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Mandi News: चेक बाउंस मामले में आरोपी दोषी करार, एक साल का कारावास
Wed, 15 Oct 2025 06:50 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
Updated Wed, 15 Oct 2025 06:50 AM IST
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मंडी। न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी कोर्ट नंबर-1 सरकाघाट की अदालत ने चेक बाउंस मामले में आरोपी प्रवीन कुमार को दोषी करार देते हुए एक साल के साधारण कारावास का सजा सुनाई है। वहीं पांच लाख रुपये मुआवजा अदा करने के आदेश दिए हैं।
अदालत में दाखिल शिकायत के अनुसार प्रवीन कुमार ने सीडी को-ऑपरेटिव सोसायटी से चार लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण लिया था। ऋण की अदायगी के लिए आरोपी ने 4.09 लाख रुपये का चेक सोसायटी के पक्ष में जारी किया था।
जब यह चेक एचपी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक सरकाघाट शाखा में प्रस्तुत किया तो बैंक ने अपर्याप्त धनराशि का कारण बताते हुए चेक को अस्वीकार कर दिया। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद आरोपी ने भुगतान नहीं किया। इसके बाद सीडी को-ऑपरेटिव सोसायटी ने 2021 में एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दायर किया।
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सुनवाई के दौरान सोसायटी की ओर से प्रबंधक भरत भूषण ने गवाही दी जबकि आरोपी ने यह दलील दी कि उसने ऋण लेते समय केवल सुरक्षा के तौर पर 10 से 12 खाली हस्ताक्षरित चेक दिए थे। आरोपी ने यह भी स्वीकार किया कि उसने ऋण लिया था और उसका खाता संबंधित बैंक में है। अदालत ने माना कि आरोपी यह साबित नहीं कर सका कि उसकी कोई देनदारी नहीं थी। न्यायालय ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब चेक पर हस्ताक्षर और बैंक खाता स्वीकार कर लिया जाता है तो कानूनन यह माना जाता है कि चेक वैध देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया था। अदालत ने दोषी की याचिका की सजा पर 30 दिन की रोक लगाते हुए आरोपी को 50 हजार रुपये के मुचलके पर अपील दायर करने का अवसर दिया।
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अदालत में दाखिल शिकायत के अनुसार प्रवीन कुमार ने सीडी को-ऑपरेटिव सोसायटी से चार लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण लिया था। ऋण की अदायगी के लिए आरोपी ने 4.09 लाख रुपये का चेक सोसायटी के पक्ष में जारी किया था।
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जब यह चेक एचपी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक सरकाघाट शाखा में प्रस्तुत किया तो बैंक ने अपर्याप्त धनराशि का कारण बताते हुए चेक को अस्वीकार कर दिया। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद आरोपी ने भुगतान नहीं किया। इसके बाद सीडी को-ऑपरेटिव सोसायटी ने 2021 में एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दायर किया।
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सुनवाई के दौरान सोसायटी की ओर से प्रबंधक भरत भूषण ने गवाही दी जबकि आरोपी ने यह दलील दी कि उसने ऋण लेते समय केवल सुरक्षा के तौर पर 10 से 12 खाली हस्ताक्षरित चेक दिए थे। आरोपी ने यह भी स्वीकार किया कि उसने ऋण लिया था और उसका खाता संबंधित बैंक में है। अदालत ने माना कि आरोपी यह साबित नहीं कर सका कि उसकी कोई देनदारी नहीं थी। न्यायालय ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब चेक पर हस्ताक्षर और बैंक खाता स्वीकार कर लिया जाता है तो कानूनन यह माना जाता है कि चेक वैध देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया था। अदालत ने दोषी की याचिका की सजा पर 30 दिन की रोक लगाते हुए आरोपी को 50 हजार रुपये के मुचलके पर अपील दायर करने का अवसर दिया।