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सिरमौर के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लगाई जाती हैं नाल बड़ियां

Mon, 13 Dec 2021 11:39 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 13 Dec 2021 11:39 PM IST
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women of sirmaur villages making naal badiyan  in these days with singing and dancing
सिरमौर जिला के पच्छाद इलाके बढ़ाल गांव में नाल बड़ियां (डंडी) लगातीं महिलाएं। - फोटो : NAHAN
नाहन (सिरमौर)। सिरमौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोगों ने पारंपरिक राीति-रिवाज और प्रथाएं संजोकर रखीं हैं। इनमें एक है नाल बड़ियां (डंडी) लगाने की प्रथा। आधुनिकता की इस चकाचौंध में जहां एक ओर हमारे पारंपरिक रीति-रिवाज और प्रथाएं समाप्त हो रहीं हैं वहीं कुछ ही ग्रामीण क्षेत्रों में यह पारंपरिक प्रथाएं शेष रह गई हैं।
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धारटीधार, सैनधार और पच्छाद क्षेत्र में आज भी नाल बड़ियां लगाई जाती हैं। बुजुर्गों के अनुसार पूर्व में यह कार्यक्रम बड़े धूमधाम से मनाया जाता था। आधुनिकता की चकाचौंध में अब इसकी जगह मोबाइल, टीवी और अन्य मनोरंजन के साधनों ने ले ली है।
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बुजुर्ग विद्या देवी, कांता देवी और लाजवंती देवी बताती हैं कि यह आयोजन मार्गशीर्ष की संक्रांति से शुरू होता है और पूरे महीने चलता है। पूरे गांव में हर घर में बारी-बारी से इसका आयोजन किया जाता है। उन्होंने बताया कि पहले इस कार्यक्रम का आयोजन बहुत शानदार ढंग से होता था। पूरे गांव को आयोजन के लिए आमंत्रित किया जाता था। शाम के समय गांव की सारी महिलाएं एकत्रित होकर इन्हें लगाती थीं। इस दौरान पारंपरिक गीत भी गाए जाते थे।
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उन्होंने बताया कि दावत अनुसार लोगों को उबली हुई मक्की शकर के साथ, कोलथी व गेहूं का मूड़ा खाने को दिया जाता था। वर्तमान में मक्की, गेहूं और कोलथी का मुड़ा नहीं बनाया जाता। अब इसके स्थान पर काले चने एवं अन्य सामग्री लोगों में बांटी जाती है। इसके अलावा चायपान की व्यवस्था की जाती है। जिस घर में नाल बड़ियां लगाने का कार्यक्रम होता है, वहां इसके बाद महिलाओं की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था। इसमें पारंपरिक गीत, पहाड़ी कल्चर और स्वांग आदि किए जाते थे। वर्तमान समय में ऐसे आयोजनों का प्रचलन बहुत कम हो गया है। पहले की तरह अब लोग इसमें इतनी दिलचस्पी भी नहीं लेते हैं।

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क्या है नाल बड़ियां (डंडी):
उड़द, चना सहित अन्य दालों को पीसा जाता है। फिर इसे आटे की तरह गूंथा जाता है। इसके बाद अरबी के डंडियों में इस गूथें हुए मिश्रण की पुताई की जाती है। इसे एक रस्सी में टांगा जाता है। दूसरे दिन इन्हें छोटे-छोटे पीसों में काटकर सुखाया जाता है। करीब एक सप्ताह तक सुखाने के बाद इसे सुरक्षित रख दिया जाता है। इस तरह से यह एक स्वादिष्ट खाद्य व्यंजन तैयार हो जाता है। खासकर मेहमानवाजी के लिए इस व्यंजन को परोसा जाता है। बुजुर्गों के अनुसार यह एक स्वादिष्ट और गुणकारी खाद्य सामग्री है।
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