{"_id":"68cb128e9ab3f2ebab0a4a6a","slug":"kathua-news-bamboo-business-news-kathua-news-c-201-1-knt1008-124188-2025-09-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kathua News: बांस से बने उत्पाद बदलेंगे जम्मू कश्मीर के कारीगरों की तकदीर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kathua News: बांस से बने उत्पाद बदलेंगे जम्मू कश्मीर के कारीगरों की तकदीर
Thu, 18 Sep 2025 01:27 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Thu, 18 Sep 2025 01:27 AM IST
विज्ञापन
बांस से उत्पाद तैयार करते कारीगर फाइल फोटो
सल्लन और बिलावर में सीएफसी व शोरूम बनकर तैयार, 100 कारीगरों ने लिया प्रशिक्षण
कठुआ। जम्मू-कश्मीर में बांस जल्द कारीगरों की तकदीर बदलने जा रहा है। सिर्फ कारीगर ही नहीं सब सही रहा तो प्रदेश में तैयार होने वाले बांस के उत्पादों को देश व दुनिया में भी पहचान मिलना तय है। बांस से बनने वाली अगरबत्तियां जल्द भारत को महकाएंगी।
हीरानगर के सल्लन में बांस से तैयार फर्नीचर घरों की शान को बढ़ाएगा। बिलावर में हथकरघा और हस्तशिल्प विभाग ने इसके लिए जिले के करीब 100 कारीगरों को प्रशिक्षण दिया है। बिलावर व सल्लन में कॉमन फेसिलिटेशन सेंटर (सीएफसी) व शोरूम बनकर तैयार हो गए हैं। खास बात यह है कि जिला कठुआ की कंडी बेल्ट में प्रचूर मात्रा में पाए जाने वाले व अब तक बेकार पड़े बांस का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर संभव हो जाएगा।
राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत कारीगरों को जमीनों पर बांस लगाने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वहीं, कारीगर इसी बांस को बिना कोई राशि चुकाए उत्पादन में इस्तेमाल भी कर सकेंगे। केंद्र सरकार के एमएसएमई मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में 1490 मीट्रिक टन अगरबत्ती का रोज इस्तेमाल होता है। इसके मुकाबले मात्र 760 मीट्रिक टन अगरबत्ती ही तैयार होती है। यही नहीं देश में 250 टन के लगभग बांस का निर्यात हर साल चीन और वियतनाम से किया जाता है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर में उपलब्ध बांस और यहीं के कारीगरों की मेहनत से तैयार अगरबत्ती जहां देश के अलग-अलग हिस्सों में जगह मिल पाएगी। वहीं असम के कारीगरों की तरह बिलावर के कारीगर भी उत्पाद को निर्यात करवा मुनाफा कमा सकेंगे।
विज्ञापन
हथकरघा और हस्तशिल्प विभाग फिलहाल ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस कारीगरी का प्रशिक्षण दिलाने की तैयारी में हैं। कुछ कारीगरों को असम में प्रशिक्षित किया जा चुका है। शेष को प्रशिक्षण जल्द करवाए जाने हैं। उधर, विभाग इस केंद्र के लिए एसओपी तैयार करने में जुटा है।
सल्लन में बनाए सीएफसी के साथ विभाग ने सेल आउटलेट बनाया है ताकि कारीगरों की मेहनत हाथों हाथ बिक सकें। उधर बिलावर के देवल में तैयार सीएफसी के साथ ही अगरबत्तियों का सेल आउटलेट उपलब्ध रहेगा। ऐसे में यह दानों सीएफसी रोजगार सृजन का बड़ा साधन बनने जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से 2021 में एनईसीबीडीसी असम के साथ एमओयू भी साइन किया गया था जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर के कारीगरों को बांस के उत्पादन और इसके उत्पादों की जानकारी से अवगत कराना था।
जम्मू-कश्मीर में यह हैं बांस की किस्में
विभाग ने जम्मू-कश्मीर में रिपोर्ट की बांस की यह प्रजातियां डेंड्रोकैलेमस स्ट्रिक्टस, यह जम्मू और शिवालिक पहाड़ियों के कंडी वेल्ट में आम तौर पर पाया जाता है। खास तौर से डिंगाअंब, बिलावर, बसोहली, धार महानपुर, महानपुर आदि इलाकों में यह किस्म बड़े पैमाने पर पाई जाती है। जम्मू संभाग के उपोष्ण कटिबंधीय भागों में पाए जाने वाले कुछ विदेशी बांस प्रजातियां भी हैं। इनमें डेंड्रोकैलेमस हैमिल्टन शिवालिक/मध्यवर्ती/मध्य पहाड़ियों में पाए जाते हैं। बम्बूसा अरुंडिनेशिया, कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों में पाया जाता है। बम्बूसा टुल्डा, उधमपुर जबकि बम्बूसा नूतन प्रजाति कठुआ, सांबा जिलों में पाया जाता है। सोशल फॉरेस्ट्री विभाग की रिपोर्ट के अनुसार उधमपुर, डोडा, राजोरी व पुंछ का शीतोष्ण क्षेत्र बांस की खेती के लिए उपयुक्त है।
