{"_id":"5db9dd138ebc3e01711f90e4","slug":"toll-plaza-kathua-news-jmu1962082170","type":"story","status":"publish","title_hn":"लखनपुर में आरटीओ दफ्तर के पास स्थापित होगा टोल प्लाजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लखनपुर में आरटीओ दफ्तर के पास स्थापित होगा टोल प्लाजा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कठुआ। केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही लखनपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की ओर से जम्मू-पठानकोट सेक्शन के बीच दूसरे टोल प्लाजा की कवायद तेज हो गई है। हाईवे प्राधिकरण की ओर से वैकल्पिक तौर पर आरटीओ दफ्तर के नजदीक टोल प्लाजा के लिए जगह चिह्नित की है।
केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद प्रशासनिक बैठक में इस पर फैसला लिया जा सकता है। ऐसे में नवंबर माह के अंत तक लखनपुर में नेशनल हाईवे टोल को भी सक्रिय करने की कोशिश जारी है। कुछ साल से हाईवे प्राधिकरण लगातार जम्मू-कश्मीर सरकार से आबकारी विभाग के लखनपुर स्थित टोल प्लाजा के अधिग्रहण को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है। मगर सरकार की ओर से पहल नहीं होने पर लखनपुर में प्रस्तावित नेशनल हाईवे का टोल शुरू नहीं हो पाया है। हाईवे प्राधिकरण के अधिकारियों की मानें तो केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यदि सरकार लखनपुर में आबकारी टोल को हटाती है तो नेशनल हाईवे का टोल भी जल्द स्थापित हो जाएगा। यहां एलएमवी वाहनों के लिए 55 रुपये एक तरफ से निर्धारित किए जा चुके हैं जबकि टोल को लेकर निविदा जुलाई माह से ही पूरी की जा चुकी है। ऐसा तब है जबकि सरोर में स्थापित किए गए टोल प्लाजा को लेकर लगातार विरोध सामने आ रहे हैं। इससे पहले वर्ष 2013 में चड़वाल से सटे सेहस्वां में टोल पोस्ट स्थापित किया था, जिसे लोगों के विरोध के बाद बंद कर दिया गया था। बीते वर्षों में टोल पोस्ट को सेहस्वां की जगह लखनपुर में स्थापित किए जाने को लेकर निर्णय हो चुका है।
आबकारी कर खत्म हुआ स्थानीय उद्योग को भी खतरा
कायदे से देखा जाए तो केंद्र शासित प्रदेशों में राज्य के अलग से अपने कर का कोई प्रावधान नहीं है। मगर केंद्र शासित प्रदेश बनने जा रहे जम्मू कश्मीर में आबकारी कर को लेकर सरकार की ओर से कोई भी निर्देश जारी नहीं होने से असमंजस की स्थिति है। आबकारी विभाग का यह टोल प्लाजा न सिर्फ सैकड़ों लोगों के रोजगार का जरिया है बल्कि राज्य में मंदी की मार झेल रहे उद्योग को भी देश के अन्य हिस्सों से मुकाबले में बढ़त देता रहा है। जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा मिलने के साथ ही यहां की सरकारों ने दशकों से अपनी आय के स्त्रोत को बढ़ाने के लिए जम्मू कश्मीर में दाखिल होने वाले वाहनों से कर वसूलना शुरू कर दिया। राज्य से होने वाले आयात निर्यात पर करोड़ों का कर हर साल वसूला जाता रहा है। लेकिन अब समय के साथ हुए बदलाव में हालात ऐसे बन चुके हैं कि आबकारी विभाग का लखनपुर टोल स्थानीय उद्योग को बचाए हुए है।
विज्ञापन
औद्योगिक इकाइयां होंगी प्रभावित
औद्योगिक एसोसिएशन कठुआ के अध्यक्ष देविंद्र वर्मा ने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद उद्योग पहले ही घाटे की मार झेल रहा है। सीजीएसटी और एसजीएसटी उद्योग को हासिल नहीं हो पा रहा है। ऐसे में वर्किंग कैपिटल इसी में फंस चुकी है। यदि अब आबकारी टोल हटाने का सरकार फैसला लेती है तो इससे जम्मू कश्मीर में चलने वाली औद्योगिक इकाइयां बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगी। आसपास के राज्यों से आने वाला सीमेंट, सरिया आदि उत्पाद जम्मू कश्मीर के मुकाबले सस्ता होगा। ऐसे में यहां कि इकाइयों प्रभावित होंगी, जिसका सीधा असर कारोबार के साथ-साथ रोजगार पर भी पड़ेगा।
आबकारी विभाग के लखनपुर पोस्ट से बीते दस वर्षों में जुुटाया गया राजस्व
वर्ष राजस्व (करोड़ों)
1999-2000 92.542
2000-2001 103.77
2001-2002 118.09
