लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बांधने की कोशिश हो रही - अद्वैता काला
फिल्म पटकथा लेखिका और उपन्यासकार अद्वैता काला ने कहा कि अपनी विचारधारा को हावी करने के लिए लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बांधा जा रहा है। उन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में राजनीति से लेकर बॉलीवुड तक तमाम मुद्दों पर बातचीत की। वह नारद जयंती के अवसर पर मुरादाबाद में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंची थीं।
विद्या बालन अभिनीत कहानी और रणवीर कपूर-प्रियंका चोपड़ा अभिनीत अंजाना-अजानी फिल्म की लेखिका अद्वैता काला कहती हैं कि समय के साथ हिंदी सिनेमा की कहानी बदली है। वो अब जिंदगी के ज्यादा करीब हुआ है। आसपास की घटनाओं से कहानी उठकर बड़े पर्दे तक आ रही है। उन्होंने कहा कि वे जल्द ही एक शॉर्ट फिल्म के साथ उनके पसंद करने वालों के बीच होंगी। उन्होंने नए लेखकों से कहा कि वे लिखते रहें, अच्छे से अच्छा पढ़ें और अच्छे से अच्छा लिखें। मौलिकता को हमेशा पहचान मिलती है।
'केरल हिंसा का सच सामने लाने को निष्पक्ष हो मीडिया'
अमर उजाला से बातचीत के दौरान अद्वैता काला ने कहा कि एक योजनाबद्ध तरीके से सत्ता के पक्ष और विपक्ष में अभियान चलाए जा रहे हैं। मीडिया निष्पक्षता के साथ अपना काम नहीं कर रही है। कुछ मीडिया समूह पत्रकारिता से हटकर निजी स्वार्थ के लिए काम कर रहे हैं। वे ऐसे पत्रकारों के लिए समस्या हैं जो निष्पक्ष रहकर पत्रकारिता करना चाहते हैं।
उन्होंने बिना टिप्पणी के कहा कि एक जगह छोटा सा झगड़ा हिंसा बनाकर पेश कर दिया जाता है। जहां राजनीतिक हिंसाएं हो रही हैं, उस कुन्नूर पर तथाकथित आदर्शवादी मीडिया घराने बोलना भी पसंद नहीं करते। बिना किसी का नाम लिए कहा कि एक पत्रकार खुद को धमकी मिलने का विज्ञापन कर रहे हैं। मैंने जब कुन्नूर की हत्याओं पर लिखना शुरू किया तो मुझे भी धमकियां मिलीं।
उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाला वामपंथ दरअसल अपनी विचारधारा थोपना चाहता है। वो चाहता है कि उसकी ठपली, उसका राग गाया जाए। क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है? उन्होंने कहा कि केरल हिंसा का सच सबके सामने आना चाहिए। इसके लिए मीडिया को अपनी निष्पक्ष भूमिका निभानी चाहिए।
अद्वैता काला कहती हैं कि जब जेएनयू में एक छात्र नेता के अनर्गल प्रलाप को पूरा मीडिया जगत सत्ता से संघर्ष का हथियार बनाकर पेश कर रहा था। उसी समय जनवरी 2016 में केरल के एक गरीब युवक केचेहरे पर 50 और पीठ पर दो सौ से ज्यादा नुकीली कीलों के वार कर जिंदगी का अधिकार छीन लिया गया, लेकिन उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा था। यह सीरिया में हुई हत्याओं से भी विभत्स था। देश के सबसे शिक्षित और सर्वोच्य जीडीपी वाले राज्य का यह हाल राजनीतिक उपेक्षा का नतीजा है।
जो विचार हिंसा और हत्याओं का समर्थन करता है वह देश के लिए लाभदायक नहीं हो सकता। मीडिया तय करे कि वो एक ही चश्मे से पूरी तस्वीर को देखेगी या पत्रकार सच के पक्षकार बनेंगे।