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Sirmour News: श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बाद शुरू हुआ डग्याली पर्व
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राजगढ़ क्षेत्र में डग्याली नृत्य करते लोग। स्रोत जागरूक पाठक
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बाद शुरू हुआ डग्याली पर्व
प्रदेश के सिरमौर, शिमला और सोलन जिले के कुछ हिस्सों में आयोजित होते हैं डायनों के नृत्य
वेद प्रकाश ठाकुर
राजगढ़ (सिरमौर)। हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति विविधताओं से भरी हुई है। यहां अनेक प्रकार के रीति रिवाज, प्रथाएं व त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें से एक डगैली (डग्याली) पर्व जिला सिरमौर, शिमला व सोलन में मनाया जाता है। डगैली (डग्याली) पर्व डायनों का पर्व माना जाता है।
वैसे तो यह पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बाद की रात्रि को मनाया जाता है, लेकिन कई स्थानों पर कृष्ण जन्माष्टमी के पांच से आठ दिनों के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी व चौदस के दिन मनाया जाता है। ऐसे में राजगढ़ क्षेत्र सहित अन्य क्षेत्रों में रात को डग्याली नृत्य शुरू हो गए हैं। मान्यता है कि इस दौरान डायनें सक्रिय हो जाती हैं और वह नृत्य करतीं हैं, जिसे आम आदमी नहीं देख सकता है। तांत्रिक व देवताओं के गुर तथा सिद्ध लोग ही देख सकते हैं।
डगैली (डग्याली) को डायनों का पर्व माना जाता है। यह मान्यता है कि इस दौरान डायनें, भूत-पिशाचों की सक्रियता बढ़ जाती है और वह नृत्य करते हैं। इसके चलते लोग उनसे बचने के लिए एक सुरक्षा चक्र बनाकर उचित प्रबंध करते हैं। इन सुरक्षा प्रबंधों की तैयारियां रक्षा बंधन वाले दिन से प्रारंभ हो जाती हैं। रक्षा बंधन वाले दिन जो रक्षा सूत्र पुरोहितों की ओर से अपने यजमानों को बांधे जाते हैं उसे डगैली (डग्याली) पर्व के बाद ही खोला जाता है। इसके अतिरिक्त उस दिन पुरोहितों व देवताओं की गुर (घणितों) की ओर से अभिमंत्रित करके दिए गए चावलों या सरसों के दानों को अपने घरों, पशुशालाओं व खेतों में छिड़का जाता है, ताकि कोई नुकसान न हो। इसके अतिरिक्त भेखल व तिरमल की टहनियों को दरवाजों व खिड़कियों में लगाया जाता है।
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पहली डगैली की रात्रि को सोने से पहले दरवाजे पर खीरा यानि कक्कड़ी की बलि व दूसरी डगैली की रात्रि को अरबी के पतों से बने व्यंजन पतीड़, जिसे स्थानीय भाषा मे धिन्धडे भी कहा जाता है की बलि दी जाती है जिससे बुरी शक्तियां उनके घरों में प्रवेश न कर सकें। यद्यपि आधुनिक व वैज्ञानिक युग में ऐसे त्योहारों पर विश्वास करना कठिन है, मगर फिर भी यह पर्व यहां परंपरा या फिर डायनों के भय के चलते मनाया जाता है। यह कब से और क्यों शुरू हुआ इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं, मगर यह पर्व यहां मनाया जाता है। समय के साथ यह कम होता जा रहा है और चंद परिवार ही इन परंपराओं का पालन करते हैं।
चुड़ेश्वर कला मंच जागल ने इस पर शोध कार्य किया है और इस अदृश्य नृत्य को मंचीय रूप प्रदान किया है। चुड़ेश्वर कला मंच के संस्थापक जोगेंद्र हाब्बी ने बताया कि उनके मंच के पद्मश्री विद्यानंद सरैक व गोपाल हाब्बी ने शोध कार्य किया है और सोलन, शिमला व सिरमौर के ग्रामीण लोगों से वार्तालाप के आधार पर डगैली गीत व डगैली परिधान तैयार किए हैं।
उनका कहना है कि इस शोध कार्य के पीछे उनका मकसद समाज में अंध विश्वास फैलाना नहीं है, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराओं को लुप्त होने से बचाना है तथा देव परंपरा का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। उसी उद्देश्य से उन्होंने इस पर शोध कार्य किया है और काल्पनिक नृत्य तैयार किया है।
