{"_id":"5a85e6934f1c1ba0268ba607","slug":"141518724755-kathua-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पशु तस्करों के लिए शाम ढ़लते ही सील हो जाता है जम्मू कश्मीर पंजाब बार्डर,","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
पशु तस्करों के लिए शाम ढ़लते ही सील हो जाता है जम्मू कश्मीर पंजाब बार्डर,
Updated Fri, 16 Feb 2018 01:29 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कठुआ। पशु तस्करों के लिए पुलिस, आबकारी विभाग और सीआरपीएफ मिलकर काम करने लगे हैं। आलम यह है कि अब शाम ढलते ही राज्य के तमाम एंट्री प्वाइंट सील कर दिए जाते हैं। दरियाई रूट पर तस्करों को रोकने और पकड़ने के लिए जहां पुलिस का कड़ा पहरा है। वहीं नेशनल हाईवे से लखनपुर टोल के जरिए पशु तस्करी न हो इसके लिए आबकारी विभाग ने सीआरपीएफ की मदद से कड़ी नाकेबंदी कर दी है। पिछले लगभग पंद्रह दिन से सीआरपीएफ की लखनपुर टोल पोस्ट पर तैनाती के अतिरिक्त रात के समय एंट्री के लिए मात्र एक चैनल को ही सक्रिय रखा जाता है ताकि हर वाहन पर नजर रखी जा सके। बार्डर पर कंटीली तारों से लेकर बैरियर और तिरछे कर रूट सील करने के लिए ट्रक तक को लगा दिया गया है।
पंजाब से जम्मू कश्मीर में पशुओं की तस्करों का गोरखधंधा पिछले कई दशक से जारी है। कई बार नकेल कसने के बाद भी पशु तस्कराें के हौसले इतने बुलंद हैं कि लगातार प्रयास होते रहे हैं। विभिन्न दरियाई रूट के अतिरिक्त पशु तस्कर अब नेशनल हाईवे से भी पशु तस्करी का प्रयास करने लगे हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लखनपुर टोल प्लाजा के रास्ते ऐसे कई प्रयास हो चुके हैं जिसे रोक पाने में निहत्थे आबकारी विभाग के कर्मी भी विफल रहते हैं। उधर, आबकारी विभाग की जानकारी के बाद कई बार पुलिस ने ऐसे वाहनों को भी पकड़ा है, लेकिन लचीले कानून की वजह से पशु तस्करी के गोरखधंधे को रोक पाना नामुमकिन सा साबित हो रहा है। सूत्रों की मानें तो पिछले कुछ माह में एक आध नहीं बल्कि रोजाना पंद्रह से बीस वाहनों को जम्मू कश्मीर और पंजाब के बार्डर से क्रॉस कराकर सुरक्षित कश्मीर की ओर पहुंचाने की कोशिश होती रही है। हैरत की बात है कि पिछले एक साल में कुल जितने मामले कठुआ जिले में पशु तस्करी के विफल किए गए हैं। इतने ही मामले अकेले घगवाल पुलिस ने विफल कर दिए हैं। उधर, आबकारी विभाग ने पुलिस की मदद से कुछ दिन पहले ही टाइलों की आड़ में किए जा रहे पशु तस्करी के प्रयास को भी विफल किया था।
सलालपुर, कोटपुन्नू, भागथली के अतिरिक्त नेशनल हाईवे से तस्करी के होते रहे प्रयास
बेखौफ पशु तस्करों की सांठ-गांठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 95 फीसदी से अधिक मामलों में तस्कर पुलिस को गच्चा देने में कामयाब हो जाते हैं। उस पर लचर कानून के चलते तस्करों पर कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित नहीं होती है। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले चार माह के भीतर पशु तस्करी के मामलों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सूत्रों ने बताया कि सलालपुर, कोटपुन्नु, भागथली समेत अन्य कई रूट तस्करों के लिए सेफ पैसेज का काम करते रहे हैं। यही नहीं पिछले कुछ महीनों में नेशनल हाईवे और दियालाचक छलां रूट को भी तस्कर इस्तेमाल करने लगे हैं। पहले जहां रात के अंधेरे में ही पशु तस्करी का धंधा चलता था, अब सामने आ रहे मामलों में दिन दिहाड़े भी पशुओं को वाहनों में लादकर तस्कर बेखौफ आगे बढ़ रहे हैं।
विज्ञापन
आखिर कहां जाते हैं पुलिस द्वारा मुक्त कराए गए पशु
पुलिस द्वारा पशु तस्करों से मुक्त कराए गए पशु आखिर कहां जाते हैं। यह एक बड़ा सवाल है। पशु तस्करी का गढ़ बन चुके जिले की विभिन्न पुलिस चौकियां और थाने अब तबेले में तब्दील हो चुके हैं। आलम यह है कि पहले ही जहां थानों और चौकियों में पुलिसकर्मियों की कमी है तो दूसरी तरफ अब पुलिस पर इन पशुओं को संभालने का अतिरिक्त भार है। बीमार और मरने की कगार पर पहुंचने वाले पशुओं को शहर में समाजसेवा का बीड़ा उठाने वाली गोशालाएं भी नहीं संभालती। ऐसे में पुलिस भी इन पशुओं को लोगों में बांट देती है, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह पशु दोबारा मवेशियों के हाथ चढ़ तस्करी न किए जाएं। दूसरा पहलू यह भी है कि खुले में पुलिस द्वारा छोड़े गए मवेशी सड़क पर हादसों का कारण भी बनते हैं।
---------------
पशु तस्करों के खिलाफ कड़ा कानून नहीं है, जिसके चलते उनके हौसले बढ़े हुए हैं। जिले में चालीस से पचास लोग इस ध्ंाधे में लिप्त हैं जिन पर कड़ी कार्रवाई हो तो काम खुद ब खुद बंद हो जाएगा, लेकिन पुलिस भी आरोपियों की आवभगत करती है और नेताओं का दबाव भी इसमें रहता है। रूटीन में सामने आने वाले आरोपियों पर पीएसए भी नहीं लगाया जाना अपने आप में सवाल खड़ा करता है।
-प्रेमनाथ डोगरा, भाजपा जिला अध्यक्ष
------------
पशु तस्करों का एक बड़ा गिरोह सक्रिय है, जिसे सरकार जानबूझ कर विफल नहीं करना चाहती। पुलिस प्रशासन का भी पशु तस्करों को कहीं न कहीं समर्थन मिल रहा है जिस वजह से यह वारदात रुकने का नाम नहीं ले रही है। आए दिन एक आध वाहन को पकड़कर आम लोगों को दिखाने की कोशिश की जाती है कि पशु तस्करों पर सख्ती की जा रही है लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा नहीं है।
-पंकज डोगरा, वरिष्ठ नेता कांग्रेस
विज्ञापन
पंजाब से जम्मू कश्मीर में पशुओं की तस्करों का गोरखधंधा पिछले कई दशक से जारी है। कई बार नकेल कसने के बाद भी पशु तस्कराें के हौसले इतने बुलंद हैं कि लगातार प्रयास होते रहे हैं। विभिन्न दरियाई रूट के अतिरिक्त पशु तस्कर अब नेशनल हाईवे से भी पशु तस्करी का प्रयास करने लगे हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लखनपुर टोल प्लाजा के रास्ते ऐसे कई प्रयास हो चुके हैं जिसे रोक पाने में निहत्थे आबकारी विभाग के कर्मी भी विफल रहते हैं। उधर, आबकारी विभाग की जानकारी के बाद कई बार पुलिस ने ऐसे वाहनों को भी पकड़ा है, लेकिन लचीले कानून की वजह से पशु तस्करी के गोरखधंधे को रोक पाना नामुमकिन सा साबित हो रहा है। सूत्रों की मानें तो पिछले कुछ माह में एक आध नहीं बल्कि रोजाना पंद्रह से बीस वाहनों को जम्मू कश्मीर और पंजाब के बार्डर से क्रॉस कराकर सुरक्षित कश्मीर की ओर पहुंचाने की कोशिश होती रही है। हैरत की बात है कि पिछले एक साल में कुल जितने मामले कठुआ जिले में पशु तस्करी के विफल किए गए हैं। इतने ही मामले अकेले घगवाल पुलिस ने विफल कर दिए हैं। उधर, आबकारी विभाग ने पुलिस की मदद से कुछ दिन पहले ही टाइलों की आड़ में किए जा रहे पशु तस्करी के प्रयास को भी विफल किया था।
विज्ञापन
सलालपुर, कोटपुन्नू, भागथली के अतिरिक्त नेशनल हाईवे से तस्करी के होते रहे प्रयास
बेखौफ पशु तस्करों की सांठ-गांठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 95 फीसदी से अधिक मामलों में तस्कर पुलिस को गच्चा देने में कामयाब हो जाते हैं। उस पर लचर कानून के चलते तस्करों पर कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित नहीं होती है। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले चार माह के भीतर पशु तस्करी के मामलों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सूत्रों ने बताया कि सलालपुर, कोटपुन्नु, भागथली समेत अन्य कई रूट तस्करों के लिए सेफ पैसेज का काम करते रहे हैं। यही नहीं पिछले कुछ महीनों में नेशनल हाईवे और दियालाचक छलां रूट को भी तस्कर इस्तेमाल करने लगे हैं। पहले जहां रात के अंधेरे में ही पशु तस्करी का धंधा चलता था, अब सामने आ रहे मामलों में दिन दिहाड़े भी पशुओं को वाहनों में लादकर तस्कर बेखौफ आगे बढ़ रहे हैं।
विज्ञापन
आखिर कहां जाते हैं पुलिस द्वारा मुक्त कराए गए पशु
पुलिस द्वारा पशु तस्करों से मुक्त कराए गए पशु आखिर कहां जाते हैं। यह एक बड़ा सवाल है। पशु तस्करी का गढ़ बन चुके जिले की विभिन्न पुलिस चौकियां और थाने अब तबेले में तब्दील हो चुके हैं। आलम यह है कि पहले ही जहां थानों और चौकियों में पुलिसकर्मियों की कमी है तो दूसरी तरफ अब पुलिस पर इन पशुओं को संभालने का अतिरिक्त भार है। बीमार और मरने की कगार पर पहुंचने वाले पशुओं को शहर में समाजसेवा का बीड़ा उठाने वाली गोशालाएं भी नहीं संभालती। ऐसे में पुलिस भी इन पशुओं को लोगों में बांट देती है, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह पशु दोबारा मवेशियों के हाथ चढ़ तस्करी न किए जाएं। दूसरा पहलू यह भी है कि खुले में पुलिस द्वारा छोड़े गए मवेशी सड़क पर हादसों का कारण भी बनते हैं।
---------------
पशु तस्करों के खिलाफ कड़ा कानून नहीं है, जिसके चलते उनके हौसले बढ़े हुए हैं। जिले में चालीस से पचास लोग इस ध्ंाधे में लिप्त हैं जिन पर कड़ी कार्रवाई हो तो काम खुद ब खुद बंद हो जाएगा, लेकिन पुलिस भी आरोपियों की आवभगत करती है और नेताओं का दबाव भी इसमें रहता है। रूटीन में सामने आने वाले आरोपियों पर पीएसए भी नहीं लगाया जाना अपने आप में सवाल खड़ा करता है।
-प्रेमनाथ डोगरा, भाजपा जिला अध्यक्ष
------------
पशु तस्करों का एक बड़ा गिरोह सक्रिय है, जिसे सरकार जानबूझ कर विफल नहीं करना चाहती। पुलिस प्रशासन का भी पशु तस्करों को कहीं न कहीं समर्थन मिल रहा है जिस वजह से यह वारदात रुकने का नाम नहीं ले रही है। आए दिन एक आध वाहन को पकड़कर आम लोगों को दिखाने की कोशिश की जाती है कि पशु तस्करों पर सख्ती की जा रही है लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा नहीं है।
-पंकज डोगरा, वरिष्ठ नेता कांग्रेस