिंग मामले में चार आरोपी बरी
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। श्रीनगर की एक विशेष एनआईए अदालत ने क्रॉस-एलओसी व्यापार के जरिए आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाने और प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा को फंडिंग करने के आरोपों से जुड़े 17 साल पुराने मामले में चार व्यक्तियों को बरी कर दिया है।
एनआईए अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश मंजीत राय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस फैसले के तहत मुशफीक अहमद लोन, विपिन कुमार शर्मा, संजीव कुमार टंडन और जहूर अहमद डार को दोषमुक्त करार दिया गया, जबकि एक अन्य आरोपी सूरज प्रकाश बड्याल की नवंबर 2024 में मृत्यु होने के कारण उनके खिलाफ कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी।
यह पूरा मामला साल 2009 में श्रीनगर के सदर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा था।
फैसले के दौरान अदालत ने जांच और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में कई गंभीर कमियों को उजागर किया। कोर्ट ने पाया कि मामले में पैसे के कथित लेन-देन का कोई भी चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था और न ही बैंक खातों, बही-खातों या व्यापारिक रिकॉर्ड के माध्यम से किसी मनी ट्रेल की पुष्टि की जा सकी। इसके अलावा, गिरफ्तारी और बरामदगी के समय किसी भी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया गया था।
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पुलिस की ओर जब्त की गई 13.85 लाख की नकदी को न तो सील किया गया था और न ही जब्ती दस्तावेजों में करेंसी नोटों के नंबर दर्ज थे। यहां तक कि कथित तौर पर बरामद किए गए ग्रेनेड को भी उचित तरीके से सील नहीं किया गया और न ही उसकी कोई फोरेंसिक जांच कराई गई।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि गिरफ्तारी और बरामदगी की तारीखों, स्थानों और परिस्थितियों को लेकर अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था। खुद जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि क्रॉस-एलओसी व्यापार एक विनियमित बार्टर प्रणाली थी और आरोपियों के व्यापारिक खातों की ऐसी कोई जांच नहीं की गई थी जिससे यह साबित हो सके कि बरामद धन अघोषित था।
साथ ही, यूएपीए के तहत आवश्यक अनिवार्य वैधानिक मंजूरी भी स्थापित नहीं की जा सकी। इन सभी खामियों को देखते हुए अदालत ने चारों जीवित आरोपियों को सभी आरोपों से बरी करते हुए जब्त की गई 13.85 लाख रुपये की रकम संबंधित व्यक्तियों या उनके कानूनी वारिसों को लौटाने का आदेश दिया।
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श्रीनगर। श्रीनगर की एक विशेष एनआईए अदालत ने क्रॉस-एलओसी व्यापार के जरिए आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाने और प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा को फंडिंग करने के आरोपों से जुड़े 17 साल पुराने मामले में चार व्यक्तियों को बरी कर दिया है।
एनआईए अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश मंजीत राय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस फैसले के तहत मुशफीक अहमद लोन, विपिन कुमार शर्मा, संजीव कुमार टंडन और जहूर अहमद डार को दोषमुक्त करार दिया गया, जबकि एक अन्य आरोपी सूरज प्रकाश बड्याल की नवंबर 2024 में मृत्यु होने के कारण उनके खिलाफ कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी।
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यह पूरा मामला साल 2009 में श्रीनगर के सदर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा था।
फैसले के दौरान अदालत ने जांच और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में कई गंभीर कमियों को उजागर किया। कोर्ट ने पाया कि मामले में पैसे के कथित लेन-देन का कोई भी चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था और न ही बैंक खातों, बही-खातों या व्यापारिक रिकॉर्ड के माध्यम से किसी मनी ट्रेल की पुष्टि की जा सकी। इसके अलावा, गिरफ्तारी और बरामदगी के समय किसी भी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया गया था।
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पुलिस की ओर जब्त की गई 13.85 लाख की नकदी को न तो सील किया गया था और न ही जब्ती दस्तावेजों में करेंसी नोटों के नंबर दर्ज थे। यहां तक कि कथित तौर पर बरामद किए गए ग्रेनेड को भी उचित तरीके से सील नहीं किया गया और न ही उसकी कोई फोरेंसिक जांच कराई गई।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि गिरफ्तारी और बरामदगी की तारीखों, स्थानों और परिस्थितियों को लेकर अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था। खुद जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि क्रॉस-एलओसी व्यापार एक विनियमित बार्टर प्रणाली थी और आरोपियों के व्यापारिक खातों की ऐसी कोई जांच नहीं की गई थी जिससे यह साबित हो सके कि बरामद धन अघोषित था।
साथ ही, यूएपीए के तहत आवश्यक अनिवार्य वैधानिक मंजूरी भी स्थापित नहीं की जा सकी। इन सभी खामियों को देखते हुए अदालत ने चारों जीवित आरोपियों को सभी आरोपों से बरी करते हुए जब्त की गई 13.85 लाख रुपये की रकम संबंधित व्यक्तियों या उनके कानूनी वारिसों को लौटाने का आदेश दिया।