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व्यक्ति के भीतर प्रेम और अपनापन खत्म होना आज की सबसे बड़ी विडंबना : प्रशांत
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ठियोग कॉलेज में राष्ट्रीय स्तर संगोष्ठी का आयोजन
हित्य आलोचकों ने विभिन्न कालखंडों, साहित्य में समकालीन परिस्थितियों पर रखे विचार
संवाद न्यूज एजेंसी
ठियोग (रामपुर बुशहर)। महाविद्यालय ठियोग में शनिवार को साहित्य में समकालीनता विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्य आलोचकों और शोधार्थियों ने विभिन्न कालखंडों, साहित्य में समकालीन परिस्थितियों पर अपने विचार रखे।
संगोष्ठी के पहले सत्र का शुभारंभ महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. भूपेंद्र ठाकुर ने किया। उन्होंने अतिथि साहित्यकारों का स्वागत किया। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यनारायण स्नेही ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। बबिता ठाकुर ने संचालन किया। केंद्रीय विवि में हिंदी के प्रो. एवं प्रसिद्ध आलोचक चंद्रकांत सिंह मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि हर कालखंड में रचे गए साहित्य में समकालीनता रही है। साहित्यकारों ने अपने समय के अधिकतर पहलुओं को छुआ है। उन्होंने रीतिकाल से लेकर आधुनिक काल के विभिन्न कवियों, लेखकों की रचनाओं के उदाहरण देते हुए उनकी रचनाओं में समकालीनता पर टिप्पणी की। कहा कि रीतिकाल के कई कवि दरबारों में रहते हुए भी निष्पक्ष रहे और संघर्ष में सहज होकर रचनाएं कीं। अमीर खुसरो, कबीर, विद्यापति से लेकर आधुनिक कवियों मुक्तिबोध नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह अन्यों के साहित्य का उल्लेख किया। युवा कवि और आलोचक प्रशांत रवि ने भक्तिकाल के साहित्य को मानवता के लिए श्रेष्ठ बताया। साथ ही बृज और हिंदी के कवियों के अलावा दक्षिण भारत, असम सहित अन्य के गैर हिंदी साहित्य को रेखांकित किया। उन्होंने युवा शोधार्थियों से हिंदी सहित देश की सभी भाषाओं के साहित्य को पढ़ने का आह्वान किया। सूर, तुलसी, कबीर, खुसरो और पलटू दादू की तरह कन्नड़ कवि बसमन्ना ने आम जनमानस की भाषा में प्रेम और दुनिया समाज को बेहतर बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि व्यक्ति के भीतर प्रेम और अपनापन खत्म हो रहा है। भक्तिकाल में प्रेम और मानवता को बल दिया जाता था। आलोचक डॉ. हेमराज कौशिक और बलदेव ठाकुर ने भी अपने वक्तव्यों में साहित्य के विभिन्न कालखंडों में समकालीनता को रेखांकित किया। प्रदेश विवि में हिंदी विभाग प्रमुख डॉ. शोभारानी ने साहित्य में दलित, महिला, पर्यावरण, पुरुष और वृद्ध सहित अन्य विषयों के बारे में जागरूक किया। राजन तंवर और बलदेव ठाकुर ने विस्तार से साहित्य में समकालीन पर विचार रखे।
दूसरे सत्र में चयनित पत्र वाचन के बाद विभिन्न वक्ताओं ने प्रतिक्रिया देते हुए विचार रखे। डॉ. दयानंद के वक्तव्य के बाद प्रमाणपत्र वितरित किए गए। डॉ. स्नेही ने सभी का धन्यवाद किया। कार्यक्रम में सर्जक रत्न चंद निरझर, मोहन और सुनील ग्रोवर सहित अन्य को स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया गया।
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हित्य आलोचकों ने विभिन्न कालखंडों, साहित्य में समकालीन परिस्थितियों पर रखे विचार
संवाद न्यूज एजेंसी
ठियोग (रामपुर बुशहर)। महाविद्यालय ठियोग में शनिवार को साहित्य में समकालीनता विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्य आलोचकों और शोधार्थियों ने विभिन्न कालखंडों, साहित्य में समकालीन परिस्थितियों पर अपने विचार रखे।
संगोष्ठी के पहले सत्र का शुभारंभ महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. भूपेंद्र ठाकुर ने किया। उन्होंने अतिथि साहित्यकारों का स्वागत किया। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यनारायण स्नेही ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। बबिता ठाकुर ने संचालन किया। केंद्रीय विवि में हिंदी के प्रो. एवं प्रसिद्ध आलोचक चंद्रकांत सिंह मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि हर कालखंड में रचे गए साहित्य में समकालीनता रही है। साहित्यकारों ने अपने समय के अधिकतर पहलुओं को छुआ है। उन्होंने रीतिकाल से लेकर आधुनिक काल के विभिन्न कवियों, लेखकों की रचनाओं के उदाहरण देते हुए उनकी रचनाओं में समकालीनता पर टिप्पणी की। कहा कि रीतिकाल के कई कवि दरबारों में रहते हुए भी निष्पक्ष रहे और संघर्ष में सहज होकर रचनाएं कीं। अमीर खुसरो, कबीर, विद्यापति से लेकर आधुनिक कवियों मुक्तिबोध नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह अन्यों के साहित्य का उल्लेख किया। युवा कवि और आलोचक प्रशांत रवि ने भक्तिकाल के साहित्य को मानवता के लिए श्रेष्ठ बताया। साथ ही बृज और हिंदी के कवियों के अलावा दक्षिण भारत, असम सहित अन्य के गैर हिंदी साहित्य को रेखांकित किया। उन्होंने युवा शोधार्थियों से हिंदी सहित देश की सभी भाषाओं के साहित्य को पढ़ने का आह्वान किया। सूर, तुलसी, कबीर, खुसरो और पलटू दादू की तरह कन्नड़ कवि बसमन्ना ने आम जनमानस की भाषा में प्रेम और दुनिया समाज को बेहतर बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि व्यक्ति के भीतर प्रेम और अपनापन खत्म हो रहा है। भक्तिकाल में प्रेम और मानवता को बल दिया जाता था। आलोचक डॉ. हेमराज कौशिक और बलदेव ठाकुर ने भी अपने वक्तव्यों में साहित्य के विभिन्न कालखंडों में समकालीनता को रेखांकित किया। प्रदेश विवि में हिंदी विभाग प्रमुख डॉ. शोभारानी ने साहित्य में दलित, महिला, पर्यावरण, पुरुष और वृद्ध सहित अन्य विषयों के बारे में जागरूक किया। राजन तंवर और बलदेव ठाकुर ने विस्तार से साहित्य में समकालीन पर विचार रखे।
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दूसरे सत्र में चयनित पत्र वाचन के बाद विभिन्न वक्ताओं ने प्रतिक्रिया देते हुए विचार रखे। डॉ. दयानंद के वक्तव्य के बाद प्रमाणपत्र वितरित किए गए। डॉ. स्नेही ने सभी का धन्यवाद किया। कार्यक्रम में सर्जक रत्न चंद निरझर, मोहन और सुनील ग्रोवर सहित अन्य को स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया गया।
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