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चार दिन में हॉस्टलों में दो छात्रों की मौत पर उठे सवाल

Tue, 31 Jul 2018 11:11 PM IST
Updated Tue, 31 Jul 2018 11:11 PM IST
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चार दिन में हॉस्टलों में दो छात्रों की मौत पर उठे सवाल
अमर उजाला - फोटो : amarujala
सोलन। जिले में चार दिन में एक छात्र और छात्रा ने हॉस्टलों में आत्महत्या कर ली। सवाल उठ रहे हैं कि कहीं हॉस्टलों ने विद्यार्थियों पर हद से ज्यादा दबाव तो नहीं डाला जा रहा है। पहले कुमारहट्टी में 12वीं के छात्र ने हॉस्टल में न रहने की जिद्द पर चूहे मारने की दवा खाकर जान दे दी और अब नर्सिगिं कॉलेज की प्रशिक्षु ने हॉस्टल की पांचवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। सूत्र बता रहे हैं कि छात्रा ने असाइनमेंट पूरी नहीं की थी, इसी वजह से छात्रा को कॉलेज प्रबंधन ने छुट्टी नहीं दी थी। कुमारहट्टी में हॉस्टल में पढ़ने वाला छात्र किन्नौर तो प्रशिक्षु छात्रा शिमला की है। यह भी सवाल उठ रहा है कि बाहरी जिले के छात्र हॉस्टलों में कहीं न कहीं तनाव में रह रहे हैं। उधर, मनोचिकित्सक का कहना है कि ऐसी मनोस्थिति में फंसे छात्र अचानक कदम नहीं उठाते हैं। उनके दिमाग में महीनों तक सुसाइड की योजना चलती रही हैं। रोज वे इससे बचने का प्रयास करते हैं, लेकिन आखिर में कड़ा कदम उठा लेते हैं। इस दौरान यदि उन्हें कोई संभाल लेता, उनकी व्यथा सुनता और उसका निदान करता तो शायद दोनों बच्चे जीवित होते।
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इन दोनों मामलों में भले ही हालात जुदा हों मगर सिलसिलेवार हुई आत्महत्या के कारण एक जैसे ही हैं। अमर उजाला ने इस बारे में आईजीएमसी शिमला में मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. रवि से खास बातचीत की। उनका कहना है कि बच्चों में सहनशीलता खत्म हो चुकी है। अभिभावक खुद बच्चों को आरामपरस्त बना रहे हैं। बच्चों को योगाभ्यास और समूह में बैठाने की जगह उन्हें मोबाइल या लैपटॉप देकर जाने-अनजाने में भीड़ से खुद ही अलग कर रहे हैं। उनमें हालात का सामना करने की क्षमता कम हो रही है और अचानक कोई बड़ी चुनौती सामने देखकर वे घबराकर ऐसे संगीन कदम उठा रहे हैं। डॉ. रवि की मानें तो जब बच्चे 16 साल की उम्र पूरी कर लेते हैं तो अभिभावकों को उनसे मित्रता का भाव रखना चाहिए। ताकि उनमें अकेलापन न पनप सके।
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हॉस्टल में दाखिले से पूर्व होनी चाहिए काउंसलिंग
डॉ. रवि के अनुसार घर में परिजनों को बच्चे से योगभ्यास करवाना चाहिए। जब उसे बाहर किसी कॉलेज या हॉस्टल में डाला जाता है तो वहां उसकी काउंसलिंग होनी चाहिए। कॉलेज प्रबंधन को भी इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है। बच्चे को हॉस्टल में दाखिल करने से पूर्व उसकी पूरी काउंसलिंग होनी जरूरी है। यह दाखिले के समय ही तय हो जाना चाहिए कि बच्चा क्या करना चाहता है और वह क्या कर सकता है।
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सहनशीलता और तनाव प्रबंधन का पाठ जरूरी
परिवार, स्कूल व समाज में सहनशीलता का पाठ पढ़ाना जरूरी है। पूर्व के समय में बुजुर्गों से बच्चे सहनशीलता की दीक्षा लेते थे। लेकिन अब एकल परिवार में बुजुर्ग से यह मेलमिलाप कम हो गया है। आत्महत्या जैसे संगीन कदम की एक बड़ी वजह यह भी बन रही है। उन्होंने बताया कि बच्चों को तनाव प्रबंधन आना चाहिए। जब वे तनाव में हैं तो कैसे बाहर आ सकते हैं। स्कूल, कॉलेज या अन्य संस्थानों को बच्चों पर पढ़ाई का बोझ लादने के साथ ही उन्हें इस काबिल बनाने पर भी जोर देना होगा कि वे इस बोझ को सहन कर सकें।
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