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Mandi News: नई पीढ़ी के रुझान से सिमट रही रफ्फू की पारंपरिक कला
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भूतनाथ गली में दशकों से रफ्फू, पिक्को और स्टीकर कला से लोगों के कपड़ों को दिया जा रहा नया लुक
गुरुमुख दो भाइयों संग संभाले हुए हैं पुश्तैनी कारोबार
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। मंडी के भूतनाथ गली में गुरुमुख सिंह पिछले करीब 50 वर्षों से फटे कपड़ों को रफ्फू, पिक्को और स्टिकर लगाकर नया रूप दे रहे हैं। मशीन और हस्तकला से कपड़ों की मरम्मत में उन्हें महारत हासिल है लेकिन नई पीढ़ी की घटती रुचि और कारीगरों की कमी से यह पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
गुरुमुख सिंह बताते हैं कि पहले लोग फटे कपड़ों की मरम्मत करवाते थे जबकि अब नए कपड़े खरीदना अधिक पसंद करते हैं। शहर में अब मुश्किल से 5-7 कारीगर ही रफ्फू और पिक्को का काम कर रहे हैं। कढ़ाई का काम भी लगभग समाप्ति की ओर है और अधिकांश समय काम की कमी बनी रहती है।
उन्होंने बताया कि शादी-विवाह, करवा चौथ और त्योहारों के दौरान ही कारोबार में तेजी आती है। सूट की कढ़ाई, साड़ी में फॉल, चुन्नी में पिक्को तथा शॉल और स्वेटर की रफ्फू से अच्छी आमदनी हो जाती है, जबकि सामान्य दिनों में मुश्किल से 500 से 700 रुपये की दिहाड़ी बन पाती है।
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गुरुमुख सिंह के अनुसार उनका परिवार 1947 के देश विभाजन के बाद मंडी आकर बसा था। उनके दादा, पिता हरवंश सिंह और ताया निरंजन सिंह ने सिलाई-कढ़ाई को आजीविका बनाया। आज गुरुमुख सिंह अपने भाइयों हंसपाल सिंह और हरमिंद्र सिंह के साथ पुश्तैनी दुकान पर इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें चिंता है कि नई पीढ़ी के इस पेशे से दूर होने के कारण यह कला धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
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गुरुमुख दो भाइयों संग संभाले हुए हैं पुश्तैनी कारोबार
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। मंडी के भूतनाथ गली में गुरुमुख सिंह पिछले करीब 50 वर्षों से फटे कपड़ों को रफ्फू, पिक्को और स्टिकर लगाकर नया रूप दे रहे हैं। मशीन और हस्तकला से कपड़ों की मरम्मत में उन्हें महारत हासिल है लेकिन नई पीढ़ी की घटती रुचि और कारीगरों की कमी से यह पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
गुरुमुख सिंह बताते हैं कि पहले लोग फटे कपड़ों की मरम्मत करवाते थे जबकि अब नए कपड़े खरीदना अधिक पसंद करते हैं। शहर में अब मुश्किल से 5-7 कारीगर ही रफ्फू और पिक्को का काम कर रहे हैं। कढ़ाई का काम भी लगभग समाप्ति की ओर है और अधिकांश समय काम की कमी बनी रहती है।
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उन्होंने बताया कि शादी-विवाह, करवा चौथ और त्योहारों के दौरान ही कारोबार में तेजी आती है। सूट की कढ़ाई, साड़ी में फॉल, चुन्नी में पिक्को तथा शॉल और स्वेटर की रफ्फू से अच्छी आमदनी हो जाती है, जबकि सामान्य दिनों में मुश्किल से 500 से 700 रुपये की दिहाड़ी बन पाती है।
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गुरुमुख सिंह के अनुसार उनका परिवार 1947 के देश विभाजन के बाद मंडी आकर बसा था। उनके दादा, पिता हरवंश सिंह और ताया निरंजन सिंह ने सिलाई-कढ़ाई को आजीविका बनाया। आज गुरुमुख सिंह अपने भाइयों हंसपाल सिंह और हरमिंद्र सिंह के साथ पुश्तैनी दुकान पर इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें चिंता है कि नई पीढ़ी के इस पेशे से दूर होने के कारण यह कला धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।