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नौणी विवि में सोलन, शिमला और सिरमौर के किसानों ने सीखे मधुमक्खी पालन के गुर
Updated Tue, 26 Dec 2017 10:41 PM IST
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फरीदाबाद
- फोटो : self
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नौणी (सोलन)। कम निवेश-कम खर्चा और लाभ दोगुना। मधुमक्खी पालन में यह सबकुछ है। मौन पालन स्वरोजगार का एक अच्छा जरिया साबित हो रहा है। यही नहीं मधुमक्खी पालन से जहां शहद बेचकर मुनाफा कमाया जाता है वहीं परागण के लिए बागवान बगीचों में मधुमक्खियों के बक्शे रखवाने के लिए भी पैसा देते हैं। नौणी विवि के कीट विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने बेरोजगारों से आह्वान किया है कि वह मौन पालन को बतौर व्यवसाय अपनाकर पैसा कमा सकते हैं।
डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विवि नौणी में कीट विज्ञान विभाग के सौजन्य से आयोजित सात दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में युवाओं को मौन पालन की जानकारी दी गई। शिविर का आयोजन राष्ट्रीय माधवी परिषद (नेशनलबी बोर्ड) के सौजन्य से किया गया। शिविर में सोलन, सिरमौर और शिमला जिलों के 25 किसानों ने भाग लिया। उद्यानिकी कॉलेज के डीन डॉ. नरेंद्र शर्मा ने किसानों को सर्टिफिकेट बांटे और पारंपरिक मधुमक्खी पालन को बतौर व्यवसाय अपनाने का आह्वान किया। बताया कि वह गांवों में जाकर अन्य लोगों को भी इसके प्रति जागरूक करें। इस मौके पर कीट विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ अंजू खन्ना भी मौजूद रहीं। विभाग के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र कुमार गुप्ता ने मौन पालन के लिए अच्छे प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। एकीकृत मधुमक्खी पालन विकास परियोजना के समन्वयक ववरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हरीश शर्मा ने पर परागण प्रक्रिया बारे जानकारी दी। कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य मौन पालन का प्रबंधन, परागण और मधुमक्खी से जुड़ी बीमारियों के बारे में जानकारी देना था। बताया कि लोग छोटे स्तर पर इसे शुरू कर सकते हैं। यह शिविर बजौरा, नेरी और किन्नौर में भी आयोजित किए जाएंगे। इस अवसर पर कीट विज्ञान विभाग के डॉ. देवेंद्र गुप्ता, डा. किरण राणा और डा. मीना ठाकुर भी मौजूद रहीं।
1500 मीट्रिक टन शहद का हो रहा उत्पादन
प्रदेश में इस समय करीब डेढ़ हजार किसान व्यावसायिक रूप से मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। इन उत्पादकों के माध्यम से साल भर में करीब 1500 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन होता है। छोटे स्तर पर उत्पादन कर रहे पालक सीमित क्षेत्र में हैं। बड़े स्तर के उत्पादक प्रदेश और अन्य राज्यों में शहद का कारोबार कर रहे हैं। इससे यह कारोबार तेजी के साथ पूरे प्रदेश में फैला रहा है।
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दो तरह की मधुमक्खियों का उत्पादन
प्रदेश में दो तरह की मधुमक्खियों का पालन हो रहा है। इनमें विदेशी प्रजाति की करीब 80 हजार मधुमक्खियों का पालन इस समय हो रहा है। इटालियन प्रजाति एपिसमोलिफर ज्यादा शहद की वजह से लोकप्रिय हो रही है। देसी प्रजाति की मधुमक्खी जिसमें एपिसिराना शामिल है। इस प्रजाति की मधुमक्खी ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में पाई जाती है। इस प्रजाति का पालन कम हो रहा है जिसे बढ़ाने को लेकर वैज्ञानिक प्रयासरत हैं।
नगरोटा बगवां में लांच हुई थी एपिसमोलिफर
इटालियन मधुमक्खी एपिसमोलिफर को सबसे पहले कांगड़ा जिला के नगरोटा बगवां में लांच किया था। वर्ष 1962 में इटली से लाई यह प्रजाति नगरोटा बगवां से फिर समूचे उत्तर भारत में फैल गई। अब प्रदेश में ही इस प्रजाति की 80 हजार संख्या हो चुकी है और इसमें बढ़ोत्तरी लगातार जारी है।
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डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विवि नौणी में कीट विज्ञान विभाग के सौजन्य से आयोजित सात दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में युवाओं को मौन पालन की जानकारी दी गई। शिविर का आयोजन राष्ट्रीय माधवी परिषद (नेशनलबी बोर्ड) के सौजन्य से किया गया। शिविर में सोलन, सिरमौर और शिमला जिलों के 25 किसानों ने भाग लिया। उद्यानिकी कॉलेज के डीन डॉ. नरेंद्र शर्मा ने किसानों को सर्टिफिकेट बांटे और पारंपरिक मधुमक्खी पालन को बतौर व्यवसाय अपनाने का आह्वान किया। बताया कि वह गांवों में जाकर अन्य लोगों को भी इसके प्रति जागरूक करें। इस मौके पर कीट विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ अंजू खन्ना भी मौजूद रहीं। विभाग के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र कुमार गुप्ता ने मौन पालन के लिए अच्छे प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। एकीकृत मधुमक्खी पालन विकास परियोजना के समन्वयक ववरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हरीश शर्मा ने पर परागण प्रक्रिया बारे जानकारी दी। कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य मौन पालन का प्रबंधन, परागण और मधुमक्खी से जुड़ी बीमारियों के बारे में जानकारी देना था। बताया कि लोग छोटे स्तर पर इसे शुरू कर सकते हैं। यह शिविर बजौरा, नेरी और किन्नौर में भी आयोजित किए जाएंगे। इस अवसर पर कीट विज्ञान विभाग के डॉ. देवेंद्र गुप्ता, डा. किरण राणा और डा. मीना ठाकुर भी मौजूद रहीं।
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1500 मीट्रिक टन शहद का हो रहा उत्पादन
प्रदेश में इस समय करीब डेढ़ हजार किसान व्यावसायिक रूप से मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। इन उत्पादकों के माध्यम से साल भर में करीब 1500 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन होता है। छोटे स्तर पर उत्पादन कर रहे पालक सीमित क्षेत्र में हैं। बड़े स्तर के उत्पादक प्रदेश और अन्य राज्यों में शहद का कारोबार कर रहे हैं। इससे यह कारोबार तेजी के साथ पूरे प्रदेश में फैला रहा है।
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दो तरह की मधुमक्खियों का उत्पादन
प्रदेश में दो तरह की मधुमक्खियों का पालन हो रहा है। इनमें विदेशी प्रजाति की करीब 80 हजार मधुमक्खियों का पालन इस समय हो रहा है। इटालियन प्रजाति एपिसमोलिफर ज्यादा शहद की वजह से लोकप्रिय हो रही है। देसी प्रजाति की मधुमक्खी जिसमें एपिसिराना शामिल है। इस प्रजाति की मधुमक्खी ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में पाई जाती है। इस प्रजाति का पालन कम हो रहा है जिसे बढ़ाने को लेकर वैज्ञानिक प्रयासरत हैं।
नगरोटा बगवां में लांच हुई थी एपिसमोलिफर
इटालियन मधुमक्खी एपिसमोलिफर को सबसे पहले कांगड़ा जिला के नगरोटा बगवां में लांच किया था। वर्ष 1962 में इटली से लाई यह प्रजाति नगरोटा बगवां से फिर समूचे उत्तर भारत में फैल गई। अब प्रदेश में ही इस प्रजाति की 80 हजार संख्या हो चुकी है और इसमें बढ़ोत्तरी लगातार जारी है।