2002-2003 123.61
2003-2004 138.15
2004-2005 158.23
2005-2006 173.50
2006-2007 178.83
2007-2008 206.60
2008-2009 188.63
2009-2010 208.92
2010-2011 249.82
2011-2012 306.23
2012-2013 356.11
2013-2014 404.76
2014-2015 415.61
2015-2016 495.58
2016-2017 568.96
2017-2018 644.64
2018-2019 740
2019-2020 800 (लक्ष्य)
विज्ञापन
केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद प्रशासनिक बैठक में इस पर फैसला लिया जा सकता है। ऐसे में नवंबर माह के अंत तक लखनपुर में नेशनल हाईवे टोल को भी सक्रिय करने की कोशिश जारी है। कुछ साल से हाईवे प्राधिकरण लगातार जम्मू-कश्मीर सरकार से आबकारी विभाग के लखनपुर स्थित टोल प्लाजा के अधिग्रहण को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है। मगर सरकार की ओर से पहल नहीं होने पर लखनपुर में प्रस्तावित नेशनल हाईवे का टोल शुरू नहीं हो पाया है। हाईवे प्राधिकरण के अधिकारियों की मानें तो केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यदि सरकार लखनपुर में आबकारी टोल को हटाती है तो नेशनल हाईवे का टोल भी जल्द स्थापित हो जाएगा। यहां एलएमवी वाहनों के लिए 55 रुपये एक तरफ से निर्धारित किए जा चुके हैं जबकि टोल को लेकर निविदा जुलाई माह से ही पूरी की जा चुकी है। ऐसा तब है जबकि सरोर में स्थापित किए गए टोल प्लाजा को लेकर लगातार विरोध सामने आ रहे हैं। इससे पहले वर्ष 2013 में चड़वाल से सटे सेहस्वां में टोल पोस्ट स्थापित किया था, जिसे लोगों के विरोध के बाद बंद कर दिया गया था। बीते वर्षों में टोल पोस्ट को सेहस्वां की जगह लखनपुर में स्थापित किए जाने को लेकर निर्णय हो चुका है।
विज्ञापन
आबकारी कर खत्म हुआ स्थानीय उद्योग को भी खतरा
कायदे से देखा जाए तो केंद्र शासित प्रदेशों में राज्य के अलग से अपने कर का कोई प्रावधान नहीं है। मगर केंद्र शासित प्रदेश बनने जा रहे जम्मू कश्मीर में आबकारी कर को लेकर सरकार की ओर से कोई भी निर्देश जारी नहीं होने से असमंजस की स्थिति है। आबकारी विभाग का यह टोल प्लाजा न सिर्फ सैकड़ों लोगों के रोजगार का जरिया है बल्कि राज्य में मंदी की मार झेल रहे उद्योग को भी देश के अन्य हिस्सों से मुकाबले में बढ़त देता रहा है। जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा मिलने के साथ ही यहां की सरकारों ने दशकों से अपनी आय के स्त्रोत को बढ़ाने के लिए जम्मू कश्मीर में दाखिल होने वाले वाहनों से कर वसूलना शुरू कर दिया। राज्य से होने वाले आयात निर्यात पर करोड़ों का कर हर साल वसूला जाता रहा है। लेकिन अब समय के साथ हुए बदलाव में हालात ऐसे बन चुके हैं कि आबकारी विभाग का लखनपुर टोल स्थानीय उद्योग को बचाए हुए है।
विज्ञापन
औद्योगिक इकाइयां होंगी प्रभावित
औद्योगिक एसोसिएशन कठुआ के अध्यक्ष देविंद्र वर्मा ने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद उद्योग पहले ही घाटे की मार झेल रहा है। सीजीएसटी और एसजीएसटी उद्योग को हासिल नहीं हो पा रहा है। ऐसे में वर्किंग कैपिटल इसी में फंस चुकी है। यदि अब आबकारी टोल हटाने का सरकार फैसला लेती है तो इससे जम्मू कश्मीर में चलने वाली औद्योगिक इकाइयां बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगी। आसपास के राज्यों से आने वाला सीमेंट, सरिया आदि उत्पाद जम्मू कश्मीर के मुकाबले सस्ता होगा। ऐसे में यहां कि इकाइयों प्रभावित होंगी, जिसका सीधा असर कारोबार के साथ-साथ रोजगार पर भी पड़ेगा।
आबकारी विभाग के लखनपुर पोस्ट से बीते दस वर्षों में जुुटाया गया राजस्व
वर्ष राजस्व (करोड़ों)
1999-2000 92.542
2000-2001 103.77
2001-2002 118.09
2002-2003 123.61
2003-2004 138.15
2004-2005 158.23
2005-2006 173.50
2006-2007 178.83
2007-2008 206.60
2008-2009 188.63
2009-2010 208.92
2010-2011 249.82
2011-2012 306.23
2012-2013 356.11
2013-2014 404.76
2014-2015 415.61
2015-2016 495.58
2016-2017 568.96
2017-2018 644.64
2018-2019 740
2019-2020 800 (लक्ष्य)