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Kangra News: वक्त बदला, बाजार सिमटा, गंगथ की बलटोही ने नहीं खोई चमक
Mon, 21 Apr 2025 01:26 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 21 Apr 2025 01:26 AM IST
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गंगथ (कांगड़ा)। इंदौरा विधानसभा क्षेत्र की उप-तहसील गंगथ, जहां सिद्धपीठ श्री बाबा क्यालू महाराज का मंदिर है। यह सिर्फ आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि पीतल की बलटोहियों के लिए मशहूर बर्तन बाजार भी है। तीन दशक पहले तक यह कस्बा पीतल के बर्तनों का एक बड़ा केंद्र था, जहां सैकड़ों कारीगर हाथ से बलटोही, गागर और बाल्टी आदि बर्तन तैयार करते थे और गांव-गांव जाकर बेचते थे।
समय के साथ बाजारों में रेडीमेड और स्टील के बर्तनों का चलन बढ़ा और कई पारंपरिक भट्ठियां बंद हो गईं। फिर भी, गंगथ की मिट्टी से जुड़ी पांच भट्ठियां आज भी जीवंत हैं, जहां कुशल कारीगर बलटोहियां बना रहे हैं और इनकी मांग आज भी प्रदेश के साथ बाहरी राज्यों में बनी हुई है। खासकर त्योहारी सीजन और विवाह आयोजनों के दौरान इन बर्तनों की बिक्री में जबरदस्त इजाफा होता है।
क्या होती है बलटोही और कैसे बनती है?
बलटोही एक बड़ा मटकेनुमा पीतल का बर्तन होता है, जिसमें धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में पकवान, विशेष रूप से धाम बनाई जाती है।
बनाने की प्रक्रिया
पहले मिट्टी का दो-भागी सांचा तैयार किया जाता है
फिर उसमें पिघला हुआ पीतल डाला जाता है
ठंडा होने पर दोनों भागों को जोड़ा जाता है
तैयार बलटोही को तराशा और चमकाया जाता है
बलटोहियां 10 से लेकर 40 किलो तक की होती हैं और बाजार मूल्य 8,000 से 32,000 रुपये तक होता है।
दंगल में भी इनाम बनती हैं बलटोहियां
गंगथ में हर वर्ष आयोजित होने वाला बाबा क्यालू महाराज का विशाल दंगल उत्तर भारत के प्रमुख दंगलों में शुमार है। इसमें हिमाचल, पंजाब, हरियाणा और विदेशों से पहलवान भाग लेते हैं। विजेताओं को ट्रैक्टर, कार, बाइक और बलटोहियां इनाम में दी जाती हैं।
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कभी गंगथ को बर्तनों का शहर कहा जाता था। अब कारीगर कम हुए हैं, लेकिन जो भी बचे हैं, वो आज भी उच्च गुणवत्ता की बलटोहियां तैयार कर रहे हैं। यहां तैयार बलटोही प्रदेश के साथ बाहरी राज्यों के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। - सुनील गुप्ता, कारोबारी
बलटोही कस्बे का पूरक शब्द हैं। इससे कस्बा को जाना जाता है। बलटोही खरीदनी हो तो सबसे पहले गंगथ का बाजार ही जहन में आता है। यहां कारीगरों की ओर से निर्मित सामान का कहीं पर मुकाबला नहीं है। - जोगिंद्र पाल, कारोबारी
गंगथ में तैयार बलटोही को खरीदने के लिए नजदीकी क्षेत्रों से ही नहीं, दूरदराज से भी ग्राहक आते हैं। हमें गर्व है कि यहां के कस्बे को इस कारोबार के कारण पहचान मिली। - विजय वधावन और लशविंद्र वधावन , कारोबारी
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समय के साथ बाजारों में रेडीमेड और स्टील के बर्तनों का चलन बढ़ा और कई पारंपरिक भट्ठियां बंद हो गईं। फिर भी, गंगथ की मिट्टी से जुड़ी पांच भट्ठियां आज भी जीवंत हैं, जहां कुशल कारीगर बलटोहियां बना रहे हैं और इनकी मांग आज भी प्रदेश के साथ बाहरी राज्यों में बनी हुई है। खासकर त्योहारी सीजन और विवाह आयोजनों के दौरान इन बर्तनों की बिक्री में जबरदस्त इजाफा होता है।
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क्या होती है बलटोही और कैसे बनती है?
बलटोही एक बड़ा मटकेनुमा पीतल का बर्तन होता है, जिसमें धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में पकवान, विशेष रूप से धाम बनाई जाती है।
बनाने की प्रक्रिया
पहले मिट्टी का दो-भागी सांचा तैयार किया जाता है
फिर उसमें पिघला हुआ पीतल डाला जाता है
ठंडा होने पर दोनों भागों को जोड़ा जाता है
तैयार बलटोही को तराशा और चमकाया जाता है
बलटोहियां 10 से लेकर 40 किलो तक की होती हैं और बाजार मूल्य 8,000 से 32,000 रुपये तक होता है।
दंगल में भी इनाम बनती हैं बलटोहियां
गंगथ में हर वर्ष आयोजित होने वाला बाबा क्यालू महाराज का विशाल दंगल उत्तर भारत के प्रमुख दंगलों में शुमार है। इसमें हिमाचल, पंजाब, हरियाणा और विदेशों से पहलवान भाग लेते हैं। विजेताओं को ट्रैक्टर, कार, बाइक और बलटोहियां इनाम में दी जाती हैं।
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कभी गंगथ को बर्तनों का शहर कहा जाता था। अब कारीगर कम हुए हैं, लेकिन जो भी बचे हैं, वो आज भी उच्च गुणवत्ता की बलटोहियां तैयार कर रहे हैं। यहां तैयार बलटोही प्रदेश के साथ बाहरी राज्यों के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। - सुनील गुप्ता, कारोबारी
बलटोही कस्बे का पूरक शब्द हैं। इससे कस्बा को जाना जाता है। बलटोही खरीदनी हो तो सबसे पहले गंगथ का बाजार ही जहन में आता है। यहां कारीगरों की ओर से निर्मित सामान का कहीं पर मुकाबला नहीं है। - जोगिंद्र पाल, कारोबारी
गंगथ में तैयार बलटोही को खरीदने के लिए नजदीकी क्षेत्रों से ही नहीं, दूरदराज से भी ग्राहक आते हैं। हमें गर्व है कि यहां के कस्बे को इस कारोबार के कारण पहचान मिली। - विजय वधावन और लशविंद्र वधावन , कारोबारी