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Mandi News: कोलडैम क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन करेगा आईआईटी बॉम्बे

Wed, 29 Jul 2026 11:55 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Wed, 29 Jul 2026 11:55 PM IST
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IIT Bombay will study the impact of climate change in the Kol Dam region.
पत्रिका सामाजिक सरोकार का विमोचन करते हुए कोल डैम परियोजना प्रमुख एसएस राव। स्त्रोत- संस्थान
एनटीपीसी ने शुरू की संयुक्त शोध पहल
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मंडी और सोलन की दो पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं की रिपोर्ट भी सरकार को भेजी
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संवाद न्यूज एजेंसी
सुंदरनगर (मंडी)। कोलडैम क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन अब आईआईटी बॉम्बे के सहयोग से किया जाएगा। एनटीपीसी कोलडैम ने इस संयुक्त शोध पहल की शुरुआत कर दी है। इसके साथ ही मंडी और सोलन जिलों में प्रस्तावित दो पम्प्ड स्टोरेज पावर प्लांट परियोजनाओं की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट भी मंजूरी के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार को भेज दी गई है।
मंगलवार को आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम में परियोजना प्रमुख एसएस राव ने बताया कि एनटीपीसी का उद्देश्य केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास को भी समान प्राथमिकता देना है। इसी सोच के तहत आईआईटी बॉम्बे के साथ मिलकर कोलडैम क्षेत्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। इस अध्ययन के निष्कर्ष भविष्य की पर्यावरणीय योजनाओं और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए उपयोगी साबित होंगे।
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उन्होंने बताया कि मंडी और सोलन जिलों में प्रस्तावित दो पम्प्ड स्टोरेज पावर प्लांट की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को मंजूरी के लिए भेजी जा चुकी है। इन परियोजनाओं के साकार होने से प्रदेश में हरित ऊर्जा उत्पादन और बिजली भंडारण क्षमता को मजबूती मिलेगी। बताया कि परियोजना प्रभावित 40 गांवों में कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के तहत करीब 5.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
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इस अवसर पर वर्ष 2025-26 में सीएसआर के तहत किए गए कार्यों पर आधारित पत्रिका सामाजिक सरोकार का विमोचन भी किया गया।
क्या है पम्प्ड स्टोरेज परियोजना
पम्प्ड स्टोरेज परियोजना (पीएसपी) जलविद्युत आधारित ऊर्जा भंडारण प्रणाली है। इसमें दो जलाशय बनाए जाते हैं। बिजली की मांग कम होने पर निचले जलाशय का पानी पंप कर ऊपरी जलाशय में पहुंचाया जाता है। वहीं, मांग बढ़ने पर यही पानी वापस नीचे छोड़कर टरबाइन चलाए जाते हैं, जिससे बिजली का उत्पादन होता है।
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