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Kathua News: सोना-चांदी महंगा होने से बसोहली चित्रकला पर संकट
Tue, 05 May 2026 02:31 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Tue, 05 May 2026 02:31 AM IST
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बसोहली चित्रकला करते चित्रकार सोहन सिंह बलोरिया संवाद
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धातुओं के दाम आसमान छूने से चित्र बनाने की लागत 30-40% तक बढ़ी
साहिल खजूरिया
कठुआ। विश्व प्रसिद्ध बसोहली चित्रकला पर सोना-चांदी की बढ़ती कीमतों का सीधा असर पड़ा है। इन लघु चित्रों में चमक और आभा लाने के लिए असली सोना-चांदी के वर्क और रंगों का इस्तेमाल होता है।
पिछले एक साल में कीमती धातुओं के दाम आसमान छूने से चित्र बनाने की लागत 30-40 प्रतिशत तक बढ़ गई है। मजबूरी में कलाकारों को पेंटिंग्स के दाम भी बढ़ाने पड़े हैं जिससे बिक्री प्रभावित हो रही है। बसोहली कला से जुड़े सैकड़ों परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है।
कलाकारों ने सरकार से कच्चे माल पर सब्सिडी और संरक्षण की मांग की है ताकि यह धरोहर बच सके। मुकुट और आभूषणों में असली सोना-चांदी के इस्तेमाल से बनी चित्रकला की कीमत अब पहले से अधिक हो गई है। कलाकारों का कहना है कि कई चित्रकलाओं में तो दो से पांच ग्राम सोना-चांदी प्रयोग में आता है। बसोहली चित्रकला की पहचान देश-विदेश तक है।
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यह कला बॉस्टन ललित कला संग्रहालय (अमेरिका), लाहौर केंद्रीय संग्रहालय, राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली, डोगरा आर्ट संग्रहालय जम्मू और श्रीनगर संग्रहालय में अपनी शोभा बढ़ा रही है। संवाद
अतीत से रंग चुराती चित्रकला की नायाब है कहानी : कूची और रंगों से गढ़ा जाने वाला चित्रकला का संसार अनोखा है। सदियों पहले विश्व पटल पर पहचान बना चुकी बसोहली चित्रकला ने कला पारखियों को अपना मुरीद बनाया है। यह वही जगह है जहां न सिर्फ प्रदेश और देश बल्कि बाहरी देशों के कलाप्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। एक समय था जब चित्रकला को लेकर बसोहली को एक संस्थान के रूप में देखा जाता था। स्थानीय लोगों के अनुसार राजा भूपतदेव के शासन काल में चित्रकला से जुड़े रैणा परिवार को देश निकाला दिए जाने के बाद यह परिवार कांगड़ा में जाकर बस गया। वहां जाकर उन्होंने कांगड़ा पेंटिंग्स का विस्तार किया।
आभूषणों और मुकुट की सजावट में सोना-चांदी के अलावा बीटल विंग, पंख का इस्तेमाल किया जाता है। सोना-चांदी का सीधा इस्तेमाल चित्रकला पर नहीं होता है इसे पहले पाउडर तैयार करवाया जाता है। सस्ती चित्रकला में पोस्टर रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। जीआई टैग मिलने के बाद भी इसकी गुणवत्ता और असलियत को बचाए रखने का काम स्थानीय लोगों और कलाकारों का है।
- सोहन सिंह बलोरिया, चित्रकार
मेहनत और समय की मांग के चलते चित्रकला की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। बसोहली चित्रकला को जीआई टैग मिलने के बाद जयपुर से अरंग मंगवाए जाते हैं। इसमें इसका पारंपरिक स्वरूप बना रहता है। रंगों के साथ-साथ सोना-चांदी के पाउडर का दाम भी बढ़ गया है। इससे कला की मेहनत और इसके कच्चे माल की कीमतों से अब चित्रकला के तैयार स्वरूप के दाम में भी बढ़ोत्तरी हुई है। नई पीढ़ी में इसे आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। वर्तमान में सात से आठ बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं।
