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Rampur Bushahar News: छितकुल में आज से शुरू होगा साजो पर्व
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ग्रामीण सजधज कर अपने घरों में बनाएंगे पारंपारिक व्यंजन, करेंगे पूजा
संवाद न्यूज एजेंसी
सांगला( किन्नौर)। किन्नौर जिला अपनी संस्कृति को लेकर मशहूर है। किन्नौर जिला में सर्दियों में अलग-अलग त्येाहार मनाए जाते है। किन्नौर जिला के छितकुल में सोमवार से साजो पर्व शुरू होगा और ग्रामीण इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे। छितकुल गांव में साजो के आगमन पर नाग देवता गांव में आते हैं और उनके स्वागत में ग्रामीण देर रात तीन बजे उठकर हलवा और पूरी बनाकर पूजा करते हैं। स्थानीय गांव के निवासी राजेश नेगी ने बताया कि पर्व के पहले दिन गांव के सभी बच्चे, पुरुष और महिलाओं को स्नान करना अनिवार्य होता है। नव वर्ष के आगाज पर यह साजो पर्व मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि स्थानीय नाग देवता पर्व मनाने के लिए आते हैं और गांव में बने किले में अन्य देवी-देवताओं को भी साथ में रखकर पूजा की जाती है। उन्होंने बताया कि गांव के तीन लोग ऐसे होते हैं, जो पूरी तरह पारंपरिक वेशभूषा जैसे ऊन का पजामा, काला टोपी और छलनी पहनते हैं। वे गांव के दस घरों में जाकर वहां बनाए गए व्यंजनों को देखते हैं। इस दौरान किसी ने गलत व्यंजन बनाया हो तो उस व्यक्ति को फाइन देना होता है। पर्व से पहले ग्रामीण अपने पुराने घरों में मिट्टी की लिपाई करते हैं और सफेद मिट्टी ( छोशकम) से दीवारों में चांद, सूरज और बोए जाने वाले अनाज, घर, कुठार इत्यादि बनाते हैं, ताकि नए साल में अच्छी फसल आए।उन्होंने बताया कि इस दिन गांव के छोटे-बड़े को स्नान करना और नए कपड़े पहनना अनिवार्य होता हैं। उन्होंने कहा कि तीन लोग जो पारंपरिक वेषभूषा पहनते हैं, वे पहले दिन दिन गांव के पांच घरों में जाते हैं और अगले दिन पांच घरों में जाते हैं। उन्होंने बताया कि उसके बाद गांव में मेला लगता है, जिसमें ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा के साथ लोकनृत्य करते हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
सांगला( किन्नौर)। किन्नौर जिला अपनी संस्कृति को लेकर मशहूर है। किन्नौर जिला में सर्दियों में अलग-अलग त्येाहार मनाए जाते है। किन्नौर जिला के छितकुल में सोमवार से साजो पर्व शुरू होगा और ग्रामीण इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे। छितकुल गांव में साजो के आगमन पर नाग देवता गांव में आते हैं और उनके स्वागत में ग्रामीण देर रात तीन बजे उठकर हलवा और पूरी बनाकर पूजा करते हैं। स्थानीय गांव के निवासी राजेश नेगी ने बताया कि पर्व के पहले दिन गांव के सभी बच्चे, पुरुष और महिलाओं को स्नान करना अनिवार्य होता है। नव वर्ष के आगाज पर यह साजो पर्व मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि स्थानीय नाग देवता पर्व मनाने के लिए आते हैं और गांव में बने किले में अन्य देवी-देवताओं को भी साथ में रखकर पूजा की जाती है। उन्होंने बताया कि गांव के तीन लोग ऐसे होते हैं, जो पूरी तरह पारंपरिक वेशभूषा जैसे ऊन का पजामा, काला टोपी और छलनी पहनते हैं। वे गांव के दस घरों में जाकर वहां बनाए गए व्यंजनों को देखते हैं। इस दौरान किसी ने गलत व्यंजन बनाया हो तो उस व्यक्ति को फाइन देना होता है। पर्व से पहले ग्रामीण अपने पुराने घरों में मिट्टी की लिपाई करते हैं और सफेद मिट्टी ( छोशकम) से दीवारों में चांद, सूरज और बोए जाने वाले अनाज, घर, कुठार इत्यादि बनाते हैं, ताकि नए साल में अच्छी फसल आए।उन्होंने बताया कि इस दिन गांव के छोटे-बड़े को स्नान करना और नए कपड़े पहनना अनिवार्य होता हैं। उन्होंने कहा कि तीन लोग जो पारंपरिक वेषभूषा पहनते हैं, वे पहले दिन दिन गांव के पांच घरों में जाते हैं और अगले दिन पांच घरों में जाते हैं। उन्होंने बताया कि उसके बाद गांव में मेला लगता है, जिसमें ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा के साथ लोकनृत्य करते हैं।