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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   hp Politics: BJP triumphs in Himachal's Zila Parishads, securing 10 out of 11; victory in Shimla after 26 year

राजनीति: हिमाचल की जिला परिषदों में भाजपा का परचम, 11 में से 10 पर काबिज, शिमला में 26 साल बाद जीत

Thu, 10 Sep 2026 10:46 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 10 Sep 2026 10:46 PM IST
सार

हिमाचल प्रदेश में लाहौल-स्पीति जिले को छोड़कर 11 जिला परिषदों में से 10 में भाजपा समर्थित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष काबिज हुए हैं, जबकि मात्र एक जिला चंबा में ही कांग्रेस के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं। 

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hp Politics: BJP triumphs in Himachal's Zila Parishads, securing 10 out of 11; victory in Shimla after 26 year
शिमला जिप के अध्यक्ष भोपेंद्र सिसोदिया व उपाध्यक्ष भरत क्लांटा समर्थकों के साथ। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश में पंचायतीराज चुनाव के बाद जिला परिषद की सत्ता में भाजपा समर्थितों का दबदबा देखने को मिला है। हिमाचल प्रदेश में लाहौल-स्पीति जिले को छोड़कर 11 जिला परिषदों में से 10 में भाजपा समर्थित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष काबिज हुए हैं, जबकि मात्र एक जिला चंबा में ही कांग्रेस के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं। जिला परिषदों के इन चुनाव परिणाम को प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में भाजपा की मजबूत स्थिति के तौर पर देखा जा रहा है। जिला परिषद में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव के दौरान दोनों प्रमुख दलों ने अपने समर्थित सदस्यों को एकजुट रखने के लिए पूरी ताकत झोंकी। कई जिलों में बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए निर्दलीय और अन्य सदस्यों की भूमिका भी अहम रही। बावजूद अंतिम तस्वीर में भाजपा समर्थित पैनल 10 जिला परिषदों में सत्ता हासिल करने में सफल रहा।

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 चंडीगढ़ में बनी रणनीति निर्णायक साबित हुई
जिला परिषद शिमला के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में भाजपा की जीत के पीछे चंडीगढ़ में बनी रणनीति निर्णायक साबित हुई। चुनाव से ठीक पहले पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता विपक्ष जयराम ठाकुर ने चंडीगढ़ में भाजपा समर्थित जिला परिषद सदस्यों, पार्टी नेताओं और पदाधिकारियों की बैठक लेकर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दिया था। बैठक में सभी सदस्यों को एकजुट रहने का संदेश दिया गया। भाजपा की इस रणनीति का असर चुनाव परिणामों में साफ दिखाई दिया। 25 सदस्यीय जिला परिषद में भाजपा समर्थित सदस्यों की संख्या 13 और कांग्रेस समर्थित सदस्यों की संख्या 12 मानी जा रही थी।

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26 साल बाद शिमला जिला परिषद में भाजपा की जीत
जिला परिषद शिमला के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया है। 26 साल बाद शिमला जिला परिषद में भाजपा ने सत्ता हासिल की है। राजधानी शिमला के उपायुक्त कार्यालय परिसर स्थित बचत भवन में गुरुवार को करवाए गए चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों ने स्पष्ट बहुमत के साथ जीत हासिल की। उपायुक्त एवं पीठासीन अधिकारी अनुपम कश्यप की अध्यक्षता में हुए चुनाव में भाजपा सदस्य भोपेंद्र सिसोदिया ने जीत हासिल की। सिसोदिया को कुल 13 मत हासिल हुए जबकि उनके खिलाफ चुनाव में उतरे कांग्रेस के सुरेंद्र रेटका को सिर्फ दस वोट मिले। दो वोट अवैध घोषित किए गए। उपाध्यक्ष पद के लिए भाजपा समर्थित सदस्य भरत सिंह कलांटा को 14 वोट मिले। वहीं, उनके खिलाफ मैदान में उतरी कांग्रेस समर्थित मीनाक्षी को दस मत हासिल हुए। एक मत अवैध घोषित किया गया। इस तरह भोपेंद्र सिसोदिया को जिला परिषद शिमला का अध्यक्ष और भरत सिंह कलांटा को उपाध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया है। निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोपहर करीब 12:00 बजे उपायुक्त एवं पीठासीन अधिकारी अनुपम कश्यप ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष भोपेंद्र सिसोदिया और उपाध्यक्ष भरत सिंह कलांटा को शपथ दिलाई। भोपेंद्र ने कहा कि जीत के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व समेत स्थानीय विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ जनता व सदस्यों का अहम योगदान रहा है। कांग्रेस इस चुनाव को काफी दिन से टाल रही थी। 

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जनादेश स्पष्ट, प्रदेश में भाजपा की सरकार आने वाली है : बिंदल
 भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने जिला परिषद शिमला के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर पार्टी की जीत को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इस विजय ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश की जनता का कांग्रेस सरकार से मोहभंग हो चुका है। प्रदेश में राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है और जनता ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि कांग्रेस की वर्तमान सरकार जाने वाली है और भाजपा की आने वाली है। डॉ. बिंदल ने कहा कि जिला परिषद शिमला के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। आरोप लगाया कि सरकार ने कई मंत्रियों को जिम्मेदारी दी थी कि किसी भी तरह कांग्रेस का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाया जाए। इसके लिए सत्ता और प्रशासनिक प्रभाव का इस्तेमाल किया गया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 

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