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उतराखंड के धर्मपुर में छापी जाते थे फर्जी बिल, एमफार्म
Updated Thu, 22 Feb 2018 10:20 PM IST
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फर्जी बिल-एम फार्म के मामले में पकड़े गए आराोपी
- फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला ब्यूरो
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पांवटा साहिब (सिरमौर)।
फर्जी बिल और एमफार्म के जरिए हिमाचल की खनन संपदा को दूसरे राज्यों में पहुंचाने का गोरखधंधा करीब एक साल से चल रहा था। बिना किसी क्रशर, पंजीकृत फर्म और खनन की लीज के खनन सामग्री दूसरे राज्य तक पहुंचती रही। पांवटा में पत्रकार वार्ता के दौरान डीएसपी प्रमोद चौहान और एचएचओ अशोक चौहान ने यह खुलासा किया है।
उन्होंने बताया कि खनन सामग्री अवैध रूप से दूसरे राज्य तक मात्र दो हजार प्रति ट्रक के हिसाब से पहुंचाई जा रही थी। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि सितंबर 2017 से जाली बिलों और 10 जनवरी 2018 से जाली एम फार्म लगाए जा रहे थे। उन्होंने बताया कि पांवटा पुलिस ने इस मामले में अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किया है। 25 जनवरी को वन रक्षक की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद जांच शुरू हुई।
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सबसे पहले रोहित दबोचा
पुलिस ने यूपी के छूटमलपुर के रोहित गोयल को सबसे पहले गिरफ्तार किया गया। आरोपी के यमुना एसोसिएट के नाम से फर्जी बिल बुक, एम फार्म और स्टैंप भी बरामद हुई। इसके बाद दूसरा आरोपी देहरादून निवासी आशीष चौधरी को दो फरवरी को गिरफ्तार किया। उससे दो फर्जी बिल बुक नेगी एसोसिएट और देवभूमि एसोसिएट के नाम से बरामद हुई। पूछताछ में कई खुलासे हुए। मटक माजरी से आरोपी अयुब खान से बिल बुक और फर्जी एम फार्म मिले। इसके बाद पातलियों पांवटा निवासी गुरेंद्र पाल को गिरफ्तार किया गया। वह फर्जी एमफार्म का परफोर्मा लेकर अपने ताया के बेटे आरोपी भूपेंद्र सिंह के पास पहुंचा था। एम फार्म परफोर्मा का मास्टर प्रिंट धर्मपुर प्रिंटिंग प्रेस में आरोपी राम किशोर से तैयार करवा कर देहरादून के आरोपी दिनेश कुमार की जनता प्रिंटिंग प्रेस से सैकड़ों फर्जी एम फार्म छपवाए गए।
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साल से चल रहा था गोरखंधंधा, विभाग बेखबर
उत्तराखंड के तिमली वन विभाग बैरियर से पूरा रिकॉर्ड मिलने के बाद मामले का खुलासा हो सकेगा। सवाल यह उठ रहा है कि फर्जी जीएसटी बिल लगने पर इसका तुरंत पता चल सकता था। लेकिन, आबकारी एवं कराधान विभाग को इसकी खबर तक नहीं लगी। पुलिस को एक जीएसटी नंबर मिला है। इसके आधार पर अब आगे की जांच चल रही है। ऐसे में कई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी भी लपेटे में आ सकते हैं। चौंकाने वाला पहलू यह है कि एक साल की अवधि में आबकारी विभाग को करोड़ों का सरकार को चूना लगने का कैसे पता नहीं चल सका? क्या फर्जीवाड़े से इस विभाग के कर्मी अनभिज्ञ थे? या कोई कर्मी इसमें संलिप्त है। मामले की जांच पूरी होने पर ही इसका खुलासा हो सकेगा।