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Kathua News: जम्मू-कश्मीर में मक्की और सब्जियों पर सैनिक कीट का हमला
Tue, 15 Jul 2025 01:01 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Tue, 15 Jul 2025 01:01 AM IST
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जोन नगरोटा गुजरु में मक्की की फसल को हुए नुकसान की जानकारी लेते कृषि अधिकारी। स्रोत : कृषि व
- कठुआ और उधमपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में मक्की की फसल को कर रहा चट
कठुआ/बनी। पारे में उतार-चढ़ाव के बीच कठुआ जिले के पहाड़ी इलाकों में मक्की की फसल पर सैनिक कीट (फाॅल आर्मी वर्म) का हमला हो गया है। यह कीट मुख्य तौर पर अधिक तापमान वाले दक्षिण भारत में फसलों को तबाह करता रहा है लेकिन अब जम्मू-कश्मीर में भी तापमान बढ़ने के बाद यह फसलों की तबाही कर रहा है। उधमपुर के कठुआ जिले से सटे इलाकों में सैनिक कीट से मक्की को नुकसान पहुंचना शुरू हो गया है।
कृषि विभाग की टीमों ने जिले के पहाड़ी इलाकों में कीट के हमले से मक्की की फसल को तबाही की पुष्टि कर दी है। कृषि विभाग ने किसानों को दवाओं के छिड़काव के संबंध में निर्देश जारी किए हैं। हालांकि विशेषज्ञों की मानें तो दवाएं ज्यादा कारगर नहीं हैं। इसके लिए फसल लगाते समय ही ट्रैप क्रॉप लगाई जानी चाहिए थी लेकिन प्रभावित इलाकों में विभाग ऐसे करवाने में नाकामयाब रहा है। यह कीट पॉलीफैगस यानि की अन्य तरह के पौधों को खाने की भी क्षमता रखता है। ऐसे में सब्जियों तक को चट करता जा रहा है। फाल आर्मी वर्म एक दिन में 200 किलोमीटर तक उड़ सकता है। कठुआ जिले से सटे सांबा और उधमपुर जिले में भी खतरे की घंटी बज रही है। खास तौर से बिलावर और लोहाई मल्हार से सटे उधमपुर के डुडू बसंतगढ़, मजालता आदि इलाकों में भी इसका हमला हो चुका है।
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सैनिक कीट के हमले का असर बिलावर और बनी के कुछ इलाकों में देखा गया है। कठुआ जिले में 23 हजार हेक्टेयर में मक्की की फसल लगाई जाती है। मगर यह कीट एक दिन में 200 किमी तक सफर कर फसल को नष्ट कर सकता है। ऐसे में विभागीय टीमों की ओर से अन्य क्षेत्रों में भी नजर रखी जा रही है। किसानों को दवा का छिड़काव करने के लिए भी एडवाइजरी जारी की जा रही हैं।
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जितेंद्र कुमार, मुख्य कृषि अधिकारी, कठुआ
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5 से 6 कनाल ज़मीन पर मक्की की खेती लगाई है लेकिन अब पत्तियों पर कीड़े के काटने के निशान साफ देखे जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि मक्की की फसल पर कीटों ने हमला किया है और उससे भी ज्यादा नुकसान राजमा की फसल को हुआ है जो पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। मक्की के साथ-साथ हम राजमा भी लगाते हैं जिससे हमें अतिरिक्त आमदनी होती है, लेकिन इस बार सारी मेहनत बेकार हो गई।
जावेद अहमद, निवासी लोवांग
...
इस बार कीटों के फसल पर हमले से भारी नुकसान उठाना पड़ा है। फसलों को बचाने के लिए हमने दवा का छिड़काव भी किया लेकिन कोई खास असर नहीं हुआ।
सतीश कुमार, निवासी किलोड़
ट्रैप क्रॉप ही एकमात्र सहारा, दवाएं भी ज्यादा नहीं कारगर
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. विशाल महाजन ने बताया कि तापमान में बढ़ोतरी से यह यहां कम पाया जाने वाला कीट अब प्रमुखता से पाया जाने लगा है। इस कीट के इन इलाकों में या फसलों पर मौजूदगी 2019 तक न के बराबरी थी। 200 किलोमीटर तक रोजाना यह कीट उड़ सकता है। जर्मीनेशन से फसल की कटाई तक यह फसल में हमला करता रहता है। चूंकि यह पौधे के भीतरी हिस्से में बैठ जाता है, ऐसे में दवाएं भी इस पर ज्यादा असर नहीं करतीं। कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग की ओर से समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती है। बचाव के लिए बीज को ट्रीटमेंट के बाद ही लगाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में बारिश होती है, एक सप्ताह में एक साथ मक्की की बिजाई होनी चाहिए। अलग-अलग स्टेज में लगने वाली मक्की से इसे लंबे समय तक और फसल के बीच ही रहने का मौका मिल जाता है। कहीं कहीं बाजरा और भिंडी ट्रैप क्रॉप लगाकर इसके हमले को प्रभाव कम किया जा सकता है। जैसे ही हमला हो तो नजदीक कृषि विभाग को सूचित करें और एमामेक्टिन बनजोएट दवा का प्रयोग करें लेकिन धूप निकलने से पहले और धूप ढलने के बाद ही छिड़काव किया जाना जरूरी है। 15 से 20 दिन में इसका छिड़काव प्रभाव को देखकर दोबारा किया जाना चाहिए।
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कठुआ/बनी। पारे में उतार-चढ़ाव के बीच कठुआ जिले के पहाड़ी इलाकों में मक्की की फसल पर सैनिक कीट (फाॅल आर्मी वर्म) का हमला हो गया है। यह कीट मुख्य तौर पर अधिक तापमान वाले दक्षिण भारत में फसलों को तबाह करता रहा है लेकिन अब जम्मू-कश्मीर में भी तापमान बढ़ने के बाद यह फसलों की तबाही कर रहा है। उधमपुर के कठुआ जिले से सटे इलाकों में सैनिक कीट से मक्की को नुकसान पहुंचना शुरू हो गया है।
कृषि विभाग की टीमों ने जिले के पहाड़ी इलाकों में कीट के हमले से मक्की की फसल को तबाही की पुष्टि कर दी है। कृषि विभाग ने किसानों को दवाओं के छिड़काव के संबंध में निर्देश जारी किए हैं। हालांकि विशेषज्ञों की मानें तो दवाएं ज्यादा कारगर नहीं हैं। इसके लिए फसल लगाते समय ही ट्रैप क्रॉप लगाई जानी चाहिए थी लेकिन प्रभावित इलाकों में विभाग ऐसे करवाने में नाकामयाब रहा है। यह कीट पॉलीफैगस यानि की अन्य तरह के पौधों को खाने की भी क्षमता रखता है। ऐसे में सब्जियों तक को चट करता जा रहा है। फाल आर्मी वर्म एक दिन में 200 किलोमीटर तक उड़ सकता है। कठुआ जिले से सटे सांबा और उधमपुर जिले में भी खतरे की घंटी बज रही है। खास तौर से बिलावर और लोहाई मल्हार से सटे उधमपुर के डुडू बसंतगढ़, मजालता आदि इलाकों में भी इसका हमला हो चुका है।
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सैनिक कीट के हमले का असर बिलावर और बनी के कुछ इलाकों में देखा गया है। कठुआ जिले में 23 हजार हेक्टेयर में मक्की की फसल लगाई जाती है। मगर यह कीट एक दिन में 200 किमी तक सफर कर फसल को नष्ट कर सकता है। ऐसे में विभागीय टीमों की ओर से अन्य क्षेत्रों में भी नजर रखी जा रही है। किसानों को दवा का छिड़काव करने के लिए भी एडवाइजरी जारी की जा रही हैं।
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जितेंद्र कुमार, मुख्य कृषि अधिकारी, कठुआ
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5 से 6 कनाल ज़मीन पर मक्की की खेती लगाई है लेकिन अब पत्तियों पर कीड़े के काटने के निशान साफ देखे जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि मक्की की फसल पर कीटों ने हमला किया है और उससे भी ज्यादा नुकसान राजमा की फसल को हुआ है जो पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। मक्की के साथ-साथ हम राजमा भी लगाते हैं जिससे हमें अतिरिक्त आमदनी होती है, लेकिन इस बार सारी मेहनत बेकार हो गई।
जावेद अहमद, निवासी लोवांग
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इस बार कीटों के फसल पर हमले से भारी नुकसान उठाना पड़ा है। फसलों को बचाने के लिए हमने दवा का छिड़काव भी किया लेकिन कोई खास असर नहीं हुआ।
सतीश कुमार, निवासी किलोड़
ट्रैप क्रॉप ही एकमात्र सहारा, दवाएं भी ज्यादा नहीं कारगर
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. विशाल महाजन ने बताया कि तापमान में बढ़ोतरी से यह यहां कम पाया जाने वाला कीट अब प्रमुखता से पाया जाने लगा है। इस कीट के इन इलाकों में या फसलों पर मौजूदगी 2019 तक न के बराबरी थी। 200 किलोमीटर तक रोजाना यह कीट उड़ सकता है। जर्मीनेशन से फसल की कटाई तक यह फसल में हमला करता रहता है। चूंकि यह पौधे के भीतरी हिस्से में बैठ जाता है, ऐसे में दवाएं भी इस पर ज्यादा असर नहीं करतीं। कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग की ओर से समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती है। बचाव के लिए बीज को ट्रीटमेंट के बाद ही लगाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में बारिश होती है, एक सप्ताह में एक साथ मक्की की बिजाई होनी चाहिए। अलग-अलग स्टेज में लगने वाली मक्की से इसे लंबे समय तक और फसल के बीच ही रहने का मौका मिल जाता है। कहीं कहीं बाजरा और भिंडी ट्रैप क्रॉप लगाकर इसके हमले को प्रभाव कम किया जा सकता है। जैसे ही हमला हो तो नजदीक कृषि विभाग को सूचित करें और एमामेक्टिन बनजोएट दवा का प्रयोग करें लेकिन धूप निकलने से पहले और धूप ढलने के बाद ही छिड़काव किया जाना जरूरी है। 15 से 20 दिन में इसका छिड़काव प्रभाव को देखकर दोबारा किया जाना चाहिए।
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