{"_id":"6aad2b20c10bb62a53096ef2","slug":"ginger-crops-followup-nahan-news-c-177-1-nhn1001-189227-2026-09-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Sirmour News: अदरक की फसल को फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट से बचाने के लिए कृषि विभाग ने जारी की सलाह","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Sirmour News: अदरक की फसल को फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट से बचाने के लिए कृषि विभाग ने जारी की सलाह
विज्ञापन
फोलोअप
-गिरिपार क्षेत्र में अदरक की फसल में मिला रोग का प्रकोप, किसानों को खेत की स्वच्छता और उचित जल निकासी पर जोर देने के निर्देश
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में अदरक की फसल में फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट रोग का प्रकोप पाए जाने के बाद कृषि विभाग ने किसानों के लिए रोग प्रबंधन संबंधी सलाह जारी की है। कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के वैज्ञानिकों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करने के बाद किसानों को फसल को रोग से बचाने के लिए आवश्यक सावधानियां बरतने का आग्रह किया है।
उपनिदेशक कृषि डॉ. साहब सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के सह निदेशक एवं वैज्ञानिक प्रभारी डॉ. पंकज मित्तल, परियोजना निदेशक आत्मा डॉ. नवदीप कौंडल तथा संगड़ाह और नाहन विकास खंड के विषय वस्तु विशेषज्ञों ने काकोग गांव में अदरक की फसल का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान फसल में फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट रोग के लक्षण पाए गए। इसके बाद किसानों को रोग की पहचान और प्रभावी प्रबंधन के संबंध में जानकारी दी गई।
पत्तियों पर भूरे धब्बे रोग के प्रमुख लक्षण
कृषि विभाग के अनुसार फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट रोग की शुरुआत अदरक की पत्तियों पर छोटे, गोल अथवा अनियमित आकार के भूरे या गहरे भूरे धब्बों से होती है। रोग बढ़ने पर ये धब्बे आपस में मिलकर पत्तियों के बड़े हिस्से को प्रभावित कर सकते हैं। अधिक संक्रमण होने पर पत्तियां सूखने लगती हैं, जिससे पौधों की वृद्धि और अदरक के कंद के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। लगातार बारिश, अधिक नमी और खेत में उचित वायु संचार का अभाव रोग के प्रसार में सहायक हो सकते हैं।
विज्ञापन
रोग से बचाव के लिए किसानों को ये उपाय अपनाने की सलाह
कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेत में जलभराव न होने दें और जल निकासी की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करें। रोगग्रस्त एवं अत्यधिक संक्रमित पत्तियों को खेत से निकालकर नष्ट करें। फसल के अवशेषों को खेत में न छोड़ें, ताकि रोग के फैलाव की आशंका कम की जा सके। विभाग ने किसानों को नाइट्रोजन उर्वरक के अत्यधिक प्रयोग से बचने तथा मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। पर्याप्त मात्रा में पोटाश का प्रयोग भी पौधों को स्वस्थ रखने में सहायक हो सकता है।
शुरुआती लक्षण दिखते ही करें रोग प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञों की सलाह से अनुशंसित फफूंदनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। विभाग ने ब्लाइटॉक्स (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी) का तीन ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से तथा एमिस्टार टॉप (एजोक्सीस्ट्रोबिन 18.2 प्रतिशत + डाइफेनोकोनाजोल 11.4 प्रतिशत एससी) का लेबल पर निर्धारित मात्रा के अनुसार छिड़काव करने की सलाह दी है।
बारिश के मौसम को देखते हुए दवा के घोल में स्टिकर का प्रयोग करने की बात कही गई है। हालांकि, किसानों को सलाह दी गई है कि वे फफूंदनाशकों का इस्तेमाल हमेशा उत्पाद के लेबल और कृषि विशेषज्ञों के निर्देशों के अनुसार ही करें।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि एक ही फफूंदनाशक का लगातार प्रयोग नहीं करना चाहिए। रोग नियंत्रण के लिए अलग-अलग एफआरएसी समूहों के फफूंदनाशकों का उचित अंतराल पर प्रयोग किया जाना चाहिए। छिड़काव के दौरान पत्तियों की ऊपरी और निचली सतह पर दवा का समान रूप से पहुंचना जरूरी है।-- -- -- -- --
