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दो वयस्कों का शादी करने का फैसला उनका निजी अधिकार
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में चुनते हैं, तो यह उनकी निजी पसंद का परिचायक होता है। उनका फैसला किसी वर्ग और समूह की सोच के आगे झुक नहीं सकता।
न्यायमूर्ति ताशी रबस्तन की पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करने वाले एक जोड़े की याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित पुलिस को उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा जब दो वयस्क आपसी सहमति से एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में चुनते हैं, तो यह उनकी पसंद की अभिव्यक्ति है जिसे संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मान्यता प्राप्त है। इस तरह के अधिकार को संवैधानिक कानून की मंजूरी है और एक बार इसे मान्यता मिलने के बाद इस अधिकार को संरक्षित करने की आवश्यकता है। यह फैसला किसी वर्ग के सम्मान या समूह की सोच की अवधारणा के आगे नहीं झुक सकता है। अदालत ने आगे कहा कि दो वयस्क व्यक्तियों के विवाह करने के लिए सहमत होने के बाद परिवार या समुदाय या कबीले की सहमति आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने कहा उनकी सहमति को पवित्रता के साथ प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्वतंत्रता की अवधारणा को सांविधानिक संवेदनशीलता, संरक्षण और मूल्यों की कसौटी पर तौला और परखा जाना चाहिए।
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अदालत ने कहा यह सांविधानिक न्यायालयों का दायित्व है कि प्रहरी के रूप में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना उनका धर्म है। यह स्पष्ट है कि सम्मान और पसंद के बिना जीवन और स्वतंत्रता एक खोखलापन है। किसी व्यक्ति की पसंद गरिमा का एक अलग हिस्सा है। अदालत ने कहा जहां पसंद का क्षरण होता है, वहां गरिमा के बारे में नहीं सोचा जा सकता है और किसी को भी उक्त पसंद के फलने-फूलने में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसा सोचना भी मुश्किल है।
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वयस्क अपना रास्ता खुद चुनते हैं
अदालत ने कहा- जब दो वयस्क अपनी मर्जी से शादी करते हैं तो वे अपना रास्ता खुद चुनते हैं। वे अपने रिश्ते को पूरा करते हैं। उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि यहां उनका लक्ष्य है और उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। उक्त अधिकार का कोई भी उल्लंघन सांविधानिक उल्लंघन है।
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न्यायमूर्ति ताशी रबस्तन की पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करने वाले एक जोड़े की याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित पुलिस को उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया।
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कोर्ट ने कहा जब दो वयस्क आपसी सहमति से एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में चुनते हैं, तो यह उनकी पसंद की अभिव्यक्ति है जिसे संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मान्यता प्राप्त है। इस तरह के अधिकार को संवैधानिक कानून की मंजूरी है और एक बार इसे मान्यता मिलने के बाद इस अधिकार को संरक्षित करने की आवश्यकता है। यह फैसला किसी वर्ग के सम्मान या समूह की सोच की अवधारणा के आगे नहीं झुक सकता है। अदालत ने आगे कहा कि दो वयस्क व्यक्तियों के विवाह करने के लिए सहमत होने के बाद परिवार या समुदाय या कबीले की सहमति आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने कहा उनकी सहमति को पवित्रता के साथ प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्वतंत्रता की अवधारणा को सांविधानिक संवेदनशीलता, संरक्षण और मूल्यों की कसौटी पर तौला और परखा जाना चाहिए।
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अदालत ने कहा यह सांविधानिक न्यायालयों का दायित्व है कि प्रहरी के रूप में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना उनका धर्म है। यह स्पष्ट है कि सम्मान और पसंद के बिना जीवन और स्वतंत्रता एक खोखलापन है। किसी व्यक्ति की पसंद गरिमा का एक अलग हिस्सा है। अदालत ने कहा जहां पसंद का क्षरण होता है, वहां गरिमा के बारे में नहीं सोचा जा सकता है और किसी को भी उक्त पसंद के फलने-फूलने में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसा सोचना भी मुश्किल है।
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वयस्क अपना रास्ता खुद चुनते हैं
अदालत ने कहा- जब दो वयस्क अपनी मर्जी से शादी करते हैं तो वे अपना रास्ता खुद चुनते हैं। वे अपने रिश्ते को पूरा करते हैं। उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि यहां उनका लक्ष्य है और उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। उक्त अधिकार का कोई भी उल्लंघन सांविधानिक उल्लंघन है।