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मौसम खराब होने से आलू में झुलसा का प्रकोप
Updated Wed, 12 Dec 2018 11:00 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
ऊना। कई दिनों से बनते-बिगड़ते मौसम के कारण आलू की फसल पर संकट छा गया है। जिले के कई स्थानों पर फसल में झुलसा रोग की गति तेज हो गई है। जिले में आलू की फसल पर कहर बनकर टूट पड़ा है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने अनुसार मौसम खराब होन ेपर झुलसा रोग फैलता है।
झुलसा रोग शुरू होने के एक-दो दिन में अगर फसल पर दवाइयों का छिड़काव न किया जाता है तो चार-पांच दिन में पूरे खेत की फसल तबाह हो जाती है। खराब मौसम में रोग का प्रकोप दोगुना हो जाता है। अगर इस बीमारी से फसल को बचाना तो रोग को शुरू होने पर ही इसका निदान किया जाना चाहिए। वरना आगे फसल को बचाना मुश्किल हो जाता है।
जिले के आलू उत्पादक होशियार सिंह, गुरनाम सिंह, सोहन लाल, रौनक लाल, पवन सैणी, जगतार सिंह, रामपाल, प्यारा लाल ने कहा कि कई दिनों से खराब मौसम के चलते आलू की फसल झुलसा रोग की चपेट में आ गई है। इससे उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पहले ही बाजार में फसल की लागत का मूल्य नहीं मिल रहा है। अब फसल झुलसा रोग लगने से उनकी दिक्कतें बढ़ गई हैं। फसल को बचाने को दवाओं पर स्प्रे भी किया जा रहा है लेकिन बीमारी काबू नहीं आ रही है। इस वजह से आलू की फसल को हुए नुकसान की भरपाई करना मुश्किल है। बीमारी के चलते आलू उत्पादक किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं। फसल प्रभावित होते देख किसान अपनी फसलों को बचाने के प्रयास में जुट गए हैं। कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लेकर दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है।
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इस तकनीक को अपनाएं किसान
जिला कृषि उपनिदेशक सुरेश कपूर का कहना है कि झुलसा रोग खराब मौसम के कारण होता है। अगर लगातार मौसम खराब रहे तो इसका प्रकोप दोगुना हो जाता है। झुलसा का प्रकोप ऊपर की पत्तियों से शुरू होता है। शुरू में किनारे की पत्तियां काली होती हैं। तेजी से इसका प्रकोप पत्तियों और तने से होता हुआ कंद तक पहुंच जाता है। छिड़काव करने के लिए 15 लीटर पानी में 35 ग्राम मैंकोजेब, 20 ग्राम सल्फर और 20 ग्राम बोरान (20 फीसद) मिलाकर छिड़काव करें। इससे रोग के साथ ठंड से भी बचाव होगा। इसके साथ साथ किसान लिल्ट नामक दवाई का भी इस्तेमाल नियमानुसार कर सकते हैं। इसके प्रयोग की सभी विधियां दवाई के पैकेट भी दर्शाई होती हैं। इनके प्रयोग से आलू के कंद की साइज भी अच्छा होगा। 15 दिन के अंतराल पर इसी मिश्रण के साथ दूसरा छिड़काव भी करें।
2400 हेक्टेयर में बीजा आलू
हर साल जिले में दो बार आलू की फसल की पैदावार होती है। 2200 से 2400 हेक्टेयर भूमि में आलू की बिजाई की जाती है। इसके साथ प्रति हेक्टेयर भूमि में 120 क्विंटल आलू की पैदावार होती है। वहीं, जिला ऊना में करीब 10 करोड़ रुपये का आलू उत्पादन होता है। आलू की पैदावार को प्रदेश सहित दिल्ली, चंडीगढ़, होशियारपुर, लुधियाना सहित अन्य राज्यों की मंडियों में किसानों व व्यापारियों द्वारा बेची जाती है। लेकिन किसानों को आलू की फसल के मूल्य 5 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिल रहे हैं। जिससे किसानों को इस सीजन में भारी घाटा सहना पड़ा है।
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ऊना। कई दिनों से बनते-बिगड़ते मौसम के कारण आलू की फसल पर संकट छा गया है। जिले के कई स्थानों पर फसल में झुलसा रोग की गति तेज हो गई है। जिले में आलू की फसल पर कहर बनकर टूट पड़ा है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने अनुसार मौसम खराब होन ेपर झुलसा रोग फैलता है।
झुलसा रोग शुरू होने के एक-दो दिन में अगर फसल पर दवाइयों का छिड़काव न किया जाता है तो चार-पांच दिन में पूरे खेत की फसल तबाह हो जाती है। खराब मौसम में रोग का प्रकोप दोगुना हो जाता है। अगर इस बीमारी से फसल को बचाना तो रोग को शुरू होने पर ही इसका निदान किया जाना चाहिए। वरना आगे फसल को बचाना मुश्किल हो जाता है।
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जिले के आलू उत्पादक होशियार सिंह, गुरनाम सिंह, सोहन लाल, रौनक लाल, पवन सैणी, जगतार सिंह, रामपाल, प्यारा लाल ने कहा कि कई दिनों से खराब मौसम के चलते आलू की फसल झुलसा रोग की चपेट में आ गई है। इससे उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पहले ही बाजार में फसल की लागत का मूल्य नहीं मिल रहा है। अब फसल झुलसा रोग लगने से उनकी दिक्कतें बढ़ गई हैं। फसल को बचाने को दवाओं पर स्प्रे भी किया जा रहा है लेकिन बीमारी काबू नहीं आ रही है। इस वजह से आलू की फसल को हुए नुकसान की भरपाई करना मुश्किल है। बीमारी के चलते आलू उत्पादक किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं। फसल प्रभावित होते देख किसान अपनी फसलों को बचाने के प्रयास में जुट गए हैं। कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लेकर दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है।
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इस तकनीक को अपनाएं किसान
जिला कृषि उपनिदेशक सुरेश कपूर का कहना है कि झुलसा रोग खराब मौसम के कारण होता है। अगर लगातार मौसम खराब रहे तो इसका प्रकोप दोगुना हो जाता है। झुलसा का प्रकोप ऊपर की पत्तियों से शुरू होता है। शुरू में किनारे की पत्तियां काली होती हैं। तेजी से इसका प्रकोप पत्तियों और तने से होता हुआ कंद तक पहुंच जाता है। छिड़काव करने के लिए 15 लीटर पानी में 35 ग्राम मैंकोजेब, 20 ग्राम सल्फर और 20 ग्राम बोरान (20 फीसद) मिलाकर छिड़काव करें। इससे रोग के साथ ठंड से भी बचाव होगा। इसके साथ साथ किसान लिल्ट नामक दवाई का भी इस्तेमाल नियमानुसार कर सकते हैं। इसके प्रयोग की सभी विधियां दवाई के पैकेट भी दर्शाई होती हैं। इनके प्रयोग से आलू के कंद की साइज भी अच्छा होगा। 15 दिन के अंतराल पर इसी मिश्रण के साथ दूसरा छिड़काव भी करें।
2400 हेक्टेयर में बीजा आलू
हर साल जिले में दो बार आलू की फसल की पैदावार होती है। 2200 से 2400 हेक्टेयर भूमि में आलू की बिजाई की जाती है। इसके साथ प्रति हेक्टेयर भूमि में 120 क्विंटल आलू की पैदावार होती है। वहीं, जिला ऊना में करीब 10 करोड़ रुपये का आलू उत्पादन होता है। आलू की पैदावार को प्रदेश सहित दिल्ली, चंडीगढ़, होशियारपुर, लुधियाना सहित अन्य राज्यों की मंडियों में किसानों व व्यापारियों द्वारा बेची जाती है। लेकिन किसानों को आलू की फसल के मूल्य 5 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिल रहे हैं। जिससे किसानों को इस सीजन में भारी घाटा सहना पड़ा है।