- अमित शर्मा, बसोहली पेंटिंग
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साहिल खजूरिया
कठुआ। विश्व प्रसिद्ध बसोहली चित्रकला पर सोना-चांदी की बढ़ती कीमतों का सीधा असर पड़ा है। इन लघु चित्रों में चमक और आभा लाने के लिए असली सोना-चांदी के वर्क और रंगों का इस्तेमाल होता है।
पिछले एक साल में कीमती धातुओं के दाम आसमान छूने से चित्र बनाने की लागत 30-40 प्रतिशत तक बढ़ गई है। मजबूरी में कलाकारों को पेंटिंग्स के दाम भी बढ़ाने पड़े हैं जिससे बिक्री प्रभावित हो रही है। बसोहली कला से जुड़े सैकड़ों परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है।
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कलाकारों ने सरकार से कच्चे माल पर सब्सिडी और संरक्षण की मांग की है ताकि यह धरोहर बच सके। मुकुट और आभूषणों में असली सोना-चांदी के इस्तेमाल से बनी चित्रकला की कीमत अब पहले से अधिक हो गई है। कलाकारों का कहना है कि कई चित्रकलाओं में तो दो से पांच ग्राम सोना-चांदी प्रयोग में आता है। बसोहली चित्रकला की पहचान देश-विदेश तक है।
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यह कला बॉस्टन ललित कला संग्रहालय (अमेरिका), लाहौर केंद्रीय संग्रहालय, राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली, डोगरा आर्ट संग्रहालय जम्मू और श्रीनगर संग्रहालय में अपनी शोभा बढ़ा रही है। संवाद
अतीत से रंग चुराती चित्रकला की नायाब है कहानी : कूची और रंगों से गढ़ा जाने वाला चित्रकला का संसार अनोखा है। सदियों पहले विश्व पटल पर पहचान बना चुकी बसोहली चित्रकला ने कला पारखियों को अपना मुरीद बनाया है। यह वही जगह है जहां न सिर्फ प्रदेश और देश बल्कि बाहरी देशों के कलाप्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। एक समय था जब चित्रकला को लेकर बसोहली को एक संस्थान के रूप में देखा जाता था। स्थानीय लोगों के अनुसार राजा भूपतदेव के शासन काल में चित्रकला से जुड़े रैणा परिवार को देश निकाला दिए जाने के बाद यह परिवार कांगड़ा में जाकर बस गया। वहां जाकर उन्होंने कांगड़ा पेंटिंग्स का विस्तार किया।
आभूषणों और मुकुट की सजावट में सोना-चांदी के अलावा बीटल विंग, पंख का इस्तेमाल किया जाता है। सोना-चांदी का सीधा इस्तेमाल चित्रकला पर नहीं होता है इसे पहले पाउडर तैयार करवाया जाता है। सस्ती चित्रकला में पोस्टर रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। जीआई टैग मिलने के बाद भी इसकी गुणवत्ता और असलियत को बचाए रखने का काम स्थानीय लोगों और कलाकारों का है।
- सोहन सिंह बलोरिया, चित्रकार
मेहनत और समय की मांग के चलते चित्रकला की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। बसोहली चित्रकला को जीआई टैग मिलने के बाद जयपुर से अरंग मंगवाए जाते हैं। इसमें इसका पारंपरिक स्वरूप बना रहता है। रंगों के साथ-साथ सोना-चांदी के पाउडर का दाम भी बढ़ गया है। इससे कला की मेहनत और इसके कच्चे माल की कीमतों से अब चित्रकला के तैयार स्वरूप के दाम में भी बढ़ोत्तरी हुई है। नई पीढ़ी में इसे आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। वर्तमान में सात से आठ बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं।
- अमित शर्मा, बसोहली पेंटिंग