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पक्षियों के लिए जहरीली हुई कालाअंब की आबोहवा

Tue, 05 Dec 2017 10:15 PM IST
Updated Tue, 05 Dec 2017 10:15 PM IST
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पक्षियों के लिए जहरीली हुई कालाअंब की आबोहवा
‌चिड़िया
संजय गुप्ता
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कालाअंब (सिरमौर)।
औद्योगिक क्षेत्र कालाअंब और इसके आसपास औद्योगिकीकरण के बाद आबोहवा में बदलाव देखने को मिला है। पक्षियों के लिए भी यहां की आबोहवा जहरीली हुई है। यही वजह है कि पक्षियों की कई प्रजातियां या तो यहां से पलायन कर चुकी है या फिर विलुप्त प्राय हो चुकी है।

राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय मोगीनंद के शिवालिक ईको क्लब के पांच छात्रों द्वारा किए गए शोध में यह खुलासा हुआ है। छात्रों के शोध का अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन के लिए चयन हुआ है।
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ईको क्लब के पांच छात्रों अभिषेक, अंजली, रोहित कुमार, संजीव कुमार व ज्योति ने पक्षियों पर अध्ययन किया था। जनवरी में उत्तर प्रदेश में होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस शोध को शामिल किया गया है।
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विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रजाति के पक्षियों पर एक शोध किया है जिसमें यह पाया गया है कि औद्योगिक क्षेत्र कालाअंब, मोगीनंद, बांकाबाड़ा व आसपास के इलाकों में औद्योगिकीकरण के बाद पक्षियों की कई प्रजातियां पलायन कर गईं या फिर लुप्तप्राय हो गईं। शोध अध्ययन के मुताबिक पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों में जंगली कबूतर 80 प्रतिशत, गौरैया चिड़िया 70 प्रतिशत, सफेद पट्टी वाला कौआ 90 प्रतिशत, ककराट 90 से 98 प्रतिशत, नीलकंठ 98 प्रतिशत, फंदी 80 प्रतिशत, उल्लू व टटीहरी 90 से 95 प्रतिशत लुप्तप्राय हो चुके हैं।

इसका मुख्य कारण पर्यावरण का प्रदूषित होना माना जा रहा है। कुछ पक्षी बहुत संवेदनशील प्रवृति के होते हैं जो प्रदूषण रहित वातावरण में ही रह सकते हैं। कुछ पक्षी किसी विशेष पेड़ पर रहना पसंद करते हैं जिसकी पत्तियों या फूलों की सुगंध उन्हें सुहाती है लेकिन प्रदूषण का असर पेड़ों पर भी पड़ा है जिसकी वजह से पत्तियों व फूलों में अब सुगंध नहीं रही। विद्यार्थियों ने पक्षियों के पुनर्वास के लिए भी प्रयास किए हैं। क्षेत्र में विभिन्न पेड़ पौधों पर लकड़ी व प्लास्टिक के डिब्बों से घोंसले बना कर लटकाए।



इस शोध अध्ययन के निदेशक जीव विज्ञान प्रवक्ता डॉ. संजीव अत्री ने बताया कि औद्योगिकीकरण से पहले यहां पक्षियों की काफी संख्या थी जो वर्तमान में शून्य के बराबर हो गई है। स्कूल के प्रधानाचार्य सुरेंद्र शर्मा ने बताया कि विद्यार्थियों के शोध को विज्ञान एवं पर्यावरण अध्ययन केंद्र (सीएसई) तथा इंटेग्रेटेड पर्यावरण शिक्षण संस्थान लखनऊ को भेजा गया था। दोनों संस्थानों की स्वीकृति के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में स्थान मिला है। अब यह छात्र अपने शोध को इस सम्मेलन में प्रस्तुत करेंगे।
 
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