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कर्मचारी हितों पर आपसी गुटबाजी हावी
Kangra
Updated Mon, 09 Dec 2013 05:44 AM IST
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नूरपुर (कांगड़ा)। कर्मचारी हित से जुड़े मसलों पर आपसी गुटबाजी हावी हो गई है। शायद यही वजह है कि जब से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार सत्तासीन हुई है, तबसे उपमंडल स्तरीय संयुक्त सलाहकार समिति (जेसीसी) की एक अदद बैठक तक नहीं हो पाई है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के दो समांतर गुटों के बीच अंदरखाते चल रही वर्चस्व की जंग में कर्मचारी हितों से जुड़े मुद्दे आपसी खींचतान में फनाह हो गए हैं।
सूबे में भाजपा शासनकाल की तर्ज पर ही वर्तमान कांग्रेस सरकार में भी अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ में चल रहे शह और मात के खेल में मोहरा बना कर्मचारी वर्ग पिस रहा है। लंबे अरसे से समस्याओं का निपटारा न होने से कर्मचारी पसोपेश में हैं लेकिन कर्मचारी नेता तो अपनी-अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। इसी आपसी टकराव के चलते एक कर्मचारी गुट खुद को सरकार का खासमखास करार देते हुए कर्मचारी वर्ग का हितैषी होने का दम भर रहा है तो दूसरा गुट भी कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग का पैरोकार बनकर सरकार से नजदीकियों की दुहाई देता नजर आता है।
बहरहाल, प्रदेश सरकार भी एक गुट की नाराजगी मोल लेने से बचने के लिए दूसरे गुट को मान्यता देने से परहेज करती आ रही है। कहने को तो कर्मचारी वर्ग से जुड़ी तमाम समस्याओं और मुद्दों के समाधान के लिए संयुक्त सलाहकार समिति का गठन किया गया है लेकिन इन समांतर गुटों की आपसी खींचतान के चलते आम कर्मचारी खुद को लाचार महसूस कर रहा है।
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उधर, अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ (जोगटा गुट) के वरिष्ठ उप प्रधान ज्ञान सिंह ठाकुर ने प्रदेश सरकार से लोकतांत्रित प्रणाली से चुने गए कर्मचारी नुमाइंदों के चुनाव पर मान्यता की मोहर लगाकर जेसीसी बैठक बुलाने की अपील की है ताकि कर्मचारी हितों से जुड़े मसलों को सुलझा जा सके।
अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ (मनकोटिया गुट) के वरिष्ठ उप प्रधान शेष राम आजाद कहते हैं कि जब तक सभी कर्मचारी एक मंच पर नहीं आएंगे तक तक कर्मचारी वर्ग के हितों की रक्षा नहीं हो सकती है। सरकार भी कर्मचारी हित में जल्द कोई फैसला ले जिससे आम कर्मचारी हितों की रक्षा हो पाए।
तीन माह बाद होनी चाहिए बैठक
उपमंडल स्तर पर संयुक्त सलाहकार समिति के अध्यक्ष एसडीएम हैं। विभिन्न विभागों के अध्यक्ष समिति के सदस्य बनाए जाते हैं। कायदे से समिति की बैठक हर तीन माह बाद होनी चाहिए लेकिन दो समांतर गुटों की आपसी खींचतान के चलते सरकार ने अभी तक किसी भी एक गुट को मान्यता प्रदान नहीं की है। इसके चलते अभी तक जेसीसी की एक भी बैठक नहीं हो पाई है।
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सूबे में भाजपा शासनकाल की तर्ज पर ही वर्तमान कांग्रेस सरकार में भी अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ में चल रहे शह और मात के खेल में मोहरा बना कर्मचारी वर्ग पिस रहा है। लंबे अरसे से समस्याओं का निपटारा न होने से कर्मचारी पसोपेश में हैं लेकिन कर्मचारी नेता तो अपनी-अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। इसी आपसी टकराव के चलते एक कर्मचारी गुट खुद को सरकार का खासमखास करार देते हुए कर्मचारी वर्ग का हितैषी होने का दम भर रहा है तो दूसरा गुट भी कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग का पैरोकार बनकर सरकार से नजदीकियों की दुहाई देता नजर आता है।
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बहरहाल, प्रदेश सरकार भी एक गुट की नाराजगी मोल लेने से बचने के लिए दूसरे गुट को मान्यता देने से परहेज करती आ रही है। कहने को तो कर्मचारी वर्ग से जुड़ी तमाम समस्याओं और मुद्दों के समाधान के लिए संयुक्त सलाहकार समिति का गठन किया गया है लेकिन इन समांतर गुटों की आपसी खींचतान के चलते आम कर्मचारी खुद को लाचार महसूस कर रहा है।
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उधर, अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ (जोगटा गुट) के वरिष्ठ उप प्रधान ज्ञान सिंह ठाकुर ने प्रदेश सरकार से लोकतांत्रित प्रणाली से चुने गए कर्मचारी नुमाइंदों के चुनाव पर मान्यता की मोहर लगाकर जेसीसी बैठक बुलाने की अपील की है ताकि कर्मचारी हितों से जुड़े मसलों को सुलझा जा सके।
अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ (मनकोटिया गुट) के वरिष्ठ उप प्रधान शेष राम आजाद कहते हैं कि जब तक सभी कर्मचारी एक मंच पर नहीं आएंगे तक तक कर्मचारी वर्ग के हितों की रक्षा नहीं हो सकती है। सरकार भी कर्मचारी हित में जल्द कोई फैसला ले जिससे आम कर्मचारी हितों की रक्षा हो पाए।
तीन माह बाद होनी चाहिए बैठक
उपमंडल स्तर पर संयुक्त सलाहकार समिति के अध्यक्ष एसडीएम हैं। विभिन्न विभागों के अध्यक्ष समिति के सदस्य बनाए जाते हैं। कायदे से समिति की बैठक हर तीन माह बाद होनी चाहिए लेकिन दो समांतर गुटों की आपसी खींचतान के चलते सरकार ने अभी तक किसी भी एक गुट को मान्यता प्रदान नहीं की है। इसके चलते अभी तक जेसीसी की एक भी बैठक नहीं हो पाई है।