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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Petitions filed for increasing compensation dismissed in Himachal Pradesh High Court

HP High Court: मुआवजा बढ़ाने को लेकर दायर याचिकाएं हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में खारिज, जानें विस्तार से

Tue, 11 Nov 2025 02:00 AM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Tue, 11 Nov 2025 02:00 AM IST
सार

जिला सोलन के कैथलीघाट-बाशा सड़क के निर्माण के लिए अधिग्रहीत भूमि के बाजार मूल्य को बढ़ाने को लेकर दायर अपील याचिकाओं को हिमाचल हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इन अपीलों में जमीन मालिकों ने जिला न्यायाधीश सोलन के 13 जुलाई 2012 के अवाॅर्ड को संशोधित करने की मांग की थी।

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Petitions filed for increasing compensation dismissed in Himachal Pradesh High Court
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला सोलन के कैथलीघाट-बाशा सड़क के निर्माण के लिए अधिग्रहीत भूमि के बाजार मूल्य को बढ़ाने को लेकर दायर अपील याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीश सोलन की ओर से पारित अवाॅर्ड को सही ठहराया।

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इन अपीलों में जमीन मालिकों ने जिला न्यायाधीश सोलन के 13 जुलाई 2012 के अवाॅर्ड को संशोधित करने की मांग की थी। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने फैसले में कहा कि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों के तहत किसी व्यक्ति की भूमि को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनिवार्य रूप से लेने पर, उसे उस भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य दिया जाना चाहिए। बाजार मूल्य का निर्धारण धारा 4 की प्रारंभिक अधिसूचना की तारीख को प्रचलित कीमत के आधार पर किया जाता है।
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चूंकि भूमि एक सिंगल यूनिट के रूप में सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहीत की गई थी, इसलिए कोर्ट ने पुष्टि की कि न्यायालय ने भूमि के वर्गीकरण की परवाह किए बिना सभी श्रेणियों के लिए समान और फ्लैट दर लागू करके सही किया। रेफरेंस कोर्ट ने भूमि की सभी श्रेणियों के लिए 1,40,000 रुपये प्रति बीघा की दर से मुआवजा बढ़ाने का फैसला दिया। इसे भूमि मालिकों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने इस बात पर सहमति जताई कि संदर्भ न्यायालय ने गांव शुंगल से संबंधित एकमात्र उपलब्ध बिक्री पर उचित रूप से भरोसा किया, जिसके अनुसार भूमि का मूल्य 1,40,000 प्रति बीघा था।

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कोर्ट ने अन्य गांवों से संबंधित बिक्री विलेखों पर विचार करने से इन्कार कर दिया, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के गांव का साक्ष्य उपलब्ध था। दावेदारों ने अदालत को बताया कि सड़क निर्माण के दौरान फलदार और गैर फलदार पेड़ों के उखड़ने का भी मुआवजा दिया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि कलेक्टर की ओर से जमीन का मूल्यांकन अलग-अलग तरीके से किया गया था। कलेक्टर के फैसले से असंतुष्ट होने के बाद दावेदारों ने अधिनियम की धारा 18 के तहत रेफरेंस कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। रेफरेंस कोर्ट ने सभी श्रेणियां की जमीन के लिए 1,40,000 प्रति बीघा की दर से बड़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश दिया। रेफरेंस कोर्ट की ओर से बनाए गए मुआवजे से भी असंतुष्ट होकर दावेदारों ने मौजूदा फैसले में संशोधित करने और मुआवजा की बढ़ाने की प्रार्थना की थी। अदालत को बताया गया कि रेफरेंस कोर्ट का फैसला कानून और तथ्यों के विरुद्ध है, क्योंकि उसने साक्ष्य का गलत और अनुचित मूल्यांकन किया है।

उन्होंने अदालत से मुआवजा की राशि संशोधित करते हुए इसे 5 लाख प्रति बीघा की अपील की थी। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि धारा 4 की अधिसूचना 15 फरवरी 2000 और आधार माने गए बिक्री विलेख 24 मई 1999 की तारीख के बीच (केवल लगभग नौ महीने का अंतराल) का था। इसलिए इस मामले में कोई संचयी वृद्धि दर देना उचित नहीं था।

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