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जिसके जीवन में ईश्वर का प्रकाश नहीं है, उसे भटकने से कोई नहीं रोक सकता : अतुल कृष्ण
Mon, 14 Apr 2025 05:48 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 14 Apr 2025 05:48 AM IST
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रक्कड़ (कांगड़ा)। हमारे रोम-रोम से जब परमात्मा का नाम झंकृत होने लगे तभी भक्ति की सफलता है। बोलने योग्य कुछ और है भी नहीं, न सुनने योग्य कुछ और है। बोलो तो हरि बोलो, चुप रहो तो हरि में ही शांत हो जाओ। भीतर-बाहर जाती श्वास हरि में डूबी रहे, उठो तो हरि में, सोओ तो हरि में। जागृत, स्वप्न, सुसुप्ति सभी अवस्थाओं में जब हरि व्याप्त हो जाता है, ओत-प्रोत हो जाता है, तभी मिलता है। यह अमृतवचन श्रीमद्भागवत कथा के समापन सत्र में अतुल कृष्ण ने चौली में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में ईश्वर का प्रकाश नहीं है, उसे जन्म-जन्मांतर भटकने से कोई नहीं रोक सकता। जिसके जीवन में परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचता, उसका मनुष्य होना सफल हो जाता है। हमारा चकोर मन, परमात्मा रूपी चांद को देखने के लिए व्याकुल हो जाए। हमारे भीतर सोया हुआ चातक, स्वाति की बूंद के लिए तड़पने लगे। हम उस मछली की तरह हो जाएं, जिसका सागर खो गया है। प्रभु के प्रति हमारी इतनी तत्परता वैकुंठ के द्वार खोल देती है।
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उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में ईश्वर का प्रकाश नहीं है, उसे जन्म-जन्मांतर भटकने से कोई नहीं रोक सकता। जिसके जीवन में परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचता, उसका मनुष्य होना सफल हो जाता है। हमारा चकोर मन, परमात्मा रूपी चांद को देखने के लिए व्याकुल हो जाए। हमारे भीतर सोया हुआ चातक, स्वाति की बूंद के लिए तड़पने लगे। हम उस मछली की तरह हो जाएं, जिसका सागर खो गया है। प्रभु के प्रति हमारी इतनी तत्परता वैकुंठ के द्वार खोल देती है।
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