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फलों की राजा आम और लीची को लगी खराब मौसम की नजर,
Updated Tue, 27 Mar 2018 10:35 AM IST
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कठुआ। इस बार आम बौर से लदे हैं, लेकिन मौसम फलों के राजा के साथ ही लीची से भी खफा नजर आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार दिन की गर्मी और रात में तापमान में गिरावट के अतिरिक्त हवा में नमी की मात्रा अधिक रहने से तेला और पाउडरी माइल्ड ड्यू यानि की खर्रा का हमला आम के बौर और पत्तों पर हो चुका है। किसानों ने यदि समय पर दवाओं को छिड़काव नहीं किया तो साठ से सत्तर फीसदी तक आम की फसल प्रभावित होने का अनुमान है।
बागवानी विभाग के विशेषज्ञ संजीव कलरूपिया ने बताया कि मौसम में लगातार हो रहे परिवर्तन से आम और लीची पर तेला और पाउडरी माइल्ड डयू के लक्ष्ण सामने आए हैं। इसके लिए किसानों को वैटेबल सल्फर दो ग्राम एक लीटर पानी में डालकर शाम के समय छिड़काव करना चाहिए और दस दिन बाद फिर से छिड़काव करना जरूरी है। लापरवाही करने पर आम और लीची को साठ फीसदी से अधिक का नुक्सान हो सकता है। उन्होंने बताया कि आम के बौरों, फलों तथा पत्तियों पर सफेदचूर्ण की तरह का लक्षण दिखाई देता है। ऐसा प्रतित होता है कि पेड़ों पर राख (स्लेटी चूर्ण) बुरक दी गयी है। आम के पुष्पवृंत, फूल तथा फलों पर प्रकोप से उनकी वृद्धि रूक जाती है और फूल गिरने लगते हैं। बौर के समय फुहार तथा ठंडी राते इस रोग की वृद्धि में सहायक होती है। कवच से नए फल बिल्कुल ढक जाते है तथा धीरे-धीरे उसकी बाहरी सतह पर दरारें पड़नें लगती है और वह भाग कड़ा हो जाता है जिसके फलस्वरूप नये फल मटर के दाने के बराबर होने के पहले ही गिर जाते है। नई पत्तियों की पिछली सतह पर यह रोग काफी फैलता है तथा स्लेटी धब्बे बनते है जिसपर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ता है और रोगग्रस्त पत्तियां टेढ़ी हो जाती है। ऐसी पत्तियां पूरे साल पौधों पर लगी रहती है तथा अगले वर्ष रोगों को फैलाने में सहायक होती है।
क्या है पाउडरी माइल्ड ड्यू
इस रोग को दहिया तथा खर्रा के नाम से भी जाना जाता है। यह आम की एक भयानक बीमारी है तथा इससे लगभग सभी किस्में प्रभावित होती है। इसका प्रकोप अधिकांश फरवरी-मार्च माह या कभी-कभी उसके पहले तापक्रम तथा सापेक्ष आर्द्रता में वृद्धि के फलस्वरूप होता है। इस रोग से फलों की पैदावार को 20 प्रतिशत से लेकर 70-80 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है।
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बागवानी विभाग के विशेषज्ञ संजीव कलरूपिया ने बताया कि मौसम में लगातार हो रहे परिवर्तन से आम और लीची पर तेला और पाउडरी माइल्ड डयू के लक्ष्ण सामने आए हैं। इसके लिए किसानों को वैटेबल सल्फर दो ग्राम एक लीटर पानी में डालकर शाम के समय छिड़काव करना चाहिए और दस दिन बाद फिर से छिड़काव करना जरूरी है। लापरवाही करने पर आम और लीची को साठ फीसदी से अधिक का नुक्सान हो सकता है। उन्होंने बताया कि आम के बौरों, फलों तथा पत्तियों पर सफेदचूर्ण की तरह का लक्षण दिखाई देता है। ऐसा प्रतित होता है कि पेड़ों पर राख (स्लेटी चूर्ण) बुरक दी गयी है। आम के पुष्पवृंत, फूल तथा फलों पर प्रकोप से उनकी वृद्धि रूक जाती है और फूल गिरने लगते हैं। बौर के समय फुहार तथा ठंडी राते इस रोग की वृद्धि में सहायक होती है। कवच से नए फल बिल्कुल ढक जाते है तथा धीरे-धीरे उसकी बाहरी सतह पर दरारें पड़नें लगती है और वह भाग कड़ा हो जाता है जिसके फलस्वरूप नये फल मटर के दाने के बराबर होने के पहले ही गिर जाते है। नई पत्तियों की पिछली सतह पर यह रोग काफी फैलता है तथा स्लेटी धब्बे बनते है जिसपर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ता है और रोगग्रस्त पत्तियां टेढ़ी हो जाती है। ऐसी पत्तियां पूरे साल पौधों पर लगी रहती है तथा अगले वर्ष रोगों को फैलाने में सहायक होती है।
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क्या है पाउडरी माइल्ड ड्यू
इस रोग को दहिया तथा खर्रा के नाम से भी जाना जाता है। यह आम की एक भयानक बीमारी है तथा इससे लगभग सभी किस्में प्रभावित होती है। इसका प्रकोप अधिकांश फरवरी-मार्च माह या कभी-कभी उसके पहले तापक्रम तथा सापेक्ष आर्द्रता में वृद्धि के फलस्वरूप होता है। इस रोग से फलों की पैदावार को 20 प्रतिशत से लेकर 70-80 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है।
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