{"_id":"6245e46642c84f2122442862","slug":"education-kullu-news-sml4042740189","type":"story","status":"publish","title_hn":"महंगी हो गई पढ़ाई, अभिभावकों की जेब पर इस बार दोगुना मार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महंगी हो गई पढ़ाई, अभिभावकों की जेब पर इस बार दोगुना मार
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कुल्लू। हिमाचल प्रदेश में सीमेंट, सरिया और बिजली वायरिंग के बाद अब पढ़ाई पर भी महंगाई की मार पड़ी है। कागजों की कीमतों में बढ़ोतरी होने से दाम बढ़ गए हैं। स्टेशनरी की दुकानों में नए स्टॉक के मुताबिक पिछले वर्ष की तुलना में कॉपी-किताबें 25 से 30 फीसदी तक महंगी हो गई हैं।
पेन कॉपी के साथ रबड़, पेंसिल और शार्पनर के दाम भी 10 से 20 फीसदी तक बढ़ गए हैं। दुकानदारों के अनुसार 164 पेज की कॉपी पहले 30 रुपये में आती थी, जो अब 40 रुपये हो गई है। कोरोना के चलते दो सालों में स्कूली फीस की मार झेल रहे अभिभावकों को इस साल कॉपी-किताबों की कीमतों ने परेशान कर दिया है। हालांकि निजी स्कूलों में बच्चों की फीस को अब तक नहीं बढ़ाया गया है।
कुल्लू के स्टेशनरी संचालक सुरेश कुमार, यशवंत, तेज प्रकाश और शेर सिंह ने बताया कि कॉपियों की कीमतों में दो तरह से बढ़ोतरी की गई है। ब्रांडेड कंपनियों ने कॉपियों के दाम बढ़ाने की अपेक्षा उनके पेज कम कर दिए हैं। लोकल ब्रांड की कंपनियों ने दाम बढ़ाने के साथ कुछ पेजों की संख्या कम कर दी है। 128 पेज की कॉपी 120 पेज की कर दी है।
विज्ञापन
420 पेज की कॉपी 60 से बढ़कर पहुंची 75 रुपये
दुकानदारों के अनुसार 164 पेज की कॉपी पहले 30 रुपये में आती थी, जो अब 40 रुपये तक पहुंच गई है। 28 पेज की कॉपी 10 रुपये में आती थी जो अब 20 पेज की होने के साथ 15 रुपये में आ रही है। वहीं 10 रुपये बाली रॉयल कॉपी पेज कम होने के बाद 15 से 20 रुपये में बेची जा रही है। रफ कॉपी पहले काले पेज की 20 रुपये में आती थी, इसके दाम 25 से 30 रुपये तक पहुंच गए हैं। इसके अलावा 192 पेज की कॉपी 25 से 35 रुपये हो गई है। जो कॉपी 120 पेज की 15 रुपये में पहले आती थी। वह अब 20 से 25 रुपये हो गई है। 312 पेज वाली 40 से 50 रुपये और 420 पेज की कॉपी पहले 60 रुपये में मिलती थी, जो अब 75 रुपये में आ रही है।
अब छह की बजाय चुकाने होंगे 10 से 12 हजार रुपये
अब अभिभावकों को अगले माह से कॉपी-किताबें खरीदने के लिए छह हजार की बजाय 10 से 12 हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे। जिससे घर का बजट भी गड़बड़ा जाएगा। हालांकि किताब जीएसटी से मुक्त है। बता दें कि कागज पर 12 फीसदी व इंक पर 18 फीसदी जीएसटी है जबकि दो साल पहले पांच फीसदी वैट लगता था। जिससे किताबें भी इतनी महंगी नहीं होती थी।
विज्ञापन
पेन कॉपी के साथ रबड़, पेंसिल और शार्पनर के दाम भी 10 से 20 फीसदी तक बढ़ गए हैं। दुकानदारों के अनुसार 164 पेज की कॉपी पहले 30 रुपये में आती थी, जो अब 40 रुपये हो गई है। कोरोना के चलते दो सालों में स्कूली फीस की मार झेल रहे अभिभावकों को इस साल कॉपी-किताबों की कीमतों ने परेशान कर दिया है। हालांकि निजी स्कूलों में बच्चों की फीस को अब तक नहीं बढ़ाया गया है।
विज्ञापन
कुल्लू के स्टेशनरी संचालक सुरेश कुमार, यशवंत, तेज प्रकाश और शेर सिंह ने बताया कि कॉपियों की कीमतों में दो तरह से बढ़ोतरी की गई है। ब्रांडेड कंपनियों ने कॉपियों के दाम बढ़ाने की अपेक्षा उनके पेज कम कर दिए हैं। लोकल ब्रांड की कंपनियों ने दाम बढ़ाने के साथ कुछ पेजों की संख्या कम कर दी है। 128 पेज की कॉपी 120 पेज की कर दी है।
विज्ञापन
420 पेज की कॉपी 60 से बढ़कर पहुंची 75 रुपये
दुकानदारों के अनुसार 164 पेज की कॉपी पहले 30 रुपये में आती थी, जो अब 40 रुपये तक पहुंच गई है। 28 पेज की कॉपी 10 रुपये में आती थी जो अब 20 पेज की होने के साथ 15 रुपये में आ रही है। वहीं 10 रुपये बाली रॉयल कॉपी पेज कम होने के बाद 15 से 20 रुपये में बेची जा रही है। रफ कॉपी पहले काले पेज की 20 रुपये में आती थी, इसके दाम 25 से 30 रुपये तक पहुंच गए हैं। इसके अलावा 192 पेज की कॉपी 25 से 35 रुपये हो गई है। जो कॉपी 120 पेज की 15 रुपये में पहले आती थी। वह अब 20 से 25 रुपये हो गई है। 312 पेज वाली 40 से 50 रुपये और 420 पेज की कॉपी पहले 60 रुपये में मिलती थी, जो अब 75 रुपये में आ रही है।
अब छह की बजाय चुकाने होंगे 10 से 12 हजार रुपये
अब अभिभावकों को अगले माह से कॉपी-किताबें खरीदने के लिए छह हजार की बजाय 10 से 12 हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे। जिससे घर का बजट भी गड़बड़ा जाएगा। हालांकि किताब जीएसटी से मुक्त है। बता दें कि कागज पर 12 फीसदी व इंक पर 18 फीसदी जीएसटी है जबकि दो साल पहले पांच फीसदी वैट लगता था। जिससे किताबें भी इतनी महंगी नहीं होती थी।