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Kathua News: ट्रेन पहले पहुंची, सुविधाओं में पिछड़ा कठुआ
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सामान सीढि़यों से ले जाने से बचने के लिए मजबूरी में रेलवे ट्रैक पार करते लोग।
- फोटो : सामान सीढि़यों से ले जाने से बचने के लिए मजबूरी में रेलवे ट्रैक पार करते लोग।
कठुआ। 1962 में जम्मू कश्मीर के पहले रेलवे स्टेशन कठुआ तक ट्रैक पहुंचने के छह दशक बाद भी यह स्टेशन सुविधाओं से वंचित है। यह प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक हब का भी रेलवे स्टेशन है, इसलिए यहां प्रतिदिन तीन हजार के लगभग यात्रियों का आवागमन रहता है।
डेढ़ दर्जन रेलगाड़ियों के स्टॉपेज के बावजूद यहां से दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों को जाने वाली ट्रेनों का इंतजार करने वाले यात्रियों के पास सिर ढकने के लिए छत नहीं है। कठुआ रेलवे स्टेशन के हाल के दशकों में विकसित हुए प्लेटफार्म नंबर दो पर छोटे-छोटे शेड बनाए गए हैं, जो बारिश और गर्मी में किसी काम नहीं आते हैं। इसके अलावा यात्रियों को बारिश के दिनों में भी प्लेटफार्म को जोड़ने वाले फुटब्रिज के नीचे शरण लेनी पड़ती है। सर्दी और कोहरे के इन दिनों में जहां ज्यादातर ट्रेनाें का प्रदेश से बाहर सफर शाम से देर रात तक चलता है, वहीं यात्रियों को खुले प्लेटफार्म में इंतजार करना पड़ता है। महिला यात्रियों के लिए तो प्लेटफार्म पर शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है।
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बुजुर्ग सीढि़यां चढ़ने और उतरने काे मजबूर, एक एस्केलेटर तक नहीं
प्रतिदिन हजारों की संख्या में यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने वाले कठुआ रेलवे स्टेशन पर एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म तक जाने के लिए एक मात्र ओवरब्रिज की ही सुविधा है। इसका उपयोग करना बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए कई बार एवरेस्ट फतेह करने जैसा हो जाता है। मौजूदा समय के साथ आधुनिक हो रही भारतीय रेल में यात्री सुविधा के लिए एस्केलेटर की सुविधा की जरूरत महसूस की जाती है।
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यात्रियों को सामान कंधे पर रखकर पार करना पड़ता है प्लेटफार्म
जम्मू कश्मीर के इस पहले रेलवे स्टेशन पर बने दो प्लेटफार्म पर न तो कुली की व्यवस्था है और न ही सुविधाजनक आवागमन का कोई प्रावधान। ऐसे में यात्रियों को अपना सामान कंधे पर रखकर दोनों प्लेटफार्म की दूरी को तय करना पड़ता है। वहीं कई बार तो यात्री इस परेशानी से बचने के लिए मजबूरन रेलवे ट्रैक को पार करते हैं, जो कि दुर्घटना का कारण भी बन सकता है।
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खानापूर्ति मात्र है वेटिंग रूम, वीआईपी के लिए है व्यवस्था
रेलवे स्टेशन पर आने के बाद अगर किसी कारण से ट्रेन लेट हो तो सुविधाजनक वेटिंग रूम भी नहीं है। सबसे ज्यादा परेशानी जिले के पहाड़ी इलाकों से आने वाले यात्रियों को उठानी पड़ती है क्योंकि रात के समय आने वाली उनकी ट्रेन का इंतजार करने के लिए शाम को ही रेलवे स्टेशन आना उनकी मजबूरी है। सामान्य मौसम में तो वे खुले आसमान के तले भी अपना समय व्यतीत कर लेते हैं लेकिन ठंड और बारिश जैसे हालात में इनका दरबदर होता तय है।
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दिव्यांगों को स्टेशन लांघकर ट्रैक पार करने की है व्यवस्था
सबसे बुरी स्थिति का सामना दिव्यांगों को उठाना पड़ता है क्योंकि उनके लिए एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म तक जाने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, वह पूरा प्लेटफार्म पार करने के बाद है। इसका यात्रा करने आने वाले लोगों को पता भी नहीं चल पाता। ऐसे में उन्हें लोगों का सहारा लेकर ही जैसे-तैसे दूसरे प्लेटफार्म तक पहुंचना पड़ता है।
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डेढ़ दर्जन रेलगाड़ियों के स्टॉपेज के बावजूद यहां से दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों को जाने वाली ट्रेनों का इंतजार करने वाले यात्रियों के पास सिर ढकने के लिए छत नहीं है। कठुआ रेलवे स्टेशन के हाल के दशकों में विकसित हुए प्लेटफार्म नंबर दो पर छोटे-छोटे शेड बनाए गए हैं, जो बारिश और गर्मी में किसी काम नहीं आते हैं। इसके अलावा यात्रियों को बारिश के दिनों में भी प्लेटफार्म को जोड़ने वाले फुटब्रिज के नीचे शरण लेनी पड़ती है। सर्दी और कोहरे के इन दिनों में जहां ज्यादातर ट्रेनाें का प्रदेश से बाहर सफर शाम से देर रात तक चलता है, वहीं यात्रियों को खुले प्लेटफार्म में इंतजार करना पड़ता है। महिला यात्रियों के लिए तो प्लेटफार्म पर शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है।
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बुजुर्ग सीढि़यां चढ़ने और उतरने काे मजबूर, एक एस्केलेटर तक नहीं
प्रतिदिन हजारों की संख्या में यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने वाले कठुआ रेलवे स्टेशन पर एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म तक जाने के लिए एक मात्र ओवरब्रिज की ही सुविधा है। इसका उपयोग करना बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए कई बार एवरेस्ट फतेह करने जैसा हो जाता है। मौजूदा समय के साथ आधुनिक हो रही भारतीय रेल में यात्री सुविधा के लिए एस्केलेटर की सुविधा की जरूरत महसूस की जाती है।
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यात्रियों को सामान कंधे पर रखकर पार करना पड़ता है प्लेटफार्म
जम्मू कश्मीर के इस पहले रेलवे स्टेशन पर बने दो प्लेटफार्म पर न तो कुली की व्यवस्था है और न ही सुविधाजनक आवागमन का कोई प्रावधान। ऐसे में यात्रियों को अपना सामान कंधे पर रखकर दोनों प्लेटफार्म की दूरी को तय करना पड़ता है। वहीं कई बार तो यात्री इस परेशानी से बचने के लिए मजबूरन रेलवे ट्रैक को पार करते हैं, जो कि दुर्घटना का कारण भी बन सकता है।
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खानापूर्ति मात्र है वेटिंग रूम, वीआईपी के लिए है व्यवस्था
रेलवे स्टेशन पर आने के बाद अगर किसी कारण से ट्रेन लेट हो तो सुविधाजनक वेटिंग रूम भी नहीं है। सबसे ज्यादा परेशानी जिले के पहाड़ी इलाकों से आने वाले यात्रियों को उठानी पड़ती है क्योंकि रात के समय आने वाली उनकी ट्रेन का इंतजार करने के लिए शाम को ही रेलवे स्टेशन आना उनकी मजबूरी है। सामान्य मौसम में तो वे खुले आसमान के तले भी अपना समय व्यतीत कर लेते हैं लेकिन ठंड और बारिश जैसे हालात में इनका दरबदर होता तय है।
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दिव्यांगों को स्टेशन लांघकर ट्रैक पार करने की है व्यवस्था
सबसे बुरी स्थिति का सामना दिव्यांगों को उठाना पड़ता है क्योंकि उनके लिए एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म तक जाने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, वह पूरा प्लेटफार्म पार करने के बाद है। इसका यात्रा करने आने वाले लोगों को पता भी नहीं चल पाता। ऐसे में उन्हें लोगों का सहारा लेकर ही जैसे-तैसे दूसरे प्लेटफार्म तक पहुंचना पड़ता है।