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गिरिपार क्षेत्र में धूमधाम से मनाया बूढ़ी दिवाली का पर्व
Updated Sun, 19 Nov 2017 11:38 PM IST
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दिवाली
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अमर उजाला ब्यूरो
नाहन (सिरमौर)।
गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली का पर्व हर्षोल्लास के शुरू हो गया है। यह पर्व एक सप्ताह तक जारी रहेगा। यह मशराली, बूढ़ी दिवाली, दिआली या मशराली कबायली संस्कृति का जीता जागता प्रमाण है। रविवार तड़के मशालें जलाकर बूढ़ी दिवाली शुरू हो गई।
गिरिपार इलाके में अब एक सप्ताह तक बूढ़ेचू नृत्य, रासे लगाकर गांव के सार्वजनिक स्थल पर यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। गिरिपार इलाके में इस त्योहार को सामान्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस क्षेत्र में महाभारत काल की सभ्यता दिखाई देती है, और ‘बूढ़ी दियाली’ नाम बूढ़ा नृत्य के कारण पड़ा।
दिवाली के पहले दिन को जिसे छोटी अमावस्या या मावस या ‘रूदियाला’ कहा जाता है। जिस तरह होलिका जलाई जाती है, उसी प्रकार एक ‘डाह’ नामक लकड़ियों का ढेर बनाया जाता है। ग्रामीण गांव के बाहर जाकर ‘बलराज’ को जलाते हैं।
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इस अवसर पर ढोल, करनाल, दुमानू, हुड़क आदि बाजे बजाते हुए जाते हैं और बच्चे और नौजवान ‘जले बलराज’ कह कर ‘डाह’ को जलाते हैं। अगले दिन को अमावस्या होती है और इस दिन निम्न जाति के लोग सफेद रंग की पोशाक जिस पर रंगीन फूल कढ़े होते हैं, इसे ‘चोलौं, पहन कर बूढ़ा नृत्य करते हैं और हुड़क बजाते हैं। लोग सुबह-सुबह गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति की सेवा गाता है और उसके घर में अखरोट देता है जिसके बदले मालिक उसे उपहार स्वरूप मूढ़ा पैसे आदि देता है। इस अवसर पर मुख्यत: हारूल गाई जाती है। दिन में रासे लगाए जाते हैं और रात को घरों, खलिहान और यंत्रों पर दीप जलाए जाते हैं।
तीसरा दिन ‘पड़वा’ या ‘भिउरी’ के नाम से जाना जाता है। दिवाली पर मेहमानों का आना-जाना अधिक होता है, खासतौर पर दिवाली में लड़कियां अपने मायके आती हैं और उन्हें उनका दिवाली का हिस्सा दिया जाता है। इस मौके पर गिरिपार क्षेत्र में कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किए जाएंगे।
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नाहन (सिरमौर)।
गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली का पर्व हर्षोल्लास के शुरू हो गया है। यह पर्व एक सप्ताह तक जारी रहेगा। यह मशराली, बूढ़ी दिवाली, दिआली या मशराली कबायली संस्कृति का जीता जागता प्रमाण है। रविवार तड़के मशालें जलाकर बूढ़ी दिवाली शुरू हो गई।
गिरिपार इलाके में अब एक सप्ताह तक बूढ़ेचू नृत्य, रासे लगाकर गांव के सार्वजनिक स्थल पर यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। गिरिपार इलाके में इस त्योहार को सामान्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस क्षेत्र में महाभारत काल की सभ्यता दिखाई देती है, और ‘बूढ़ी दियाली’ नाम बूढ़ा नृत्य के कारण पड़ा।
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दिवाली के पहले दिन को जिसे छोटी अमावस्या या मावस या ‘रूदियाला’ कहा जाता है। जिस तरह होलिका जलाई जाती है, उसी प्रकार एक ‘डाह’ नामक लकड़ियों का ढेर बनाया जाता है। ग्रामीण गांव के बाहर जाकर ‘बलराज’ को जलाते हैं।
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इस अवसर पर ढोल, करनाल, दुमानू, हुड़क आदि बाजे बजाते हुए जाते हैं और बच्चे और नौजवान ‘जले बलराज’ कह कर ‘डाह’ को जलाते हैं। अगले दिन को अमावस्या होती है और इस दिन निम्न जाति के लोग सफेद रंग की पोशाक जिस पर रंगीन फूल कढ़े होते हैं, इसे ‘चोलौं, पहन कर बूढ़ा नृत्य करते हैं और हुड़क बजाते हैं। लोग सुबह-सुबह गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति की सेवा गाता है और उसके घर में अखरोट देता है जिसके बदले मालिक उसे उपहार स्वरूप मूढ़ा पैसे आदि देता है। इस अवसर पर मुख्यत: हारूल गाई जाती है। दिन में रासे लगाए जाते हैं और रात को घरों, खलिहान और यंत्रों पर दीप जलाए जाते हैं।
तीसरा दिन ‘पड़वा’ या ‘भिउरी’ के नाम से जाना जाता है। दिवाली पर मेहमानों का आना-जाना अधिक होता है, खासतौर पर दिवाली में लड़कियां अपने मायके आती हैं और उन्हें उनका दिवाली का हिस्सा दिया जाता है। इस मौके पर गिरिपार क्षेत्र में कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किए जाएंगे।