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एसपीयू मंडी का शोध: रासायनिक कीटनाशकों के मुकाबले नीम के तेल का कोशिकाओं पर कम असर

Sat, 26 Sep 2026 12:06 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी।
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 26 Sep 2026 12:06 PM IST
सार

 सरदार पटेल यूनिवर्सिटी मंडी में जूलॉजी की असिस्टेंड प्रोफेसर डॉ. नीलम ठाकुर के नेतृत्व में सुजाता धीमान, कनिका, रुचि, कुसुमा, अर्शिया सूद, गगनदीप सिंह और दिपांश कटोच ने रसायनों और नीम तेल के बीच विशलेषणात्मक शोध किया है। 

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SPU Mandi Research: Neem oil has less impact on cells compared to chemical pesticides.
सरदार पटेल यूनिवर्सिटी मंडी। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

 सरदार पटेल यूनिवर्सिटी मंडी के एमएससी जूलॉजी विद्यार्थियों ने शोध करके इस बात को साबित किया है कि फसलों के बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनिक कीटनाशकों की तुलना में नीम के तेल से बने कीटनाशक फसलों की सेहत के लिए अधिक सुरक्षित हैं। सरदार पटेल यूनिवर्सिटी मंडी में जूलॉजी की असिस्टेंड प्रोफेसर डॉ. नीलम ठाकुर के नेतृत्व में सुजाता धीमान, कनिका, रुचि, कुसुमा, अर्शिया सूद, गगनदीप सिंह और दिपांश कटोच ने रसायनों और नीम तेल के बीच विशलेषणात्मक शोध किया है। शोध के बारे में जानकारी देते हुए डाॅ. नीलम ठाकुर ने बताया कि फसलों को सुरक्षित रखने के लिए किसानों की ओर से भारी मात्रा में  क्लोरपाइरीफॉस और डाइथेन एम-45 का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी तुलना नीम के तेल से बने कीटनाशकों से की गई। इसके लिए प्याज की जड़ की सक्रिय कोशिकाओं को मॉडल के रूप में इस्तेमाल किया गया। शोध में पाया गया कि क्लोरपाइरीफॉस और डाइथेन एम-45 ने कोशिका विभाजन को सबसे अधिक प्रभावित किया। इसके मुकाबले नीम तेल का प्रभाव काफी कम रहा।

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इससे पहले नहीं हुआ है इन दो रसायनों का तुलनात्मक शोध
डाॅ. नीलम ठाकुर ने बताया कि क्लोरपाइरीफॉस, डाइथेन एम-45 और नीम के तेल से बने कीटनाशकों का इस तरह से विशलेषणात्मक शोध नहीं हुआ है और न ही इसे कहीं पर प्रकाशित किया गया है। यही कारण है कि यूनिवर्सिटी की ओर से किया गया यह शोध स्कोपस-इंडेक्स्ड स्प्रिंगर नेचर जर्नल ऑफ क्रॉप हेल्थ में प्रकाशित हुआ है, इसका इंपैक्ट फैक्टर 2.8 है।

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एमएससी विद्यार्थियों का शोध प्रकाशित होना बड़ी बात
एमएससी विद्यार्थियों का कहना है कि उनका शोध प्रकाशित होना बड़ी बात है। क्योंकि इस तरह के शोध कार्य बड़े संस्थानों की ओर से किए जाते हैं जिनके प्रकाशन में भी लंबा समय लग जाता है। शोधार्थी सुजाता धीमान और कनिका ने बताया कि इस शोध कार्य में डाॅ. नीलम ठाकुर का उन्हें कदम-कदम पर पूरा सहयोग मिला। इसके अलावा यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने भी इस कार्य के लिए उन्हें पूरा सहयोग किया, जिस कारण आज वे अपने शोध को प्रकाशित करवा पाए हैं।
अध्ययन में कहा गया है कि यह परिणाम नीम तेल को संभावित वनस्पति-आधारित विकल्प के तौर पर देखने का आधार देता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने इसे पूरी तरह सुरक्षित या पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर साबित नहीं किया है। इसके लिए खेत स्तर पर अध्ययन, अन्य जैव-कीटनाशकों के साथ तुलना और लागत-लाभ का आकलन होना अभी बाकी है।

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