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Kangra News: आसपास के लिए खौफ के साये में चनौर स्कूल, हत्या की दहशत ने रोके नन्हे कदम, 87 में से मात्र 10 बच्चे पहुंचे

Tue, 17 Feb 2026 07:36 AM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा Updated Tue, 17 Feb 2026 07:36 AM IST
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Chanaur school is shrouded in fear, the fear of murder has stopped the children, only 10 out of 87 students have arrived.
रावमापा चनौर के कैंपस में पढ़ाई करते प्राइमरी स्कूल के नन्हे बच्चे। -स्रोत : जागरूक पाठक
देहरागोपीपुर (कांगड़ा)। उपमंडल देहरा के अंतर्गत राजकीय प्राथमिक पाठशाला चनौर में सोमवार का सवेरा आम दिनों जैसा नहीं था। जिस स्कूल के आंगन में बच्चों की चहचहाहट और खिलखिलाहट गूंजती थी, वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। मिड-डे मील वर्कर सुलोचना देवी की हत्या का बाल मन पर इतना गहरा असर पड़ा है कि स्कूल के 87 विद्यार्थियों में से 77 बच्चे डर के मारे घर से बाहर ही नहीं निकले।
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सोमवार को जब स्कूल खुला तो वहां केवल 10 बच्चे ही मौजूद थे। बच्चों के चेहरों पर पसरी दहशत और स्कूल भवन के खाली कमरों ने यह साफ कर दिया कि हत्या के उस खौफनाक मंजर ने उनके कोमल मन पर गहरा आघात पहुंचाया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्कूल प्रशासन ने बड़ा संवेदनशील फैसला लिया है।
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प्राइमरी स्कूल के उस भवन में बैठने से बच्चे बुरी तरह हिचक रहे हैं, जहां खून के धब्बे नृशंस वारदात की गवाही दे रहे थे। बच्चों के भीतर से इस डर को निकालने के लिए प्राइमरी स्कूल के भवन को फिलहाल खाली छोड़ दिया गया है। सोमवार को बच्चों की कक्षाएं साथ लगते राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला (रावमापा) चनौर के कैंपस में एक अलग कमरे में लगाई गईं।
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शिक्षकों ने बच्चों को सामान्य महसूस कराने के लिए उनके साथ संवाद किया, लेकिन स्कूल परिसर में छाई खामोशी उस मनोवैज्ञानिक आघात की पुष्टि कर रही है जो इस हत्याकांड ने पीछे छोड़ा है।



निशान मिटाने की कवायद, दीवारों पर फेरा जा रहा पेंट

वारदात के बाद स्कूल की दीवारों और फर्श पर गिरे खून के धब्बों को साफ करने के साथ-साथ अब पूरे भवन का हुलिया बदलने की कोशिश की जा रही है। प्रशासन ने प्राइमरी विंग के कमरों में तुरंत रंग-रोगन (पेंट) का कार्य शुरू करवा दिया है। इसके पीछे मंशा यह है कि उन दृश्यों को पूरी तरह मिटा दिया जाए, जो बच्चों को उस खौफनाक हादसे की याद दिलाते हैं। शिक्षाविद कर्ण पठानिया के अनुसार कि बच्चों के मस्तिष्क पर दृश्य स्मृतियां लंबे समय तक अंकित रहती हैं। उन धब्बों को मिटाना और माहौल को नया रूप देना बच्चों की मानसिक सेहत के लिए अनिवार्य कदम है।



अभिभावकों का विश्वास जीतना बड़ी चुनौती

77 बच्चों का स्कूल न पहुंचना प्रशासन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि शिक्षक और स्कूल प्रबंधन काउंसलिंग के जरिये बच्चों को वापस लाने में जुटे हैं, लेकिन अभिभावकों के मन में सुरक्षा को लेकर बैठी चिंता अब भी बरकरार है। प्रशासन अब नई पुती दीवारों और बदले हुए वातावरण के जरिये बच्चों के खोए हुए आत्मविश्वास को वापस लाने की कोशिश कर रहा है।



सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक आघात पर सवाल



मिड-डे मील वर्कर की हत्या ने न केवल स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा पर भी बहस छेड़ दी है। चनौर स्कूल हत्याकांड यह बताने के लिए काफी है कि अपराध का असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आने वाली पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह झकझोर देता है।




सोमवार को स्कूल में उपस्थिति काफी कम रही। बच्चों के मन से डर निकालने के लिए हमने रावमापा चनौर के भवन में कक्षाएं संचालित की हैं। हम लगातार अभिभावकों और बच्चों से संवाद कर रहे हैं, ताकि वे सुरक्षित महसूस कर सकें और दोबारा स्कूल लौटें।

-सरिता देवी, सीएचटी, राप्रापा चनौर
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