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Una News: चिप्स वाले आलू को तैयार करने वाले किसानों की संख्या 90 प्रतिशत तक घटी
Sat, 24 Feb 2024 01:45 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Sat, 24 Feb 2024 01:45 AM IST
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आलू का गढ़ कहे जाने वाले ऊना जिला में अब किसान इस फसल की पारंपरिक खेती करने को अधिक तवज्जो देने लगे हैं। करीब एक दशक पहले की बात करें तो जिला में पारंपरिक फसल के साथ चिप्स के लिए इस्तेमाल होने वाले आलू की खेती तेजी से बढ़ी, लेकिन कुछ समय बाद इसका दायरा सिमटने लगा और अब आलम यह है कि 90 प्रतिशत किसान इस फसल से दूरी बना चुके हैं। अब कुछ गिने-चुने किसान ही हर वर्ष इसकी खेती करते हैं।
जानकारी के अनुसार ऊना जिला में प्रतिवर्ष आलू की दो फसलें तैयार होती हैं। इनमें एक फसल चार माह तो दूसरी दो माह में तैयार होती है। दो माह वाली फसल के साथ ही चिप्स वाले आलू की खेती होती है। यह फसल सितंबर से नवंबर माह के मध्य तैयार होती है। पारंपरिक आलू के मुकाबले चिप्स वाले आलू की फसल को तैयार करना चुनौतीपूर्ण रहता है। किसानों को लगातार नजर बनाकर रखनी पड़ती है कि किन्हीं कारणों से आलू की गुणवत्ता न खराब हो। हालांकि इस फसल को पारंपरिक आलू से डेढ़ गुना अधिक दाम तो मिलते हैं, लेकिन इसका बीज भी उतना ही महंगा मिलता है, जो किसानों को चिप्स कंपनियां ही मुहैया करवाती हैं। वहीं, अगर किसानों की फसल तैयार करने में कोई चूक हुई और कंपनियों के मानकों को फसल की गुणवत्ता पूरा न कर पाई तो उसकी खरीद नहीं होती। इसके बाद उस आलू को साधारण आलू के दाम पर मंडियों में बेचना या कम दाम पर कंपनियों को देने का विकल्प होता है।
किसान मदन लाल, देसराज, अशोक सैनी, विशाल कुमार, जसविंदर सिंह ने कहा कि चिप्स वाले आलू को पहले ऊना जिला में करीब 500 हेक्टेयर में तैयार किया जाता था, लेकिन अब मात्र 40 से 50 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है। उन्होंने कहा कि चिप्स कंपनियों के मानक इतने अधिक हैं कि उन्हें पूरा करने में किसानों की कमर टूट जाती है। किसानों को यह चिंता लगातार रहती है कि अगर फसल में हल्की खराबी भी आई तो कंपनियां खरीदेंगी नहीं, जबकि उन्होंने महंगे बीज से फसल तैयार की होती है। उन्होंने कहा कि साधारण आलू की फसल में यह चिंता नहीं होती है और उसकी खरीद मंडियों में आसानी से हो जाती है।
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कोट्स
जिले में आलू की खेती ने कई किसानों की आर्थिकी सुधारी है। हालांकि चिप्सोना आलू तैयार करने के लिए यहां कि परिस्थितियां अनुकूल हैं, लेकिन मौसम की विभिन्न परिस्थितियों में इस संवेदनशील फसल की संभाल रखना चुनौती भरा होता है। किसानों को लगातार नई फसलों में हाथ आजमाने और लाभ कमाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। अगर किसी प्रकार की परेशानी हो तो किसान निसंकोच हमारे विशेषज्ञों के साथ चर्चा करें।
डॉ. कुलभूषण धीमान, उपनिदेशक, जिला कृषि विभाग।
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जानकारी के अनुसार ऊना जिला में प्रतिवर्ष आलू की दो फसलें तैयार होती हैं। इनमें एक फसल चार माह तो दूसरी दो माह में तैयार होती है। दो माह वाली फसल के साथ ही चिप्स वाले आलू की खेती होती है। यह फसल सितंबर से नवंबर माह के मध्य तैयार होती है। पारंपरिक आलू के मुकाबले चिप्स वाले आलू की फसल को तैयार करना चुनौतीपूर्ण रहता है। किसानों को लगातार नजर बनाकर रखनी पड़ती है कि किन्हीं कारणों से आलू की गुणवत्ता न खराब हो। हालांकि इस फसल को पारंपरिक आलू से डेढ़ गुना अधिक दाम तो मिलते हैं, लेकिन इसका बीज भी उतना ही महंगा मिलता है, जो किसानों को चिप्स कंपनियां ही मुहैया करवाती हैं। वहीं, अगर किसानों की फसल तैयार करने में कोई चूक हुई और कंपनियों के मानकों को फसल की गुणवत्ता पूरा न कर पाई तो उसकी खरीद नहीं होती। इसके बाद उस आलू को साधारण आलू के दाम पर मंडियों में बेचना या कम दाम पर कंपनियों को देने का विकल्प होता है।
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किसान मदन लाल, देसराज, अशोक सैनी, विशाल कुमार, जसविंदर सिंह ने कहा कि चिप्स वाले आलू को पहले ऊना जिला में करीब 500 हेक्टेयर में तैयार किया जाता था, लेकिन अब मात्र 40 से 50 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है। उन्होंने कहा कि चिप्स कंपनियों के मानक इतने अधिक हैं कि उन्हें पूरा करने में किसानों की कमर टूट जाती है। किसानों को यह चिंता लगातार रहती है कि अगर फसल में हल्की खराबी भी आई तो कंपनियां खरीदेंगी नहीं, जबकि उन्होंने महंगे बीज से फसल तैयार की होती है। उन्होंने कहा कि साधारण आलू की फसल में यह चिंता नहीं होती है और उसकी खरीद मंडियों में आसानी से हो जाती है।
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जिले में आलू की खेती ने कई किसानों की आर्थिकी सुधारी है। हालांकि चिप्सोना आलू तैयार करने के लिए यहां कि परिस्थितियां अनुकूल हैं, लेकिन मौसम की विभिन्न परिस्थितियों में इस संवेदनशील फसल की संभाल रखना चुनौती भरा होता है। किसानों को लगातार नई फसलों में हाथ आजमाने और लाभ कमाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। अगर किसी प्रकार की परेशानी हो तो किसान निसंकोच हमारे विशेषज्ञों के साथ चर्चा करें।
डॉ. कुलभूषण धीमान, उपनिदेशक, जिला कृषि विभाग।