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पद्मश्री बाबा इकबाल अंतिम सांस तक बड़ू साहिब से जुड़े रहे

Sat, 29 Jan 2022 11:12 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sat, 29 Jan 2022 11:12 PM IST
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Padmashree Baba Iqbal remained associated with Badu Sahib till death
बड़ू साहिब में बाबा इकबाल सिंह के पार्थिव देह को गुरुद्वारे की ओर ले जाती एंबुलेंस। - फोटो : NAHAN
राजगढ़ (सिरमौर)। शिरोमणि पंथ रत्तन बाबा इकबाल सिंह (बाबा जी) का जन्म भले ही पंजाब में हुआ लेकिन उनकी कर्मभूमि हिमाचल और तपोभूमि बडू साहिब रही।
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उन्होंने शिक्षा ग्रहण करने के बाद हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग में दशकों तक सेवाएं दीं। वर्ष 1965 से ही वह संत तेजा सिंह जी की प्रेरणा से बडू साहिब से जुड़े। वह ऐसा वक्त था जब इस दुर्गम स्थान तक पैदल चलकर आना भी कठिन था।
उस समय भी उन्होंने यहां मिट्टी के एक कच्चे मकान और गुरुद्वारे से सामाजिक और आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। वर्ष 1986-87 में निदेशक कृषि विभाग से सेवानिवृत्त होने पर उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी यहां पक्का गुरुद्वारा बनाने में खर्च कर दी। उस समय कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इतने दुर्गम क्षेत्र में कोई विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थान और विश्व प्रसिद्ध गुरुद्वारा भी बनेगा। यह उनके तप और संत अतर सिंह और संत तेजा सिंह जी के आशीर्वाद का फल था कि बाबा इकबाल सिंह बडू साहिब के होकर रह गए और इस स्थान का नाम देश ही नहीं, अपितु विश्व में स्थापित किया।
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ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्ता युक्त शिक्षा की उनकी सोच का परिणाम रहा कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में 129 अकादमियां और दो विश्वविद्यालय स्थापित किए। भले ही ट्रस्ट की अधिकतर अकादमियां पंजाब में थी मगर बाबा इकबाल सिंह का गहरा लगाव सिरमौर के बडू साहिब से ही रहा। यही कारण था कि उन्होंने ट्रस्ट का मुख्य कार्यालय बडू साहिब ही रखा और वह स्वयं भी अधिकतर यहीं पर एक मिट्टी की बनी आधुनिक सुविधायुक्त झोपड़ी में भूमि पर ही शयन कर तपस्या में लीन रहते थे।
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उनके बडू साहिब से इस लगाव की परिणीति उनके अंतिम सांस यहीं लेने पर ही पूरी हुई। जहां उनकी आत्मा अनंत में विलीन हुई। उनकी देह बडू साहिब की मिट्टी में मिलकर उनकी उपस्थिति का आभास उनके अनुयायियों को दिलाती रहेगी।
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