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Sirmour News: धराड़ा-धराड़ी की पूजा कर मनाया आठयो पर्व
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राजगढ़ क्षेत्र में पूजा के लिए पानी के पास धराड़ी ले जाती महिलाएं। संवाद
आग का खेल हूशू भी शुरू
संवाद न्यूज एजेंसी
राजगढ़ (सिरमौर)। राजगढ़ और आसपास के इलाकों में दुर्गा अष्टमी का पर्व, जिसे स्थानीय भाषा में आठयो या धराड़ी कहा जाता है, पारंपरिक अंदाज में मनाया गया। आधुनिक समय में लोगों ने सदियों पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों को निभाते हुए सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया।
दुर्गा अष्टमी पर सुबह ही लोग आसपास की घासनियों से प्राकृतिक रूप से उगने वाले सफेद फूल तोड़कर लाए। इस फूल को स्थानीय भाषा में भुना कहते हैं। इन फूलों के दो बंडल (गुच्छे) बनाए गए। एक को धराड़ा (नर) और दूसरे को धराड़ी (मादा) कहा जाता है। इन्हें विशेष बर्तन या थाली में भव्य रूप से सजाकर पूजा के लिए तैयार किया गया।
शाम को सूर्यास्त के समय गेहूं के मूड़े, अखरोट, गुड़ और देसी घी के साथ धराड़ा-धराड़ी की विधिवत पूजा की गई। इसके बाद इन्हें दाल-चावल का प्रसाद भी अर्पित किया गया। पूजा के बाद पूरा बर्तन पास के जल स्रोत तक ले जाया गया। कई जगह यह परंपरा सामूहिक रूप से निभाई गई। कुछ इलाकों में महिलाएं इस परंपरा को दूसरे ढंग से करती हैं।
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विशेष बात यह है कि जल स्रोत से नर धराड़ा को वापस घर लाकर पूजा स्थल पर रखा गया। इसका प्रयोग वर्षभर परंपरागत देव कार्यों में किया जाएगा। कुछ क्षेत्रों में इसे अगले साल तक पूजा स्थल पर रखा जाता है।
आठयो पर्व देव परंपरा से भी जुड़ा है। इस दिन लोग अपने-अपने कुल देवता और ग्राम देवता के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं, कड़ाह प्रसाद चढ़ाते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। क्षेत्रवासियों का मानना है कि इस तरह के त्योहार समाज को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
आठयो पर्व के साथ ही क्षेत्र में ‘हूशू’ खेल आरंभ हो गया है। यह दीपावली तक चलेगा। हूशू आग के साथ खेला जाने वाला पारंपरिक खेल है। इसमें हर गांव में लोग मंदिर प्रांगण या खुले स्थान पर एकत्र होकर आग का अलाव जलाते हैं। इसे स्थानीय भाषा में ‘घैना’ कहते हैं। इसके बाद लकड़ी के बंडल, जो पहले से बांधकर रखे जाते हैं, को जलाया जाता है और गोल-गोल घुमाया जाता है। इस दौरान पारंपरिक गीत भी गाए जाते हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
राजगढ़ (सिरमौर)। राजगढ़ और आसपास के इलाकों में दुर्गा अष्टमी का पर्व, जिसे स्थानीय भाषा में आठयो या धराड़ी कहा जाता है, पारंपरिक अंदाज में मनाया गया। आधुनिक समय में लोगों ने सदियों पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों को निभाते हुए सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया।
दुर्गा अष्टमी पर सुबह ही लोग आसपास की घासनियों से प्राकृतिक रूप से उगने वाले सफेद फूल तोड़कर लाए। इस फूल को स्थानीय भाषा में भुना कहते हैं। इन फूलों के दो बंडल (गुच्छे) बनाए गए। एक को धराड़ा (नर) और दूसरे को धराड़ी (मादा) कहा जाता है। इन्हें विशेष बर्तन या थाली में भव्य रूप से सजाकर पूजा के लिए तैयार किया गया।
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शाम को सूर्यास्त के समय गेहूं के मूड़े, अखरोट, गुड़ और देसी घी के साथ धराड़ा-धराड़ी की विधिवत पूजा की गई। इसके बाद इन्हें दाल-चावल का प्रसाद भी अर्पित किया गया। पूजा के बाद पूरा बर्तन पास के जल स्रोत तक ले जाया गया। कई जगह यह परंपरा सामूहिक रूप से निभाई गई। कुछ इलाकों में महिलाएं इस परंपरा को दूसरे ढंग से करती हैं।
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विशेष बात यह है कि जल स्रोत से नर धराड़ा को वापस घर लाकर पूजा स्थल पर रखा गया। इसका प्रयोग वर्षभर परंपरागत देव कार्यों में किया जाएगा। कुछ क्षेत्रों में इसे अगले साल तक पूजा स्थल पर रखा जाता है।
आठयो पर्व देव परंपरा से भी जुड़ा है। इस दिन लोग अपने-अपने कुल देवता और ग्राम देवता के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं, कड़ाह प्रसाद चढ़ाते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। क्षेत्रवासियों का मानना है कि इस तरह के त्योहार समाज को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
आठयो पर्व के साथ ही क्षेत्र में ‘हूशू’ खेल आरंभ हो गया है। यह दीपावली तक चलेगा। हूशू आग के साथ खेला जाने वाला पारंपरिक खेल है। इसमें हर गांव में लोग मंदिर प्रांगण या खुले स्थान पर एकत्र होकर आग का अलाव जलाते हैं। इसे स्थानीय भाषा में ‘घैना’ कहते हैं। इसके बाद लकड़ी के बंडल, जो पहले से बांधकर रखे जाते हैं, को जलाया जाता है और गोल-गोल घुमाया जाता है। इस दौरान पारंपरिक गीत भी गाए जाते हैं।

राजगढ़ क्षेत्र में पूजा के लिए पानी के पास धराड़ी ले जाती महिलाएं। संवाद