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मंडी के ब्रिगेडियर खुशहाल के नेतृत्व में फतह कीं दो चोटियां
ब्यूरो/ अमर उजाला, नगवाईं (मंडी)।
Updated Mon, 25 Jul 2016 11:24 PM IST
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- फोटो : kargil
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मंडी के ब्रिगेडियर खुशहाल के नेतृत्व में फतह कीं दो चोटियां तोलोलिंग और टाइगर हिल जीतने के बाद एकाएक पलट गया लड़ाई का पासा तोलोलिंग को फतह करने से पहले शहीद हुए थे नरेश बर्फ से हालात खराब, छुपने का कोई ठिकाना नहीं था अमर उजाला ब्यूरो नगवाईं (मंडी)। प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी छोटी काशी मंडी के 12 सपूतों ने कारगिल विजय में प्राणों की आहुति दी है।
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कारगिल की लड़ाई का पासा पलटने वाली तोलोलिंग व टाइगर हिल को फतह भी प्रदेश के सपूत की अगुवाई में किया गया। नगवाईं कस्बे के सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर के नेतृत्व में भारतीय सेना ने तोलोलिंग और टाइगर हिल पर कब्जा किया था। इस लड़ाई के बाद खुशहाल ठाकुर को कारगिल हीरो के नाम से जाना जाता है। खुशहाल को युद्ध सेवा मेडल से नवाजा गया है।
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खुशहाल ठाकुर ने कहा कि 1999 में उनकी बटालियन 18 ग्रेनेडियर कश्मीर में तैनात थी। पता चला कि पाकिस्तान की फौज व घुसपैठियों ने द्रास, कारगिल और बटालिक सेक्टर में घुसपैठ कर चोटियों पर कब्जा कर रखा है। चोटियों पर बैठे दुश्मन की तोपों का निशाना श्रीनगर-लेह मार्ग था। इस कारण रसद और अन्य सामान ले जाना सेना के लिए मुश्किल हो रहा था। 18 मई 1999 को 18 ग्रेनेडियर को तोलोलिंग पर हमला करने के आदेश हुए।
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यह भी पता नहीं था कि लड़ाई आतंकवादियों से लड़नी है कि पाकिस्तान की फौज से। 22 मई को 18 ग्रेनेडियर ने 15,600 फीट ऊंची तोलोलिंग पर हमला कर दिया। दुश्मन ऊंचाई पर था। स्थिति ऐसी थी कि उन हालात में कोई आर्टिलरी सपोर्ट भी नहीं थी। मौसम और बर्फ से हालात खराब थे। सेना के जवान चोटी पर चढ़ रहे थे। नंगे पहाड़ों पर छुपने के लिए कोई ठिकाना नहीं था।
भारतीय सेना की इस जांबाज टुकड़ी ने कर्नल खुशहाल ठाकुर के नेतृत्व में तोलोलिंग पर 21 दिन बाद 13 जून 1999 को तिरंगा फहरा दिया। इसमें सुंदनगर के शहीद नरेश कुमार भी शामिल थे। नरेश कुमार 13 जून को तोलोलिंग चोटी फतह करने से कुछ घंटे पहले ही शहीद हुए थे। इस जंग में मां भारती के 2 ऑफिसर, दो जेसीओ और 21 जवान शहीद हुए। खुशहाल ने कहा 18 ग्रेनेडियर को अगला लक्ष्य 17000 फीट की ऊंचाई वाली टाइगर हिल को फतह करना था। इस चोटी पर 3 और 4 जुलाई की रात को हमला किया गया और यहां तिरंगा फहराने में कामयाब हुए।
यहां नौ जवानों ने शहादत का जाम पिया था। दोनों लड़ाइयों में बटालियन के 34 जांबाज शहीद हुए और 95 घायल हुए। इन दोनों चोटियों पर फतह के बाद पासा एकाएक पलट गया था। ऊंची चोटियों पर भारत का कब्जा होने के कारण दुश्मन को पीछे हटना पड़ा। इस युद्ध में 18 ग्रेनेडियर के रणबांकुरों को 52 वीरता पुरस्कार मिले जो सेना के इतिहास में रिकॉर्ड है। इसमें एक परमवीर चक्र, 2 महावीर चक्र, 6 वीर चक्र और 43 अन्य वीरता पुरस्कार दिए गए।