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सृष्टि बचाने के लिए शिव ने कंठ में हलाहल किया धारण : आचार्य
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कुनिहार में कथा के दौरान मौजूद लोग। संवाद
शिव महापुराण कथा में सातवें दिन सुनाई समुद्र मंथन की कथा
संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार (सोलन)। शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिव महापुराण कथा के सातवें दिन समुद्र मंथन की कथा का वर्णन किया गया। आचार्य बलवंत शांडिल्य ने कहा कि मानव जीवन का मूल उद्देश्य केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परमात्मा से साक्षात्कार है। उन्होंने शिव भक्ति को जीवन का सर्वोच्च मार्ग बताते हुए कहा कि भगवान शिव सरल, दयालु और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं, जो सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार करते हैं।
शांडिल्य ने समुद्र मंथन और नीलकंठ महादेव के प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि देवताओं और दैत्यों द्वारा किए समुद्र मंथन के दौरान सबसे पहले भयंकर विष हलाहल निकला। इससे समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई। उस समय भगवान शिव ने लोक कल्याण की भावना से उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग त्याग, करुणा और समस्त सृष्टि की रक्षा का प्रतीक है।
कथा में भस्म, रुद्राक्ष और शिवलिंग पूजन की महिमा का विस्तार से उल्लेख किया गया। आचार्य ने बताया कि भस्म जीवन की नश्वरता का बोध कराती है, रुद्राक्ष मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करता है, जबकि शिवलिंग सृष्टि के आदि-अनादि स्वरूप का प्रतीक है। इनके पूजन से मनुष्य को आत्मिक बल, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। कथा के समापन पर भजन-कीर्तन, आरती और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार (सोलन)। शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिव महापुराण कथा के सातवें दिन समुद्र मंथन की कथा का वर्णन किया गया। आचार्य बलवंत शांडिल्य ने कहा कि मानव जीवन का मूल उद्देश्य केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परमात्मा से साक्षात्कार है। उन्होंने शिव भक्ति को जीवन का सर्वोच्च मार्ग बताते हुए कहा कि भगवान शिव सरल, दयालु और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं, जो सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार करते हैं।
शांडिल्य ने समुद्र मंथन और नीलकंठ महादेव के प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि देवताओं और दैत्यों द्वारा किए समुद्र मंथन के दौरान सबसे पहले भयंकर विष हलाहल निकला। इससे समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई। उस समय भगवान शिव ने लोक कल्याण की भावना से उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग त्याग, करुणा और समस्त सृष्टि की रक्षा का प्रतीक है।
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कथा में भस्म, रुद्राक्ष और शिवलिंग पूजन की महिमा का विस्तार से उल्लेख किया गया। आचार्य ने बताया कि भस्म जीवन की नश्वरता का बोध कराती है, रुद्राक्ष मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करता है, जबकि शिवलिंग सृष्टि के आदि-अनादि स्वरूप का प्रतीक है। इनके पूजन से मनुष्य को आत्मिक बल, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। कथा के समापन पर भजन-कीर्तन, आरती और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
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