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प्रतिष्ठा में तीन देवता के गुरों ने 6 एमएम छड़ की गाल के आर-पार
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बामण से पड़े छेद का गूर नहीं करवातेे कोई इलाज
प्रतिष्ठा में तीन देवता के गूरों ने छड़ की गाल के आर-पार
अष्टधातु से बनी लंबी और मोटी छड़ को कहते हैं बामण
मोहन मेहता
ज्यूरी (रामपुर बुशहर)। 15/20 क्षेत्र के फांचा में नव निर्मित मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में देवताओं के गूरों ने अपने गाल में छेद कर अष्टधातु की छड़ को आर-पार किया। देवताओं के इन गूरों ने छड़ को गाल में डालकर घंटों तक देवताओं की पूजा पूरे जोश के साथ की। इस धार्मिक अनुष्ठान में गूरों ने देव परंपरा और आस्था का बखूबी निर्वहन किया।
गौरतलब है कि गूर करीब 6 एमएम मोटी और करीब आठ इंच लंबी छड़ को पूजा कार्य पूरा होने के बाद निकाल कर थोड़ा सा घी का सेवन कर छोड़ देते हैं। इतनी छड़ को स्थानीय भाषा में बामण कहा जाता है। उससे इतना बड़ा छेद करने के बाद भी न तो दर्द होता है और न ही इससे कोई खून निकलता है। इस घाव को भरने के लिए किसी तरह की न तो दवाई का प्रयोग होता है और न ही किसी डॉक्टर को दिखाया जाता है।
देवता के गूरों आलम चंद सरपारा, रतन जगोरी और राजू काओबिल के अनुसार यहसारी देवता की शक्ति है। वे पिछले करीब 15 से 20 सालों से देवता के गूर का काम संभाल रहे हैं। उन्हें आज तक न तो कभी दर्द हुआ और न ही उन्होंने कभी इसका इलाज करवाया। यह मुंह में गाल से बामण डालने का कार्य देवता के किसी खास कार्य के दिन ही किया जाता है। यह सारी देवता की ही शक्ति है, जो इतनी मोटी छड़ (बामण) डालते हुए उन्हें कोई परेशानियां पेश नहीं आती।
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लाहरुवीर देवता गानवीं मंदिर कमेटी के प्रधान अरविंद सुनेल और सचिव सत्य प्रकाश नेगी, नाग देवता के प्रधान गोपाल मुखिया, मस्तराम, काओबिल के देवी सिंह और मनोज टोल्टा ने बताया कि यह बामण डालने की प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है। देवता खास पूजा के समय में अपने गूर में प्रवेश करता है। इसीलिए न तो गूर को दर्द होता है और न ही उसे किसी तरह के इलाज की जरूरत पड़ती है।
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प्रतिष्ठा में तीन देवता के गूरों ने छड़ की गाल के आर-पार
अष्टधातु से बनी लंबी और मोटी छड़ को कहते हैं बामण
मोहन मेहता
ज्यूरी (रामपुर बुशहर)। 15/20 क्षेत्र के फांचा में नव निर्मित मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में देवताओं के गूरों ने अपने गाल में छेद कर अष्टधातु की छड़ को आर-पार किया। देवताओं के इन गूरों ने छड़ को गाल में डालकर घंटों तक देवताओं की पूजा पूरे जोश के साथ की। इस धार्मिक अनुष्ठान में गूरों ने देव परंपरा और आस्था का बखूबी निर्वहन किया।
गौरतलब है कि गूर करीब 6 एमएम मोटी और करीब आठ इंच लंबी छड़ को पूजा कार्य पूरा होने के बाद निकाल कर थोड़ा सा घी का सेवन कर छोड़ देते हैं। इतनी छड़ को स्थानीय भाषा में बामण कहा जाता है। उससे इतना बड़ा छेद करने के बाद भी न तो दर्द होता है और न ही इससे कोई खून निकलता है। इस घाव को भरने के लिए किसी तरह की न तो दवाई का प्रयोग होता है और न ही किसी डॉक्टर को दिखाया जाता है।
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देवता के गूरों आलम चंद सरपारा, रतन जगोरी और राजू काओबिल के अनुसार यहसारी देवता की शक्ति है। वे पिछले करीब 15 से 20 सालों से देवता के गूर का काम संभाल रहे हैं। उन्हें आज तक न तो कभी दर्द हुआ और न ही उन्होंने कभी इसका इलाज करवाया। यह मुंह में गाल से बामण डालने का कार्य देवता के किसी खास कार्य के दिन ही किया जाता है। यह सारी देवता की ही शक्ति है, जो इतनी मोटी छड़ (बामण) डालते हुए उन्हें कोई परेशानियां पेश नहीं आती।
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लाहरुवीर देवता गानवीं मंदिर कमेटी के प्रधान अरविंद सुनेल और सचिव सत्य प्रकाश नेगी, नाग देवता के प्रधान गोपाल मुखिया, मस्तराम, काओबिल के देवी सिंह और मनोज टोल्टा ने बताया कि यह बामण डालने की प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है। देवता खास पूजा के समय में अपने गूर में प्रवेश करता है। इसीलिए न तो गूर को दर्द होता है और न ही उसे किसी तरह के इलाज की जरूरत पड़ती है।