हिमाचल: स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए पिक एंड चूज की नीति अवैध करार, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार की पिक एंड चूज (मनमर्जी से तारीखें तय करने) की नीति को अवैध करार दिया है। जानिए हाईकोर्ट के बड़े फैसले
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार की पिक एंड चूज (मनमर्जी से तारीखें तय करने) की नीति को अवैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संवर्ग में पदोन्नति वाले उच्च पद का वेतनमान उसके फीडर (निचले) पद से कम या उसके बराबर नहीं हो सकता। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने शशि पाल ठाकुर और 57 अन्य स्वास्थ्य शिक्षकों की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने सरकार के 30 जनवरी 2016 के उस नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है, जिसके तहत स्वास्थ्य शिक्षकों को निचले पद के बराबर 4200 का ग्रेड पे दिया गया था। स्वास्थ्य विभाग में स्वास्थ्य शिक्षक एक प्रमोशनल पद है, जिसके लिए शैक्षणिक योग्यता स्नातक और स्वास्थ्य शिक्षा में डिप्लोमा अनिवार्य है।
वहीं, इनका फीडर पद मल्टीपर्पज हेल्थ सुपरवाइजर है, जिसके लिए योग्यता केवल मैट्रिक और ट्रेनिंग सर्टिफिकेट है। संशोधित वेतन नियम 2012 के तहत सरकार ने 28 सितंबर 2012 को नोटिफिकेशन जारी कर निचले फीडर पद (सुपरवाइजर) का ग्रेड पे बढ़ाकर 4200 रुपये कर दिया, जिसे 1 अक्तूबर 2012 से लागू किया गया। लेकिन, उच्च पद पर बैठे याचिकाकर्ताओं (स्वास्थ्य शिक्षकों) को इस लाभ से बाहर रखकर उनका ग्रेड पे 3800 रुपये ही छोड़ दिया गया। जब कर्मचारियों ने विरोध किया, तो सरकार ने 30 जनवरी 2016 को नोटिफिकेशन जारी कर उन्हें भी 4200 ग्रेड पे तो दिया, लेकिन इसे 1 अक्तूबर 2012 के बजाय 1 फरवरी 2016 से (प्रायोगात्मक रूप से) लागू किया। कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार स्वास्थ्य शिक्षकों के मामले पर दोबारा विचार करे और उन्हें फीडर पद से अनुपातिक रूप से उच्च ग्रेड पे प्रदान करे। यह संशोधित और बढ़ा हुआ वेतनमान 1 अक्टूबर 2012 से (इमेजिनरी तौर पर) लागू माना जाएगा।
वकील बनने से पहले विधि स्नातकों के आपराधिक रिकॉर्ड की जांच पर हाईकोर्ट सख्त
प्रदेश हाईकोर्ट ने वकीलों के रूप में पंजीकरण से पहले विधि स्नातकों के आपराधिक बैकग्राउंड की अनिवार्य जांच को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अभिमन्यु राठौर की ओर से व्यक्तिगत रूप से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किए। इस मामले की अगली सुनवाई 8 दिसंबर को होगी। याचिका में हिमाचल प्रदेश बार काउंसिल के आवेदन फॉर्म का हवाला दिया गया है, जो एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 25 के तहत वकील के रूप में नामांकन के लिए भरा जाता है। इसके क्लॉज 14 के अनुसार, आवेदक को यह स्पष्ट बताना होता है कि क्या उसे किसी आपराधिक अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया है या सरकारी सेवा/स्थानीय निकाय से बर्खास्त किया गया है। एडवोकेट्स एक्ट की धारा 24 ए का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया गया है कि नैतिक अधमता से जुड़े किसी भी आपराधिक मामले में दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को राज्य की रोल सूची (वकील के तौर पर) में शामिल होने से अयोग्य घोषित करने का नियम है। याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 24 सितंबर 2024 को जारी निर्देशों का उल्लेख किया गया है। इनके तहत सभी विश्वविद्यालयों को कानून के छात्रों की फाइनल मार्कशीट और डिग्री जारी करने से पहले उनके खिलाफ किसी भी पेंडिंग प्राथमिकी, आपराधिक मामले, दोषसिद्धि या बरी होने की गहन जांच करनी होगी।
हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे में देरी पर ब्याज भुगतान का आदेश दिया
प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे में देरी पर ब्याज भुगतान का आदेश दिया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने दीपक बरेजा और अन्य बनाम भारत संघ मामले में यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं की जमीन नेशनल हाईवे-72 पांवटा साहिब-बल्लारपुर रोड के निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी। सक्षम प्राधिकारी की ओर से 14 फरवरी 2022 को मुआवजा राशि 3,78,76,160 रुपये का अवॉर्ड पारित किया गया था, लेकिन केंद्र सरकार ने यह राशि 367 दिनों की देरी के बाद 16 फरवरी 2023 को जमा की। मूल राशि मिलने के बाद याचिकाकर्ता इस देरी की अवधि के ब्याज की मांग कर रहे थे। हाईकोर्ट ने माना कि अवॉर्ड पारित होने के बाद बिना किसी कानूनी रोक के राशि रोकने का कोई औचित्य नहीं था। अदालत ने उत्तरदाताओं को आदेश दिया कि वे 14 फरवरी 2022 से 16 फरवरी 2023 यानी 367 दिन की अवधि के लिए याचिकाकर्ताओं को 7.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भुगतान करें। कोर्ट ने इस ब्याज राशि को दो सप्ताह के भीतर जमा करने का निर्देश दिया है। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया गया, तो आदेश की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 18 प्रतिशत प्रति वर्ष की बढ़ी हुई दर से ब्याज देय होगा।
सरकारी पैसा नहीं तो सहकारी सोसायटी में दखल भी नहीं : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने सहकारिता सोसायटियों की स्वायत्तता से जुड़े मामले मे स्पष्ट किया है कि यदि किसी सहकारी सोसायटी में सरकार की वित्तीय हिस्सेदारी या लोन गारंटी मौजूद नहीं है, तो सरकार को उस सोसायटी के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) में अपने प्रतिनिधि या नामांकित सदस्य भेजने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने द सोलन जिला सहकारी विपणन और उपभोक्ता संघ लिमिटेड के निर्वाचित निदेशकों सुंदरम ठाकुर और अन्य की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए 16 मार्च 2026 के सरकारी नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है। अदालत ने सरकार की ओर से मनोनीत किए गए तीनों गैर-सरकारी सदस्यों कमलेश कुमार, जगदीश चंद और गोपाल चंद की नियुक्तियों को शुरू से ही अवैध, शून्य और प्रभावहीन घोषित कर दिया है। याचिकाकर्ता सुंदरम ठाकुर और अन्य 25 नवंबर 2025 को सोलन जिला फेडरेशन के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में चुनकर आए थे। इसके बाद चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के चुनाव को रजिस्ट्रार द्वारा बार-बार टाला गया।
तीनों सदस्यों की सदस्यता को किया निरस्त
इसी बीच सहकारिता विभाग ने 16 मार्च 2026 को एक्ट की धारा 35 का उपयोग कर बोर्ड में तीन बाहरी लोगों को सरकारी नॉमिनी के तौर पर शामिल कर दिया। निर्वाचित निदेशकों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान में इस सोसायटी में सरकार का एक रुपये का भी शेयर नहीं है और न ही कोई सरकारी लोन लंबित है, इसलिए सरकार को बोर्ड में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। सरकार की दलील दी थी कि साल 1964-65 से लेकर 2014 तक इस फेडरेशन में सरकार की 99 फीसदी हिस्सेदारी (लगभग 60 लाख रुपये) रही थी। हालांकि सोसायटी ने 2023-24 तक सरकार का पूरा पैसा वापस कर दिया था, लेकिन भूतकाल में दिए गए वित्तीय सहयोग के कारण सरकार का नियंत्रण बना रहना चाहिए। कोर्ट ने कानून के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा कि एक्ट की धारा 35 में लिखे शब्दों का सीधा मतलब यह है कि सरकार की वित्तीय हिस्सेदारी या गारंटी अधिसूचना जारी होने की तिथि पर सक्रिय और मौजूद होनी चाहिए। यदि कोई पुराना निवेश या लोन सोसायटी ने पूरा चुका दिया है, तो हिस्सेदारी समाप्त होते ही सरकार का नामांकन करने का अधिकार भी स्वतः ही गायब हो जाता है। कोर्ट ने तीनों गैर-सरकारी सदस्यों की सदस्यता को तुरंत प्रभाव से निरस्त कर दिया है। इन नामांकित सदस्यों के विचारों, मताधिकार या प्रभाव के चलते फेडरेशन द्वारा चेयरमैन या किसी अन्य पदाधिकारी को चुनने के लिए लिए गए सभी फैसले तत्काल प्रभाव से रद्द माने जाएंगे। हाई कोर्ट ने सोलन जिला सहकारी फेडरेशन को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह नए सिरे से चेयरमैन और अन्य पदाधिकारियों के पदों के लिए 31 अक्तूबर या उससे पहले निष्पक्ष चुनाव संपन्न करवाए।