Himachal Disaster : सुरंगों-ब्लास्टिंग से जर्जर हो रहे पहाड़, अत्यधिक जल विद्युत दोहन दे रहा खतरे का संकेत
Himachal Disaster :मानकों को ठेंगा दिखा रहे कई प्रोजेक्टों ने संवेदनशील पहाड़ों को गंभीर पर्यावरणीय संकट में डाल दिया है। वर्ष 2024 में बादल फटने की सात घटनाओं में से चार जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों में हुईं थीं। पढ़ें पूरी खबर...
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पन बिजली क्षमता हिमाचल प्रदेश के लिए नेमत है, लेकिन इसका अत्यधिक दोहन पहाड़ों को प्रभावित करने लगा है। चंबा से किन्नौर तक मानकों को ठेंगा दिखा रहे कई प्रोजेक्टों ने संवेदनशील पहाड़ों को गंभीर पर्यावरणीय संकट में डाल दिया है। सुरंगों, अवैज्ञानिक तरीके से ब्लास्टिंग, वन कटान और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप के चलते पहाड़ों की भूगर्भीय स्थिरता कमजोर हो रही है। इससे भूस्खलन, बादल फटने और जलस्रोतों के सूखने जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
वर्ष 2024 में बादल फटने की सात घटनाओं में से चार जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों में हुईं थीं। 2023 में कुल्लू, मलाणा और सैंज घाटी में कई आपदाएं आईं। किन्नौर संघर्ष समिति के अनुसार प्रदेश में कई जलविद्युत परियोजनाओं में पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं किया जा रहा। नदियों में आवश्यक न्यूनतम 10 फीसदी जल प्रवाह भी कई जगहों पर नहीं छोड़ा जा रहा, इससे डाउन स्ट्रीम में पारिस्थितिकी पर संकट गहराता जा रहा है। परियोजनाओं के बीच आवश्यक दूरी बनाए रखने का भी पालन नहीं हो रहा। जलग्रहण क्षेत्रों में ट्रीटमेंट प्लान को भी नजरअंदाज किया जा रहा है।
पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के लिए ग्लोबल ग्रीन ग्रोथ इंस्टीट्यूट की ओर से तैयार रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि जलविद्युत परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में सुधार नहीं हुआ तो प्रदेश को जल, जमीन और जीवन का गंभीर संकट झेलना पड़ सकता है। किन्नौर में चल रहे ‘नो मीन्स नो’ अभियान के सक्रिय सदस्य बुद्ध सेन नेगी बताते हैं कि परियोजनाओं के कारण कई गांव भूस्खलन का दंश झेल रहे हैं। निगुलसरी और उरनी इसके उदाहरण हैं।सतलुज बेसिन पर ही 22 छोटे-बड़े पन बिजली प्रोजेक्ट बन चुके हैं। सतलुज ने 90 के दशक की शुरुआत से राज्य की जलविद्युत महत्वकांक्षा का सबसे बड़ा भार उठाया है।
परियोजनाओं के चलते पानी सुरंगों में डायवर्ट होने कारण करीब 100 किमी तक सतलुज विलुप्त हो गई है। रन-ऑफ-द-रिवर मॉडल के तहत बनाई गईं लंबी सुरंगों ने नदियों के प्रवाह को भूमिगत कर दिया है। इससे स्थानीय जीवनदायिनी स्रोत लुप्त हो रहे हैं। उधर, बिलासपुर-मंडी स्थित कोल डैम पर हुए अध्ययनों से सामने आया कि परियोजना प्रभावित गांवों में कृषि और पशुपालन की आय 40–80 फीसदी तक घट गई है। कई जलस्रोत सूख गए। चंबा जिले में होली-बजोली परियोजना की टेस्टिंग के दौरान जमीन में दरारें आ गईं और घरों में रिसाव शुरू हो गया।
भू वैज्ञानिक आरके शर्मा का कहना है कि हिमाचल का बड़ा भू-भाग भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है। जब जलविद्युत परियोजनाओं के लिए सुरंगें बनाई जाती हैं और अंधाधुंध ब्लास्टिंग होती है। इससे पहाड़ों की स्थिरता और कमजोर हो जाती है। बचाव के लिए हर परियोजना का कड़ा भू वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में ब्लास्टिंग और सुरंग निर्माण नियंत्रित किया जाए। प्राकृतिक जलमार्ग और स्प्रिंग्स की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
बिजली बोर्ड के सेवानिवृत्त प्रबंध निदेशक इंजीनियर पंकज डढवाल का कहना है कि जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान पहाड़ों में ब्लास्टिंग और सुरंगों से मिट्टी और चट्टानों का स्थिरता प्रभावित होती है। इससे भूस्खलन और हिमस्खलन की संभावना बढ़ जाती है। बचाव के लिए सतत पर्यावरणीय प्रबंधन, वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग, और स्थानीय समुदायों को जागरूक करना अनिवार्य है। निर्माण कार्यों में सतर्कता और नियमन का कड़ाई से पालन जरूरी है।
हिमाचली बोनोफाइड ऊर्जा उत्पादक संघ के प्रदेश अध्यक्ष राजेश शर्मा का कहना है कि परियोजनाओं की सुरंगें इतनी गहराई पर बनाई जाती हैं कि उनका बाहरी सतह या भू-भाग पर कोई प्रतिकूल असर नहीं होता। यह निर्माण पद्धति विश्वभर में अपनाई जाती है और सुरक्षित सिद्ध हुई है। इन्हें पर्यावरण की दृष्टि से व्हाइट श्रेणी में रखा गया है। यदि वास्तव में ये परियोजनाएं आपदाओं के लिए जिम्मेदार होतीं, तो 1978 जैसी भीषण बाढ़, जब कोई परियोजना अस्तित्व में नहीं थी, कैसे आई। बचाव के लिए हमें वैज्ञानिक ढंग से आपदा प्रबंधन, भू संरचना की निगरानी और सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा।
प्रदेश में नदियों की विद्युत दोहन की कुल क्षमता 24,550 मेगावाट है। इसमें से 12,433 मेगावाट का दोहन हो चुका है। 1673 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। अगर प्रदेश को तबाही से बचाना है तो अधिक विद्युत दोहन पर तुरंत रोक लगानी होगी। ऐसा नहीं किया गया तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सच साबित हो जाएगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हिमाचल देश के नक्शे से गायब हो जाएगा। ऐसे में सरकार को अब बिजली के बदले गैर पारंपरिक स्रोतों को तलाशना होगा। जहां प्रोजेक्ट बन चुके हैं, वहां पौधरोपण पर जोर देना होगा। प्रोजेक्ट के समस्त क्षेत्र में उचित पानी की निकासी की व्यवस्था और सुरक्षा दीवारें लगानी होंगी। प्रोजेक्टों के बीच निश्चित दूरी को कम से कम तीन किलोमीटर रखना चाहिए। सहायक नदियों में तीन से अधिक प्रोजेक्ट नहीं लगने चाहिए। अगर घाटियां वीरान हो गईं तो पर्यटन कल की बात रह जाएगी। - इंजीनियर आरएल जस्टा, ऊर्जा विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद्