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नौणी विवि का शोध: फूलों के वेस्ट से बनेगी हर्बल अगरबत्ती
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धार्मिक स्थलों के अपशिष्ट फूलों से होंगी तैयार, पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार
रासायनिक और कोयला आधारित अगरबत्तियों का बनेगा एक विकल्प
संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। नौणी के फ्लोरीकल्चर एवं लैंडस्केपिंग विभाग के विशेषज्ञों ने पुष्प अपशिष्ट के उपयोग और पुष्पोत्पादन में वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पर्यावरण-अनुकूल हर्बल अगरबत्तियां विकसित करने सफलता हासिल की है। यह शोध न केवल पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित होगा, बल्कि धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में बर्बाद होने वाले फूलों को भी नया जीवन देगा।
भारतीय संस्कृति में धूप और अगरबत्ती का उपयोग सदियों से पूजा, ध्यान और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में शांत एवं पवित्र वातावरण बनाने के लिए किया जाता रहा है। वेदों और पुराणों में भी इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से उल्लेख है। इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए नौणी विवि ने विकसित की गई इन हर्बल अगरबत्तियों में किसी भी प्रकार के हानिकारक रसायनों का प्रयोग नहीं किया गया है। इन्हें तैयार करने के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग किया गया है। इसमें फूलों की पंखुड़ियों का चूर्ण, चंदन पाउडर, जटामांसी, गुग्गुल, कपूर और लौंग, शहद, गुड़, तिल का तेल, घी और गंगाजल, बाइंडिंग के लिए गाय के गोबर के उपलों का चूर्ण लिया है। ये सभी सामग्रियां न सिर्फ अगरबत्तियों को एक बेहद मनमोहक और प्राकृतिक सुगंध प्रदान करती हैं, बल्कि इनके पारंपरिक एवं आध्यात्मिक महत्व को भी बनाए रखती हैं। इस विशेष शोध का मुख्य उद्देश्य उन फूलों का सदुपयोग करना है जो मंदिरों, गुरुद्वारों व अन्य धार्मिक स्थलों पर चढ़ावे के बाद, या फिर विवाह समारोहों, सरकारी कार्यक्रमों और बाजारों में अधिक उत्पादन के कारण अकर बेकार होकर कचरे में फेंक दिए जाते हैं। इसके व्यावसायिक उत्पादन से बाजार में मिलने वाली घातक रासायनिक और कोयला-आधारित अगरबत्तियों पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकेगा, जो सेहत और हवा दोनों को नुकसान पहुंचाती हैं।
खुलेंगे आजीविका के द्वार
विवि का यह नवाचार केवल शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक स्थानीय फूल उत्पादकों को उनके बचे हुए फूलों की सही कीमत दिलाएगी। स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण युवाओं के लिए यह स्वरोजगार का एक बेहतरीन जरिया बन सकता है।
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रासायनिक और कोयला आधारित अगरबत्तियों का बनेगा एक विकल्प
संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। नौणी के फ्लोरीकल्चर एवं लैंडस्केपिंग विभाग के विशेषज्ञों ने पुष्प अपशिष्ट के उपयोग और पुष्पोत्पादन में वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पर्यावरण-अनुकूल हर्बल अगरबत्तियां विकसित करने सफलता हासिल की है। यह शोध न केवल पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित होगा, बल्कि धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में बर्बाद होने वाले फूलों को भी नया जीवन देगा।
भारतीय संस्कृति में धूप और अगरबत्ती का उपयोग सदियों से पूजा, ध्यान और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में शांत एवं पवित्र वातावरण बनाने के लिए किया जाता रहा है। वेदों और पुराणों में भी इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से उल्लेख है। इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए नौणी विवि ने विकसित की गई इन हर्बल अगरबत्तियों में किसी भी प्रकार के हानिकारक रसायनों का प्रयोग नहीं किया गया है। इन्हें तैयार करने के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग किया गया है। इसमें फूलों की पंखुड़ियों का चूर्ण, चंदन पाउडर, जटामांसी, गुग्गुल, कपूर और लौंग, शहद, गुड़, तिल का तेल, घी और गंगाजल, बाइंडिंग के लिए गाय के गोबर के उपलों का चूर्ण लिया है। ये सभी सामग्रियां न सिर्फ अगरबत्तियों को एक बेहद मनमोहक और प्राकृतिक सुगंध प्रदान करती हैं, बल्कि इनके पारंपरिक एवं आध्यात्मिक महत्व को भी बनाए रखती हैं। इस विशेष शोध का मुख्य उद्देश्य उन फूलों का सदुपयोग करना है जो मंदिरों, गुरुद्वारों व अन्य धार्मिक स्थलों पर चढ़ावे के बाद, या फिर विवाह समारोहों, सरकारी कार्यक्रमों और बाजारों में अधिक उत्पादन के कारण अकर बेकार होकर कचरे में फेंक दिए जाते हैं। इसके व्यावसायिक उत्पादन से बाजार में मिलने वाली घातक रासायनिक और कोयला-आधारित अगरबत्तियों पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकेगा, जो सेहत और हवा दोनों को नुकसान पहुंचाती हैं।
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विवि का यह नवाचार केवल शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक स्थानीय फूल उत्पादकों को उनके बचे हुए फूलों की सही कीमत दिलाएगी। स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण युवाओं के लिए यह स्वरोजगार का एक बेहतरीन जरिया बन सकता है।
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