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भूस्खलन से परेशान ग्रामीण स्थानांतरित होने को मजबूर
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सिरमौर जिला के भुजौन पंचायत का आबड़ा गांव भूस्खलन की जद में आने से ग्रामीण परेशान।
- फोटो : NAHAN
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सतौन (सिरमौर)। कई दशक बीत गए, पर आबड़ा गांव की समस्या आज भी जस की तस है। लोग जी तो रहे हैं लेकिन रात को कब भूस्खलन चपेट में ले ले इसका अंदाजा लगाया जाना मुश्किल है। हर तरफ खौफ है। रात को भी ग्रामीणों को यही डर सताए रहता है कि उनकी अगली सुबह हो पाएगी या नहीं। यहां बात हो रही है ट्रांसगिरि इलाके की भुजौन पंचायत के आबड़ा की।
यहां भूस्खलन का खतरा पूरे गांव पर मंडरा रहा है। 1978 के बाद कई दशक बीत चुके हैं लेकिन इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया। आज तक ग्रामीणों की सैकड़ों बीघा उपजाऊ भूमि भूस्खलन की चपेट में आ चुकी है। ग्रामीण भूस्खलन से बचने के लिए दो से तीन बार दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं। वहां भी भूस्खलन उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है।
ग्रामीणों के घर, खेत और खलियान सब बर्बाद हो चुके हैं। यहां भूस्खलन बरसात के दौरान ही नहीं बल्कि सूखे मौसम में भी लगातार जारी है। हालांकि, कई बार ग्रामीणों ने प्रशासन को इस बारे में चेताया, फिर भी जमीनी स्तर पर आजतक कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई। बीते दिन तहसीलदार कमरऊ मौके का मुआयना करने पहुंचे।
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उन्होंने पाया कि इस गांव में भूस्खलन से तीन अन्य गांव भी खतरे की जद में आ गए हैं। पहाड़ी पर बसे बाग आबड़ा के साथ-साथ इसके नीचे अंबोण और जानणिया गांव भी खतरे की जद में हैं। इस भूस्खलन से अंबोण और जानणिया गांव के एक बड़े भू-भाग का अस्तित्व तक मिट गया है। मौजूदा समय में आबड़ा गांव में भूस्खलन वाली जगह से 100 मीटर अंदर तक दरारें आ चुकी हैं। एक दर्जन परिवारों के घर भी इससे अछूते नहीं।
लगभग 30 बीघा जमीन भूस्खलन की चपेट में है। कई लोगों ने मजबूरन अब दूसरी जगह घर बना लिए हैं। एक प्राथमिक पाठशाला भी दूसरी जगह शिफ्ट हो चुकी है। ग्रामीण माताराम भूस्खलन के चलते तीसरी जगह अपना बना चुके हैं। इनका इससे पहले दो जगह बनाए मकान गिर चुके हैं।
पंचायत प्रधान गुलाब सिंह चौधरी ने बताया कि बाग आबड़ा गांव में 1978 से भूस्खलन हो रहा है। कई बार सरकार को इस बारे में अवगत करवा चुके हैं लेकिन आज तक जमीनी स्तर और गांव बचाने के कोई उपाय नहीं किए गए हैं। तहसीलदार कमरऊ नवरोतम सिंह ने बताया कि मौके पर जाकर हालात का जायजा ले लिया गया है। मौके पर घरों में दरारें आई हैं। जमीन भी उबड़ खाबड़ हो चुकी है। विस्तृत रिपोर्ट एसडीएम पांवटा को भेजी जा रही है।
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यहां भूस्खलन का खतरा पूरे गांव पर मंडरा रहा है। 1978 के बाद कई दशक बीत चुके हैं लेकिन इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया। आज तक ग्रामीणों की सैकड़ों बीघा उपजाऊ भूमि भूस्खलन की चपेट में आ चुकी है। ग्रामीण भूस्खलन से बचने के लिए दो से तीन बार दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं। वहां भी भूस्खलन उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है।
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ग्रामीणों के घर, खेत और खलियान सब बर्बाद हो चुके हैं। यहां भूस्खलन बरसात के दौरान ही नहीं बल्कि सूखे मौसम में भी लगातार जारी है। हालांकि, कई बार ग्रामीणों ने प्रशासन को इस बारे में चेताया, फिर भी जमीनी स्तर पर आजतक कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई। बीते दिन तहसीलदार कमरऊ मौके का मुआयना करने पहुंचे।
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उन्होंने पाया कि इस गांव में भूस्खलन से तीन अन्य गांव भी खतरे की जद में आ गए हैं। पहाड़ी पर बसे बाग आबड़ा के साथ-साथ इसके नीचे अंबोण और जानणिया गांव भी खतरे की जद में हैं। इस भूस्खलन से अंबोण और जानणिया गांव के एक बड़े भू-भाग का अस्तित्व तक मिट गया है। मौजूदा समय में आबड़ा गांव में भूस्खलन वाली जगह से 100 मीटर अंदर तक दरारें आ चुकी हैं। एक दर्जन परिवारों के घर भी इससे अछूते नहीं।
लगभग 30 बीघा जमीन भूस्खलन की चपेट में है। कई लोगों ने मजबूरन अब दूसरी जगह घर बना लिए हैं। एक प्राथमिक पाठशाला भी दूसरी जगह शिफ्ट हो चुकी है। ग्रामीण माताराम भूस्खलन के चलते तीसरी जगह अपना बना चुके हैं। इनका इससे पहले दो जगह बनाए मकान गिर चुके हैं।
पंचायत प्रधान गुलाब सिंह चौधरी ने बताया कि बाग आबड़ा गांव में 1978 से भूस्खलन हो रहा है। कई बार सरकार को इस बारे में अवगत करवा चुके हैं लेकिन आज तक जमीनी स्तर और गांव बचाने के कोई उपाय नहीं किए गए हैं। तहसीलदार कमरऊ नवरोतम सिंह ने बताया कि मौके पर जाकर हालात का जायजा ले लिया गया है। मौके पर घरों में दरारें आई हैं। जमीन भी उबड़ खाबड़ हो चुकी है। विस्तृत रिपोर्ट एसडीएम पांवटा को भेजी जा रही है।