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प्रदेश के सिरमौर, शिमला और सोलन जिले के कुछ हिस्सों में आयोजित होते हैं डायनों के नृत्य
वेद प्रकाश ठाकुर
राजगढ़ (सिरमौर)। हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति विविधताओं से भरी हुई है। यहां अनेक प्रकार के रीति रिवाज, प्रथाएं व त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें से एक डगैली (डग्याली) पर्व जिला सिरमौर, शिमला व सोलन में मनाया जाता है। डगैली (डग्याली) पर्व डायनों का पर्व माना जाता है।
वैसे तो यह पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बाद की रात्रि को मनाया जाता है, लेकिन कई स्थानों पर कृष्ण जन्माष्टमी के पांच से आठ दिनों के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी व चौदस के दिन मनाया जाता है। ऐसे में राजगढ़ क्षेत्र सहित अन्य क्षेत्रों में रात को डग्याली नृत्य शुरू हो गए हैं। मान्यता है कि इस दौरान डायनें सक्रिय हो जाती हैं और वह नृत्य करतीं हैं, जिसे आम आदमी नहीं देख सकता है। तांत्रिक व देवताओं के गुर तथा सिद्ध लोग ही देख सकते हैं।
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डगैली (डग्याली) को डायनों का पर्व माना जाता है। यह मान्यता है कि इस दौरान डायनें, भूत-पिशाचों की सक्रियता बढ़ जाती है और वह नृत्य करते हैं। इसके चलते लोग उनसे बचने के लिए एक सुरक्षा चक्र बनाकर उचित प्रबंध करते हैं। इन सुरक्षा प्रबंधों की तैयारियां रक्षा बंधन वाले दिन से प्रारंभ हो जाती हैं। रक्षा बंधन वाले दिन जो रक्षा सूत्र पुरोहितों की ओर से अपने यजमानों को बांधे जाते हैं उसे डगैली (डग्याली) पर्व के बाद ही खोला जाता है। इसके अतिरिक्त उस दिन पुरोहितों व देवताओं की गुर (घणितों) की ओर से अभिमंत्रित करके दिए गए चावलों या सरसों के दानों को अपने घरों, पशुशालाओं व खेतों में छिड़का जाता है, ताकि कोई नुकसान न हो। इसके अतिरिक्त भेखल व तिरमल की टहनियों को दरवाजों व खिड़कियों में लगाया जाता है।
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पहली डगैली की रात्रि को सोने से पहले दरवाजे पर खीरा यानि कक्कड़ी की बलि व दूसरी डगैली की रात्रि को अरबी के पतों से बने व्यंजन पतीड़, जिसे स्थानीय भाषा मे धिन्धडे भी कहा जाता है की बलि दी जाती है जिससे बुरी शक्तियां उनके घरों में प्रवेश न कर सकें। यद्यपि आधुनिक व वैज्ञानिक युग में ऐसे त्योहारों पर विश्वास करना कठिन है, मगर फिर भी यह पर्व यहां परंपरा या फिर डायनों के भय के चलते मनाया जाता है। यह कब से और क्यों शुरू हुआ इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं, मगर यह पर्व यहां मनाया जाता है। समय के साथ यह कम होता जा रहा है और चंद परिवार ही इन परंपराओं का पालन करते हैं।
चुड़ेश्वर कला मंच जागल ने इस पर शोध कार्य किया है और इस अदृश्य नृत्य को मंचीय रूप प्रदान किया है। चुड़ेश्वर कला मंच के संस्थापक जोगेंद्र हाब्बी ने बताया कि उनके मंच के पद्मश्री विद्यानंद सरैक व गोपाल हाब्बी ने शोध कार्य किया है और सोलन, शिमला व सिरमौर के ग्रामीण लोगों से वार्तालाप के आधार पर डगैली गीत व डगैली परिधान तैयार किए हैं।
उनका कहना है कि इस शोध कार्य के पीछे उनका मकसद समाज में अंध विश्वास फैलाना नहीं है, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराओं को लुप्त होने से बचाना है तथा देव परंपरा का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। उसी उद्देश्य से उन्होंने इस पर शोध कार्य किया है और काल्पनिक नृत्य तैयार किया है।