परंपरा से उद्यमिता तक का सफर
हस्तशिल्प विभाग की योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने स्थानीय कारीगरों को न केवल हुनरमंद बनाया है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर उद्यमी भी बनाया है। सरदारी लाल, सल्लन गांव के निवासी, पिछले 15 वर्षों से बांस शिल्प से जुड़े हुए हैं। उन्होंने हस्तशिल्प विभाग की क्रेडिट कार्ड योजना, सहकारी सहायता और कारखंदार योजना का लाभ उठाया। उन्हें असम स्थित एनईसीबीडीसी संस्थान में विशेष प्रशिक्षण के लिए भी भेजा गया, जहां उन्होंने उन्नत तकनीकों और डिजाइन में दक्षता प्राप्त की। प्रशिक्षण और विभागीय सहयोग के बाद उन्होंने एक स्थायी लघु उद्योग स्थापित किया, जिसमें नामपट्ट, फर्नीचर और सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। आज वे न केवल सरकारी और निजी ऑर्डर पूरे करते हैं, बल्कि आएसईटीआई और डीसी हैंडीक्राफ्ट्स जैसे संस्थानों में मास्टर ट्रेनर के रूप में भी कार्यरत हैं।
ऐसी ही कहानी रमेश चंद्र की भी है वह सल्लन गांव से हैं। वे पिछले 25 वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं। उनका पूरा परिवार बांस शिल्प में संलग्न है जिससे यह कला पीढ़ियों तक संरक्षित रही है। उन्होंने विभाग की योजनाओं का लाभ उठाया और असम में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने एक पारिवारिक इकाई स्थापित की, जो बांस से फर्नीचर, उपयोगी वस्तुएं और सजावटी उत्पाद तैयार करती है। यह इकाई नियमित रूप से सरकारी और निजी ऑर्डर पूरे करती है और उनके परिवार को स्थायी आजीविका प्रदान करती है। संवाद
कोट
देश भर में अगरबत्ती व बांस से बने फर्नीचर की भारी मांग है। कारीगरों के हुनर को आगे ले जाने के लिए विभाग प्रयासरत है। जिले में करीब 100 कारीगरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। कुछ का प्रशिक्षण कठुआ तो कुछ का असम में करवाया गया है। बिलावर और सल्लन में दो सीएफसी बनकर तैयार हैं।
- डॉ. रोहिणी, सहायक निदेशक, हरकरघा और हस्तशिल्प विभाग
विज्ञापन
कठुआ। जम्मू-कश्मीर में बांस जल्द कारीगरों की तकदीर बदलने जा रहा है। सिर्फ कारीगर ही नहीं सब सही रहा तो प्रदेश में तैयार होने वाले बांस के उत्पादों को देश व दुनिया में भी पहचान मिलना तय है। बांस से बनने वाली अगरबत्तियां जल्द भारत को महकाएंगी।
हीरानगर के सल्लन में बांस से तैयार फर्नीचर घरों की शान को बढ़ाएगा। बिलावर में हथकरघा और हस्तशिल्प विभाग ने इसके लिए जिले के करीब 100 कारीगरों को प्रशिक्षण दिया है। बिलावर व सल्लन में कॉमन फेसिलिटेशन सेंटर (सीएफसी) व शोरूम बनकर तैयार हो गए हैं। खास बात यह है कि जिला कठुआ की कंडी बेल्ट में प्रचूर मात्रा में पाए जाने वाले व अब तक बेकार पड़े बांस का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर संभव हो जाएगा।
विज्ञापन
राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत कारीगरों को जमीनों पर बांस लगाने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वहीं, कारीगर इसी बांस को बिना कोई राशि चुकाए उत्पादन में इस्तेमाल भी कर सकेंगे। केंद्र सरकार के एमएसएमई मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में 1490 मीट्रिक टन अगरबत्ती का रोज इस्तेमाल होता है। इसके मुकाबले मात्र 760 मीट्रिक टन अगरबत्ती ही तैयार होती है। यही नहीं देश में 250 टन के लगभग बांस का निर्यात हर साल चीन और वियतनाम से किया जाता है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर में उपलब्ध बांस और यहीं के कारीगरों की मेहनत से तैयार अगरबत्ती जहां देश के अलग-अलग हिस्सों में जगह मिल पाएगी। वहीं असम के कारीगरों की तरह बिलावर के कारीगर भी उत्पाद को निर्यात करवा मुनाफा कमा सकेंगे।
