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Rampur Bushahar News: दलैंया में धूमधाम से मनाया दशहरा मेला, माता जयेश्वरी के दर्शन को उमड़ी भीड़
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ठियोग के दलैंया में धूमधाम से मनाया गया दशहरा पर्व। संवाद
. माता जयेश्वरी और क्लहौर नाग महाराज के आगमन से भक्तिमय हुआ क्षेत्र
. तीन रात और चार दिन के प्रवास के बाद 21 अक्टूबर को टियाली मंदिर के लिए होंगी विदा
संवाद न्यूज एजेंसी
ठियोग (रामपुर बुशहर)। माता जयेश्वरी दलैंया मंदिर में दशहरा मेला सजा। इस दौरान क्षेत्र सहित दूरदराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचे। परंपरा के अनुसार माता जयेश्वरी अपने टियाली मंदिर से ज्येष्ठ स्थान दलैंया में विराजमान होने के लिए आती हैं। इसी परंपरा के तहत 18 अक्तूबर को माता जयेश्वरी का दलैंया में आगमन हुआ। इस पावन अवसर पर क्लहौर नाग महाराज भी दलैंया पहुंचे। दोनों देवताओं के आगमन से क्षेत्र का माहौल भक्तिमय हो गया। मंदिर को आकर्षक फूलों से सजाया गया था और देव दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। दशहरा मेले के दौरान धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप बच्चों के मुंडन संस्कार भी संपन्न करवाए गए। स्थानीय भाषा में इस परंपरा को जड़ोली कहा जाता है। यह सदियों पुरानी देव संस्कृति और क्षेत्र के लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है। मेले के दौरान श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना कर देवताओं का आशीर्वाद लिया। परंपरा के अनुसार माता जयेश्वरी दलैंया में तीन रात और चार दिन तक प्रवास करती हैं। इसके बाद 21 अक्तूबर को माता दलैंया से टियाली मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगी। माता की इस पारंपरिक विदाई को स्थानीय भाषा में भडातर कहा जाता है। इस दौरान क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और देव रीति-रिवाजों का विधिवत निर्वहन किया जाता है।
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. तीन रात और चार दिन के प्रवास के बाद 21 अक्टूबर को टियाली मंदिर के लिए होंगी विदा
संवाद न्यूज एजेंसी
ठियोग (रामपुर बुशहर)। माता जयेश्वरी दलैंया मंदिर में दशहरा मेला सजा। इस दौरान क्षेत्र सहित दूरदराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचे। परंपरा के अनुसार माता जयेश्वरी अपने टियाली मंदिर से ज्येष्ठ स्थान दलैंया में विराजमान होने के लिए आती हैं। इसी परंपरा के तहत 18 अक्तूबर को माता जयेश्वरी का दलैंया में आगमन हुआ। इस पावन अवसर पर क्लहौर नाग महाराज भी दलैंया पहुंचे। दोनों देवताओं के आगमन से क्षेत्र का माहौल भक्तिमय हो गया। मंदिर को आकर्षक फूलों से सजाया गया था और देव दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। दशहरा मेले के दौरान धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप बच्चों के मुंडन संस्कार भी संपन्न करवाए गए। स्थानीय भाषा में इस परंपरा को जड़ोली कहा जाता है। यह सदियों पुरानी देव संस्कृति और क्षेत्र के लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है। मेले के दौरान श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना कर देवताओं का आशीर्वाद लिया। परंपरा के अनुसार माता जयेश्वरी दलैंया में तीन रात और चार दिन तक प्रवास करती हैं। इसके बाद 21 अक्तूबर को माता दलैंया से टियाली मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगी। माता की इस पारंपरिक विदाई को स्थानीय भाषा में भडातर कहा जाता है। इस दौरान क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और देव रीति-रिवाजों का विधिवत निर्वहन किया जाता है।