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आज व कल रात को निभाई जाएगी अनोखी परंपरा
Updated Fri, 17 Nov 2017 07:38 PM IST
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आज व कल रात को निभाई जाएगी अनोखी परंपरा
उपमंडल के लोग बूढ़ी दिवाली को मनाने के लिए तैयार
अमर उजाला ब्यूरो
बंजार (कुल्लू)। उपमंडल बंजार में बूढ़ी दिवाली का पर्व शनिवार और रविवार की देर रात को धूमधाम से मनाया जाएगा। रविवार की रात को उपमंडल के कई गावों में बूढ़ी दिवाली की धूम रहेगी। मशालें जलाने के साथ नाच गानों का दौर पूरी रात चलता रहेगा।
उपमंडल के गांवों में बूढ़ी दीवाली का पर्व प्रति वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व उपमंडल के शिल्ह, चेथर, गुशैणी, शपनील, हिडव, थाटा, डाहर में मनाया जाता है। लोग इस अवसर पर दिवाली की तरह बाकायदा अपने घरों को सजाते हैं तथा बाजारों में खूब खरीद फरोख्त करते हैं। गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि अमावस्या की रात को कबीरी नामक गीत को इस मौके पर गाया जाता है। इस पर्व के लिए घर का एक एक मर्द विशेष लकड़ी की मशाल जला कर ढोल नगाड़ों की थाप पर गाते व पहाड़ी नृत्य करते हुए एक विशेष स्थान पर एकत्रित होते हैं। वहां पर नाचते हुए उन मशालों का एक अग्नि कुंड जलाया जाता है। उसके चारों और कवीरी गीत का गायन करते हुए नाचते हैं। कहीं कहीं पर उन मशालों को जलाकर पूरे क्षेत्र की परिक्रमा भी करते हैं तथा चेथर में इन मशालों के साथ ऊपर नीचे से एक दूसरे को डराया भी जाता है ताकि भूत प्रेत व अन्य बुरी आत्माएं वहां से दूर चली जाएं तथा क्षेत्र में शांति बनी रहे।
उपमंडल के नवीन, विश्वदेव, मोहर सिंह, विजय, दिलीप व अन्य का कहना है कि यह परंपरा व शास्त्रों में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। इस पर्व के उपलक्ष्य पर पहाड़ी संक्रांति से पहाड़ी नाटी स्वांग तथा गूढ़ रहस्य वाली गाथाओं का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि यदि लोग इस बूढ़ी दिवाली को नहीं मनाने से क्षेत्र के देवी-देवता नाराज हो जाते हैं।
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उपमंडल के लोग बूढ़ी दिवाली को मनाने के लिए तैयार
अमर उजाला ब्यूरो
बंजार (कुल्लू)। उपमंडल बंजार में बूढ़ी दिवाली का पर्व शनिवार और रविवार की देर रात को धूमधाम से मनाया जाएगा। रविवार की रात को उपमंडल के कई गावों में बूढ़ी दिवाली की धूम रहेगी। मशालें जलाने के साथ नाच गानों का दौर पूरी रात चलता रहेगा।
उपमंडल के गांवों में बूढ़ी दीवाली का पर्व प्रति वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व उपमंडल के शिल्ह, चेथर, गुशैणी, शपनील, हिडव, थाटा, डाहर में मनाया जाता है। लोग इस अवसर पर दिवाली की तरह बाकायदा अपने घरों को सजाते हैं तथा बाजारों में खूब खरीद फरोख्त करते हैं। गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि अमावस्या की रात को कबीरी नामक गीत को इस मौके पर गाया जाता है। इस पर्व के लिए घर का एक एक मर्द विशेष लकड़ी की मशाल जला कर ढोल नगाड़ों की थाप पर गाते व पहाड़ी नृत्य करते हुए एक विशेष स्थान पर एकत्रित होते हैं। वहां पर नाचते हुए उन मशालों का एक अग्नि कुंड जलाया जाता है। उसके चारों और कवीरी गीत का गायन करते हुए नाचते हैं। कहीं कहीं पर उन मशालों को जलाकर पूरे क्षेत्र की परिक्रमा भी करते हैं तथा चेथर में इन मशालों के साथ ऊपर नीचे से एक दूसरे को डराया भी जाता है ताकि भूत प्रेत व अन्य बुरी आत्माएं वहां से दूर चली जाएं तथा क्षेत्र में शांति बनी रहे।
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उपमंडल के नवीन, विश्वदेव, मोहर सिंह, विजय, दिलीप व अन्य का कहना है कि यह परंपरा व शास्त्रों में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। इस पर्व के उपलक्ष्य पर पहाड़ी संक्रांति से पहाड़ी नाटी स्वांग तथा गूढ़ रहस्य वाली गाथाओं का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि यदि लोग इस बूढ़ी दिवाली को नहीं मनाने से क्षेत्र के देवी-देवता नाराज हो जाते हैं।
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