विज्ञापन
हथकरघा और हस्तशिल्प विभाग फिलहाल ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस कारीगरी का प्रशिक्षण दिलाने की तैयारी में हैं। कुछ कारीगरों को असम में प्रशिक्षित किया जा चुका है। शेष को प्रशिक्षण जल्द करवाए जाने हैं। उधर, विभाग इस केंद्र के लिए एसओपी तैयार करने में जुटा है।
सल्लन में बनाए सीएफसी के साथ विभाग ने सेल आउटलेट बनाया है ताकि कारीगरों की मेहनत हाथों हाथ बिक सकें। उधर बिलावर के देवल में तैयार सीएफसी के साथ ही अगरबत्तियों का सेल आउटलेट उपलब्ध रहेगा। ऐसे में यह दानों सीएफसी रोजगार सृजन का बड़ा साधन बनने जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से 2021 में एनईसीबीडीसी असम के साथ एमओयू भी साइन किया गया था जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर के कारीगरों को बांस के उत्पादन और इसके उत्पादों की जानकारी से अवगत कराना था।
जम्मू-कश्मीर में यह हैं बांस की किस्में
विभाग ने जम्मू-कश्मीर में रिपोर्ट की बांस की यह प्रजातियां डेंड्रोकैलेमस स्ट्रिक्टस, यह जम्मू और शिवालिक पहाड़ियों के कंडी वेल्ट में आम तौर पर पाया जाता है। खास तौर से डिंगाअंब, बिलावर, बसोहली, धार महानपुर, महानपुर आदि इलाकों में यह किस्म बड़े पैमाने पर पाई जाती है। जम्मू संभाग के उपोष्ण कटिबंधीय भागों में पाए जाने वाले कुछ विदेशी बांस प्रजातियां भी हैं। इनमें डेंड्रोकैलेमस हैमिल्टन शिवालिक/मध्यवर्ती/मध्य पहाड़ियों में पाए जाते हैं। बम्बूसा अरुंडिनेशिया, कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों में पाया जाता है। बम्बूसा टुल्डा, उधमपुर जबकि बम्बूसा नूतन प्रजाति कठुआ, सांबा जिलों में पाया जाता है। सोशल फॉरेस्ट्री विभाग की रिपोर्ट के अनुसार उधमपुर, डोडा, राजोरी व पुंछ का शीतोष्ण क्षेत्र बांस की खेती के लिए उपयुक्त है।
परंपरा से उद्यमिता तक का सफर
हस्तशिल्प विभाग की योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने स्थानीय कारीगरों को न केवल हुनरमंद बनाया है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर उद्यमी भी बनाया है। सरदारी लाल, सल्लन गांव के निवासी, पिछले 15 वर्षों से बांस शिल्प से जुड़े हुए हैं। उन्होंने हस्तशिल्प विभाग की क्रेडिट कार्ड योजना, सहकारी सहायता और कारखंदार योजना का लाभ उठाया। उन्हें असम स्थित एनईसीबीडीसी संस्थान में विशेष प्रशिक्षण के लिए भी भेजा गया, जहां उन्होंने उन्नत तकनीकों और डिजाइन में दक्षता प्राप्त की। प्रशिक्षण और विभागीय सहयोग के बाद उन्होंने एक स्थायी लघु उद्योग स्थापित किया, जिसमें नामपट्ट, फर्नीचर और सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। आज वे न केवल सरकारी और निजी ऑर्डर पूरे करते हैं, बल्कि आएसईटीआई और डीसी हैंडीक्राफ्ट्स जैसे संस्थानों में मास्टर ट्रेनर के रूप में भी कार्यरत हैं।
ऐसी ही कहानी रमेश चंद्र की भी है वह सल्लन गांव से हैं। वे पिछले 25 वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं। उनका पूरा परिवार बांस शिल्प में संलग्न है जिससे यह कला पीढ़ियों तक संरक्षित रही है। उन्होंने विभाग की योजनाओं का लाभ उठाया और असम में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने एक पारिवारिक इकाई स्थापित की, जो बांस से फर्नीचर, उपयोगी वस्तुएं और सजावटी उत्पाद तैयार करती है। यह इकाई नियमित रूप से सरकारी और निजी ऑर्डर पूरे करती है और उनके परिवार को स्थायी आजीविका प्रदान करती है। संवाद
कोट
देश भर में अगरबत्ती व बांस से बने फर्नीचर की भारी मांग है। कारीगरों के हुनर को आगे ले जाने के लिए विभाग प्रयासरत है। जिले में करीब 100 कारीगरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। कुछ का प्रशिक्षण कठुआ तो कुछ का असम में करवाया गया है। बिलावर और सल्लन में दो सीएफसी बनकर तैयार हैं।
- डॉ. रोहिणी, सहायक निदेशक, हरकरघा और हस्तशिल्प विभाग