{"_id":"62dd9ba8635512375005a07a","slug":"problem-kathua-news-indusry-kathua-news-jmu264606146","type":"story","status":"publish","title_hn":"औद्योगिक इकाइयों से निकलता जहरीला धुआं घोंट रहा शहर का दम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
औद्योगिक इकाइयों से निकलता जहरीला धुआं घोंट रहा शहर का दम
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कठुआ। सुबह और शाम की सैर डॉक्टरों के अनुसार सेहत के लिए लाभदायक होती है, लेकिन कठुआ शहर और आसपास इलाकों में यह सलाह किसी काम नहीं आ रही। शाम ढलते ही कठुआ शहर से सटे औद्योगिक क्षेत्र में इकाइयों की चिमनियां जहरीला धुआं उगल रही हैं। हटली मोड़ से लेकर सावन चक तक का इलाका हो या फिर गोविंदसर का, दम घोंटने वाला माहौल बना रहता है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग से प्राप्त सूत्रों के अनुसार कठुआ औद्योगिक क्षेत्र में 150 माइक्रोग्राम से भी अधिक तक रेस्पिरेबल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (आरएसपीएम) की मात्रा के आंकड़े मिले हैं। प्रदूषण मानकों के अनुसार हवा में आरएसपीएम या पीएम 10 की मात्रा 100 माइक्रोग्राम से कम ही रहनी चाहिए, लेकिन यह लगातार बढ़ती जा रही है।
हैरत की बात है कि इतना सब होने के बाद भी प्रदूषण नियंत्रण विभाग के मॉनीटरिंग डिवाइस न तो इस प्रदूषण के पैमाने पर खतरे की घंटी बजाते हैं और न ही अधिकारियों को इसकी परवाह है। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाने वाली संस्थाओं की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है।
शहर की परिधि से सटकर बने कठुआ औद्योगिक क्षेत्र में सभी नियमों को ताक पर रखकर स्थापित की गई इकाइयां जहर उगल रही हैं। शहर के तारानगर, सावन चक, हटली मोड़, गोविंदसर, खरोट तक के इलाके में इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषण की जहरीली हवा लोगों की जान को आफत में डालने लगी है। सप्ताहांत के दौरान तो प्रशासन का निगरानी तंत्र पूरी तरह से फेल नजर आता है। जब इन इकाइयों से विषैला धुआं निकलकर शहर की फिजा को जहरीला कर देता है।
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रात में प्रदूषण मॉनीटरिंग का कोई प्रबंध नहीं
यहां कहने को तो प्रदूषण नियंत्रण विभाग है, लेकिन कठुआ की बात करें तो बीते दो दशक में प्रदूषण का पैमाना नियंत्रण से बाहर होता चला गया है। रेलवे मार्ग पर आने जाने वाले लोग इसे रोज महसूस करते हैं। आंखों में गिरने वाले कण से हवा में प्रदूषण की मात्रा का साफ अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारी दिन के समय कभी-कभार इकाइयों में जांच के नाम पर औपचारिकता को पूरा कर लेते हैं, लेकिन रात को कोई भी ड्यूटी रोस्टर नहीं है। इसी का फायदा इकाइयों वाले उठाते हैं। दिन में इकाइयों की चिमनियां ठंडी रहती हैं, लेकिन रात को जहरीले धुएं के साथ-साथ दूषित जल को भी खुले में फेंक दिया जाता है। 522 कनाल में बने कठुआ औद्योगिक क्षेत्र को 1988 में स्थापित किया गया था। वर्तमान में 70 से अधिक यूनिट सक्रिय हैं। पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए इन इकाइयों का योगदान सिफर है।
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दमे, चरम रोम और अन्य
बीमारियों से जूझ रहे लोग
जनसेवा संस्थान के अध्यक्ष और गोविंदसर निवासी शशि शर्मा ने बताया कि प्रदूषण के खिलाफ वह लंबे समय से अभियान चला रहे हैं। इलाके में कई बच्चे अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हैं। हालात यह हैं कि गांव में ज्यादातर लोग दमे, चरम रोम और अन्य घातक बीमारियों से जूझ रहे हैं। रात होते ही औद्योगिक इकाइयों से जहरीला धुंआ निकलता है, जो लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