विज्ञापन
-गिरिपार क्षेत्र में अदरक की फसल में मिला रोग का प्रकोप, किसानों को खेत की स्वच्छता और उचित जल निकासी पर जोर देने के निर्देश
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में अदरक की फसल में फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट रोग का प्रकोप पाए जाने के बाद कृषि विभाग ने किसानों के लिए रोग प्रबंधन संबंधी सलाह जारी की है। कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के वैज्ञानिकों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करने के बाद किसानों को फसल को रोग से बचाने के लिए आवश्यक सावधानियां बरतने का आग्रह किया है।
उपनिदेशक कृषि डॉ. साहब सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के सह निदेशक एवं वैज्ञानिक प्रभारी डॉ. पंकज मित्तल, परियोजना निदेशक आत्मा डॉ. नवदीप कौंडल तथा संगड़ाह और नाहन विकास खंड के विषय वस्तु विशेषज्ञों ने काकोग गांव में अदरक की फसल का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान फसल में फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट रोग के लक्षण पाए गए। इसके बाद किसानों को रोग की पहचान और प्रभावी प्रबंधन के संबंध में जानकारी दी गई।
विज्ञापन
पत्तियों पर भूरे धब्बे रोग के प्रमुख लक्षण
कृषि विभाग के अनुसार फाइलोस्टिक्टा ब्लाइट रोग की शुरुआत अदरक की पत्तियों पर छोटे, गोल अथवा अनियमित आकार के भूरे या गहरे भूरे धब्बों से होती है। रोग बढ़ने पर ये धब्बे आपस में मिलकर पत्तियों के बड़े हिस्से को प्रभावित कर सकते हैं। अधिक संक्रमण होने पर पत्तियां सूखने लगती हैं, जिससे पौधों की वृद्धि और अदरक के कंद के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। लगातार बारिश, अधिक नमी और खेत में उचित वायु संचार का अभाव रोग के प्रसार में सहायक हो सकते हैं।
विज्ञापन
रोग से बचाव के लिए किसानों को ये उपाय अपनाने की सलाह
कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेत में जलभराव न होने दें और जल निकासी की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करें। रोगग्रस्त एवं अत्यधिक संक्रमित पत्तियों को खेत से निकालकर नष्ट करें। फसल के अवशेषों को खेत में न छोड़ें, ताकि रोग के फैलाव की आशंका कम की जा सके। विभाग ने किसानों को नाइट्रोजन उर्वरक के अत्यधिक प्रयोग से बचने तथा मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। पर्याप्त मात्रा में पोटाश का प्रयोग भी पौधों को स्वस्थ रखने में सहायक हो सकता है।
शुरुआती लक्षण दिखते ही करें रोग प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञों की सलाह से अनुशंसित फफूंदनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। विभाग ने ब्लाइटॉक्स (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी) का तीन ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से तथा एमिस्टार टॉप (एजोक्सीस्ट्रोबिन 18.2 प्रतिशत + डाइफेनोकोनाजोल 11.4 प्रतिशत एससी) का लेबल पर निर्धारित मात्रा के अनुसार छिड़काव करने की सलाह दी है।
बारिश के मौसम को देखते हुए दवा के घोल में स्टिकर का प्रयोग करने की बात कही गई है। हालांकि, किसानों को सलाह दी गई है कि वे फफूंदनाशकों का इस्तेमाल हमेशा उत्पाद के लेबल और कृषि विशेषज्ञों के निर्देशों के अनुसार ही करें।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि एक ही फफूंदनाशक का लगातार प्रयोग नहीं करना चाहिए। रोग नियंत्रण के लिए अलग-अलग एफआरएसी समूहों के फफूंदनाशकों का उचित अंतराल पर प्रयोग किया जाना चाहिए। छिड़काव के दौरान पत्तियों की ऊपरी और निचली सतह पर दवा का समान रूप से पहुंचना जरूरी है।