{"_id":"660a8fda2a6ac224da0de760","slug":"when-the-floury-goat-ate-the-grass-kullu-news-c-89-1-ssml1015-119785-2024-04-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kullu News: ...जब आटे के बकरे ने खा लिया घास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kullu News: ...जब आटे के बकरे ने खा लिया घास
विज्ञापन
कुल्लू दशहरा से भी पुराना है रैला के मूल उत्सव का इतिहास
1532 ई. में राजा बहादुर सिंह ने आरंभ किया था उत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी
सैंज (कुल्लू)। चैत्र मास के मूल नक्षत्र में सैंज घाटी के रैला के बागी में मनाए जाने वाले मूल उत्सव के आयोजन का इतिहास कुल्लू दशहरा से भी पुराना है। यह उत्सव 1532 ई. में कुल्लू के तत्कालीन राजा बहादुर सिंह के शासनकाल से शुरू हुआ था। उत्सव का इतिहास देवता लक्ष्मी नारायण और कुल्लू रियासत के राजा बहादुर सिंह से जुड़ा हुआ है। राजा का जिक्र यहां की देव भारथा में मिलता है।
देवता के गूर तमेश्वर शर्मा ने कहा कि मान्यता के अनुसार 1532 ई. में देवता लक्ष्मी नारायण का मोहरा चैत्र मास के मूल नक्षत्र को रैला के बागी नामक स्थान में मिला। इसकी जानकारी राजा तक पहुंची। राजा ने बागी की सेरी पर अपना हक जताया, जबकि हारियानों ने राजा को मोहरा न देने का फैसला किया। राजा ने हारियानों के समक्ष शर्त रखी कि मेरा बकरा असली और देवता का बकरा आटे का होगा। इन दोनों बकरों में जो बकरा इस बागी की सेरी में जूब (घास) खाएगा, मोहरा और बागी की सेरी उसी की होगी।
फैसला प्रजा ने स्वीकार किया। देवता के आटे से बने बकरे ने जूब खा लिया। उसी क्षण राजा ने देवता से माफी मांगी और मोहरे, बागी की सेरी समेत सैकड़ों बीघा भूमि देवता लक्ष्मी नारायण को समर्पित कर दी। एलान किया कि चैत्र नक्षत्र के दिन देवता का जन्मदिवस मनाया जाएगा। कारकून रमेश धामी ने कहा कि इस दिन देवता अपने मूल स्थान सर्चणिग्रा से रथ में विराजमान होकर लाव-लश्कर के साथ मेला मैदान (सौह) पहुंचते है। संवाद
विज्ञापन
विज्ञापन
1532 ई. में राजा बहादुर सिंह ने आरंभ किया था उत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी
सैंज (कुल्लू)। चैत्र मास के मूल नक्षत्र में सैंज घाटी के रैला के बागी में मनाए जाने वाले मूल उत्सव के आयोजन का इतिहास कुल्लू दशहरा से भी पुराना है। यह उत्सव 1532 ई. में कुल्लू के तत्कालीन राजा बहादुर सिंह के शासनकाल से शुरू हुआ था। उत्सव का इतिहास देवता लक्ष्मी नारायण और कुल्लू रियासत के राजा बहादुर सिंह से जुड़ा हुआ है। राजा का जिक्र यहां की देव भारथा में मिलता है।
देवता के गूर तमेश्वर शर्मा ने कहा कि मान्यता के अनुसार 1532 ई. में देवता लक्ष्मी नारायण का मोहरा चैत्र मास के मूल नक्षत्र को रैला के बागी नामक स्थान में मिला। इसकी जानकारी राजा तक पहुंची। राजा ने बागी की सेरी पर अपना हक जताया, जबकि हारियानों ने राजा को मोहरा न देने का फैसला किया। राजा ने हारियानों के समक्ष शर्त रखी कि मेरा बकरा असली और देवता का बकरा आटे का होगा। इन दोनों बकरों में जो बकरा इस बागी की सेरी में जूब (घास) खाएगा, मोहरा और बागी की सेरी उसी की होगी।
विज्ञापन
फैसला प्रजा ने स्वीकार किया। देवता के आटे से बने बकरे ने जूब खा लिया। उसी क्षण राजा ने देवता से माफी मांगी और मोहरे, बागी की सेरी समेत सैकड़ों बीघा भूमि देवता लक्ष्मी नारायण को समर्पित कर दी। एलान किया कि चैत्र नक्षत्र के दिन देवता का जन्मदिवस मनाया जाएगा। कारकून रमेश धामी ने कहा कि इस दिन देवता अपने मूल स्थान सर्चणिग्रा से रथ में विराजमान होकर लाव-लश्कर के साथ मेला मैदान (सौह) पहुंचते है। संवाद
विज्ञापन