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औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषण को मापने के लिए यंत्र लगाए गए हैं, जो रूटीन में प्रदूषण के विभिन्न मानकों पर नजर रखे हुए हैं। कठुआ में आरएसपीएम 140 तक पाया जाता रहा है, जो सामान्य से कुछ अधिक है। शिकायत मिलने पर विभाग समय-समय पर औद्योगिक इकाइयों को नोटिस जारी करता है, ताकि सुधार करवाया जा सके।
सतपाल पखरू, क्षेत्रीय निदेशक, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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हैरत की बात है कि इतना सब होने के बाद भी प्रदूषण नियंत्रण विभाग के मॉनीटरिंग डिवाइस न तो इस प्रदूषण के पैमाने पर खतरे की घंटी बजाते हैं और न ही अधिकारियों को इसकी परवाह है। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाने वाली संस्थाओं की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है।
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शहर की परिधि से सटकर बने कठुआ औद्योगिक क्षेत्र में सभी नियमों को ताक पर रखकर स्थापित की गई इकाइयां जहर उगल रही हैं। शहर के तारानगर, सावन चक, हटली मोड़, गोविंदसर, खरोट तक के इलाके में इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषण की जहरीली हवा लोगों की जान को आफत में डालने लगी है। सप्ताहांत के दौरान तो प्रशासन का निगरानी तंत्र पूरी तरह से फेल नजर आता है। जब इन इकाइयों से विषैला धुआं निकलकर शहर की फिजा को जहरीला कर देता है।
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रात में प्रदूषण मॉनीटरिंग का कोई प्रबंध नहीं
यहां कहने को तो प्रदूषण नियंत्रण विभाग है, लेकिन कठुआ की बात करें तो बीते दो दशक में प्रदूषण का पैमाना नियंत्रण से बाहर होता चला गया है। रेलवे मार्ग पर आने जाने वाले लोग इसे रोज महसूस करते हैं। आंखों में गिरने वाले कण से हवा में प्रदूषण की मात्रा का साफ अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारी दिन के समय कभी-कभार इकाइयों में जांच के नाम पर औपचारिकता को पूरा कर लेते हैं, लेकिन रात को कोई भी ड्यूटी रोस्टर नहीं है। इसी का फायदा इकाइयों वाले उठाते हैं। दिन में इकाइयों की चिमनियां ठंडी रहती हैं, लेकिन रात को जहरीले धुएं के साथ-साथ दूषित जल को भी खुले में फेंक दिया जाता है। 522 कनाल में बने कठुआ औद्योगिक क्षेत्र को 1988 में स्थापित किया गया था। वर्तमान में 70 से अधिक यूनिट सक्रिय हैं। पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए इन इकाइयों का योगदान सिफर है।
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दमे, चरम रोम और अन्य
बीमारियों से जूझ रहे लोग
जनसेवा संस्थान के अध्यक्ष और गोविंदसर निवासी शशि शर्मा ने बताया कि प्रदूषण के खिलाफ वह लंबे समय से अभियान चला रहे हैं। इलाके में कई बच्चे अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हैं। हालात यह हैं कि गांव में ज्यादातर लोग दमे, चरम रोम और अन्य घातक बीमारियों से जूझ रहे हैं। रात होते ही औद्योगिक इकाइयों से जहरीला धुंआ निकलता है, जो लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
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औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषण को मापने के लिए यंत्र लगाए गए हैं, जो रूटीन में प्रदूषण के विभिन्न मानकों पर नजर रखे हुए हैं। कठुआ में आरएसपीएम 140 तक पाया जाता रहा है, जो सामान्य से कुछ अधिक है। शिकायत मिलने पर विभाग समय-समय पर औद्योगिक इकाइयों को नोटिस जारी करता है, ताकि सुधार करवाया जा सके।
सतपाल पखरू, क्षेत्रीय निदेशक, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड