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Kathua News: खरीद के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई धान की फसल
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कठुआ। कोरोना महामारी के दौरान संभाग में रिकार्ड धान की खरीद करने वाले जिले में साल दर साल सरकारी खरीद का आंकड़ा कम होता जा रहा है। जारी खरीद के दौरान जिले में खोले गए 11 खरीद सेंटरों में अब तक विभाग की खरीद का आंकड़ा एक लाख तीन हजार 187 क्विंटल तक ही पहुंच पाया है।
हालांकि एक अक्तूबर से जिले में खरीद शुरू होने पर विभाग की ओर से तीन लाख क्विंटल खरीद का अनुमान लगाया गया था। इससे साफ है कि करीब 10 लाख टन धान का उत्पादन करने वाले कठुआ जिले में इस बार भी गत वर्ष की तरह ही निजी डीलरों की रणनीति सरकार पर भारी पड़ी है, जहां सरकारी खरीद केंद्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी के बावजूद किसानों का रुझान निजी डीलरों द्वारा डोर स्टेप पर दी जाने वाली सुविधा की ओर रहा। उन्होंने खेत में किसानों से सीधा संपर्क करते हुए फसल मूल्य नकद राशि के रूप में देकर अपनी मर्जी के रेट से ही फसल खरीद ली है। ऐसे में अब तक एक लाख तीन हजार 187 क्विंटल तक पहुंचे खरीद के आंकड़े में किसी बड़े सुधार की उम्मीद भी कम ही बची है।
दरअसल वर्ष 2020 में कोरोना की महामारी के दौरान जिले में 2,41,000 क्विंटल और 2021 में 2,51,000 क्विंटल धान की सरकारी खरीद हुई थी। पूरे संभाग में इन दो सालों से रिकार्ड धान खरीद के बाद से कृषि विभाग ने वर्ष 2022 में भी रिकार्ड खरीद कर हैट्रिक बनाने का प्रयास किया था। इसमें जिले में परंपरागत आठ धान खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 10 कर दी थी। साथ ही किसानों को आकर्षित करने के लिए बैठने, पानी-बिजली सहित मापतौल के जरिये धान उठाने की व्यवस्था की थी लेकिन इस तरह के इंतजाम के बावजूद खरीद का आंकड़ा एक लाख 85 हजार 911 क्विंटल पर ही ठहर गया था। गत वर्ष रिकार्ड से पीछे रहे विभाग ने इस बार मंडियों की संख्या को और बढ़ाते हुए इनकी संख्या को 11 कर दी लेकिन इस बार भी जिले के किसानों का रुझान सरकारी मंडी के बजाय निजी डीलरों की सुविधा और नकद भुगतान की ओर ज्यादा देखने को मिला है।
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समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के बाद भी क्यों नहीं आकर्षित हो रहे किसान
दरअसल सरकार किसानों की असल दिक्कत को समझने में नाकाम रही। धान खरीद केंद्रों में काफी जटिलताओं के बाद मिलने वाले सरकारी दाम से किसान परेशान हैं। इसके कारण करीब 10 लाख क्विंटल धान का उत्पादन करने वाले जिले में जहां मोटे धान और बासमती का आंकड़ा 70 प्रतिशत और 30 प्रतिशत था। वह इस बार 50-50 हो गया है क्योंकि निजी डीलर बासमती की फसल उठाने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। उधर, निजी डीलरों ने व्यवस्था को सरल करते हुए खेतों से ही इस बार भी धान की फसल उठाई है। हालांकि, इसमें किसानों को दिया जाने वाला प्रति क्विंटल रेट कम है, लेकिन डीलरों द्वारा खेत में बिना साफ किए और बिना सुखाए ही धान लेने जैसी रणनीति किसानों को प्रभावित करती आ रही है।
क्या कहते हैं किसान
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इस बार हर साल की तरह 10 एकड़ धान की फसल लगाई थी। इसमें पहली खेप में निकले धान को सरकारी धान खरीद केंद्र पर पहुंचाया गया था, जहां फसल पहुंचाने के तीसरे दिन बारिश हो गई। इसे सुखाने में एक सप्ताह तक खरीद केंद्र में ही रुकना पड़ा। इस परेशानी से बचने के लिए फसल की दूसरी खेप निजी डीलर को बेची। इसमें रेट तो कुछ कम मिला लेकिन पूरी फसल खेत से ही बिक गई।
-कुलदीप राज, धान उत्पादक किसान गांव सेंपर सपलां
सरकार धान उत्पादक किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य देने के लिए सरकारी धान खरीद केंद्रों की व्यवस्था तो करती है। लेकिन धान खरीदने लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया किसानों के लिए सुविधा के बजाय कई बार असुविधा का कारण बन जाती है। इसके कारण वे नुकसान की परवाह को छोड़कर निजी डीलर को अपनी फसल बेच देते हैं।
-भाग हुसैन, धान उत्पादक किसान भागथली
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विभाग लगातार किसानों के कल्याण के लिए प्रयासरत है। इस बार भी किसानों की सुविधा को बढ़ाने के लिए मंडियों की संख्या बढ़ाई गई है। जहां धान की मापतौल करवाने वाले किसानों को उनकी पेमेंट डीबीटी के माध्यम काफी तेज की गई है। इस वर्ष धान की खरीद कम होने का मुख्य कारण क्षेत्र के किसानों द्वारा बासमती लगाया जाना रहा है, जिसका सरकारी खरीद में कोई प्रावधान नहीं है।
- मुरारी लाल डिगरा, जिला कृषि अधिकारी (एक्सटेंशन)
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हालांकि एक अक्तूबर से जिले में खरीद शुरू होने पर विभाग की ओर से तीन लाख क्विंटल खरीद का अनुमान लगाया गया था। इससे साफ है कि करीब 10 लाख टन धान का उत्पादन करने वाले कठुआ जिले में इस बार भी गत वर्ष की तरह ही निजी डीलरों की रणनीति सरकार पर भारी पड़ी है, जहां सरकारी खरीद केंद्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी के बावजूद किसानों का रुझान निजी डीलरों द्वारा डोर स्टेप पर दी जाने वाली सुविधा की ओर रहा। उन्होंने खेत में किसानों से सीधा संपर्क करते हुए फसल मूल्य नकद राशि के रूप में देकर अपनी मर्जी के रेट से ही फसल खरीद ली है। ऐसे में अब तक एक लाख तीन हजार 187 क्विंटल तक पहुंचे खरीद के आंकड़े में किसी बड़े सुधार की उम्मीद भी कम ही बची है।
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दरअसल वर्ष 2020 में कोरोना की महामारी के दौरान जिले में 2,41,000 क्विंटल और 2021 में 2,51,000 क्विंटल धान की सरकारी खरीद हुई थी। पूरे संभाग में इन दो सालों से रिकार्ड धान खरीद के बाद से कृषि विभाग ने वर्ष 2022 में भी रिकार्ड खरीद कर हैट्रिक बनाने का प्रयास किया था। इसमें जिले में परंपरागत आठ धान खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 10 कर दी थी। साथ ही किसानों को आकर्षित करने के लिए बैठने, पानी-बिजली सहित मापतौल के जरिये धान उठाने की व्यवस्था की थी लेकिन इस तरह के इंतजाम के बावजूद खरीद का आंकड़ा एक लाख 85 हजार 911 क्विंटल पर ही ठहर गया था। गत वर्ष रिकार्ड से पीछे रहे विभाग ने इस बार मंडियों की संख्या को और बढ़ाते हुए इनकी संख्या को 11 कर दी लेकिन इस बार भी जिले के किसानों का रुझान सरकारी मंडी के बजाय निजी डीलरों की सुविधा और नकद भुगतान की ओर ज्यादा देखने को मिला है।
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समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के बाद भी क्यों नहीं आकर्षित हो रहे किसान
दरअसल सरकार किसानों की असल दिक्कत को समझने में नाकाम रही। धान खरीद केंद्रों में काफी जटिलताओं के बाद मिलने वाले सरकारी दाम से किसान परेशान हैं। इसके कारण करीब 10 लाख क्विंटल धान का उत्पादन करने वाले जिले में जहां मोटे धान और बासमती का आंकड़ा 70 प्रतिशत और 30 प्रतिशत था। वह इस बार 50-50 हो गया है क्योंकि निजी डीलर बासमती की फसल उठाने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। उधर, निजी डीलरों ने व्यवस्था को सरल करते हुए खेतों से ही इस बार भी धान की फसल उठाई है। हालांकि, इसमें किसानों को दिया जाने वाला प्रति क्विंटल रेट कम है, लेकिन डीलरों द्वारा खेत में बिना साफ किए और बिना सुखाए ही धान लेने जैसी रणनीति किसानों को प्रभावित करती आ रही है।
क्या कहते हैं किसान
इस बार हर साल की तरह 10 एकड़ धान की फसल लगाई थी। इसमें पहली खेप में निकले धान को सरकारी धान खरीद केंद्र पर पहुंचाया गया था, जहां फसल पहुंचाने के तीसरे दिन बारिश हो गई। इसे सुखाने में एक सप्ताह तक खरीद केंद्र में ही रुकना पड़ा। इस परेशानी से बचने के लिए फसल की दूसरी खेप निजी डीलर को बेची। इसमें रेट तो कुछ कम मिला लेकिन पूरी फसल खेत से ही बिक गई।
-कुलदीप राज, धान उत्पादक किसान गांव सेंपर सपलां
सरकार धान उत्पादक किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य देने के लिए सरकारी धान खरीद केंद्रों की व्यवस्था तो करती है। लेकिन धान खरीदने लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया किसानों के लिए सुविधा के बजाय कई बार असुविधा का कारण बन जाती है। इसके कारण वे नुकसान की परवाह को छोड़कर निजी डीलर को अपनी फसल बेच देते हैं।
-भाग हुसैन, धान उत्पादक किसान भागथली
विभाग लगातार किसानों के कल्याण के लिए प्रयासरत है। इस बार भी किसानों की सुविधा को बढ़ाने के लिए मंडियों की संख्या बढ़ाई गई है। जहां धान की मापतौल करवाने वाले किसानों को उनकी पेमेंट डीबीटी के माध्यम काफी तेज की गई है। इस वर्ष धान की खरीद कम होने का मुख्य कारण क्षेत्र के किसानों द्वारा बासमती लगाया जाना रहा है, जिसका सरकारी खरीद में कोई प्रावधान नहीं है।
- मुरारी लाल डिगरा, जिला कृषि अधिकारी (एक्सटेंशन)