आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज का शब्द: कौमुदी और रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’की कविता- ओ मेरी संजीवनी !

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- कौमुदी, जिसका अर्थ है- ज्योत्स्ना, चाँदनी, कार्तिक पूर्णिमा। प्रस्तुत है रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’की कविता- ओ मेरी संजीवनी !
                                                                 
                            

भोर किरन
अंक में जगी
अधमुँदे नयन
खिली कौमुदी
सिंचित हुआ मन
अधर रस
स्मित बन छलका
अंकशायिनी !
बिखरी थी अलकें
झुकी पलकें
रूप सिन्धु छलके
युग जी लिया
अधर मधु पिया
पी लिये सभी
अश्रु जग ने दिये
मिले दो पल
अधरों से अधर
युगों की प्यास
और हुई मुखर
नैनों से बहे
मदभरे निर्झर
स्वर्ग जी लिया
करके आचमन
लौटे हैं प्राण
ओ मेरी संजीवनी !
प्राण -वह्नि मोहिनी!

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o  

4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर