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Hamirpur (Himachal) News: बड़सर अस्पताल में माह के दो दिन ही हो रहे अल्ट्रासाउंड
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बड़सर (हमीरपुर)। सिविल अस्पताल बड़सर में अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यहां रेडियोलाॅजिस्ट का पद पिछले तीन वर्षों से खाली है। स्थायी रेडियोलाॅजिस्ट न होने से जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रतिनियुक्ति पर रेडियोलाॅजिस्ट भेजे जा रहे हैं। इसके चलते मरीजों को माह के महज दो दिन ही अल्ट्रासाउंड की सुविधा मिल पा रही है। आपात स्थिति में मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने के लिए निजी लैबों में भटकना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों विमल दास, राम दास, नरैण सिंह, प्रकाश ठाकुर, अनिल कुमार, राकेश, सावित्री, कमलेश, तनेश कुमारी आदि ने कहा कि बड़सर अस्पताल का निर्माण क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए किया गया था। 2016-17 के दौरान इस अस्पताल का दर्जा बढ़ाकर इसे सिविल अस्पताल कर दिया गया और इसे 50 बिस्तर का बड़ा अस्पताल बनाया गया। सोच तो यही थी कि क्षेत्र के लोगों को बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जाएं लेकिन दर्जा तो बढ़ा दिया गया लेकिन यहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर आज भी वही स्थिति है, जो काफी पहले थी। बड़सर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड की मशीन तो है, लेकिन टेस्ट करने के लिए अस्पताल के पास कोई रेडियोलाॅजिस्ट नहीं है। अस्पताल में अन्य अस्पतालों से प्रतिनियुक्ति पर रेडियोलाॅजिस्ट माह के दो दिन आते हैं। इससे मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहीं, समय पर बारी न आने के कारण महंगे दामों पर निजी लैबों में अल्ट्रासाउंड कराने पड़ते हैं। बड़सर सिविल अस्पताल में पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के 30 पद स्वीकृत हुए थे। इसमें से केवल आठ पद ही भरे हैं और 22 पद अभी भी खाली हैं। वहीं, विशेषज्ञ चिकित्सकों के छह पद स्वीकृत हैं लेकिन यहां एक भी विशेषज्ञ मौजूद नहीं है।
इस बारे में बीएमओ बड़सर डॉ. बृजेश शर्मा ने कहा कि जो रेडियोलाॅजिस्ट अल्ट्रासाउंड करने के लिए आते हैं, उन्हें जिले के अन्य अस्पतालों में जाकर भी अपनी सेवाएं देनी पड़ती हैं। ऐसे में निर्धारित तिथि के आधार पर लोगों को अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाया जाता है। इसकी जानकारी उन्हें पहले दे दी जाती है।
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(समाचार: बवीता चंदेल)
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स्थानीय लोगों विमल दास, राम दास, नरैण सिंह, प्रकाश ठाकुर, अनिल कुमार, राकेश, सावित्री, कमलेश, तनेश कुमारी आदि ने कहा कि बड़सर अस्पताल का निर्माण क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए किया गया था। 2016-17 के दौरान इस अस्पताल का दर्जा बढ़ाकर इसे सिविल अस्पताल कर दिया गया और इसे 50 बिस्तर का बड़ा अस्पताल बनाया गया। सोच तो यही थी कि क्षेत्र के लोगों को बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जाएं लेकिन दर्जा तो बढ़ा दिया गया लेकिन यहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर आज भी वही स्थिति है, जो काफी पहले थी। बड़सर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड की मशीन तो है, लेकिन टेस्ट करने के लिए अस्पताल के पास कोई रेडियोलाॅजिस्ट नहीं है। अस्पताल में अन्य अस्पतालों से प्रतिनियुक्ति पर रेडियोलाॅजिस्ट माह के दो दिन आते हैं। इससे मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहीं, समय पर बारी न आने के कारण महंगे दामों पर निजी लैबों में अल्ट्रासाउंड कराने पड़ते हैं। बड़सर सिविल अस्पताल में पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के 30 पद स्वीकृत हुए थे। इसमें से केवल आठ पद ही भरे हैं और 22 पद अभी भी खाली हैं। वहीं, विशेषज्ञ चिकित्सकों के छह पद स्वीकृत हैं लेकिन यहां एक भी विशेषज्ञ मौजूद नहीं है।
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इस बारे में बीएमओ बड़सर डॉ. बृजेश शर्मा ने कहा कि जो रेडियोलाॅजिस्ट अल्ट्रासाउंड करने के लिए आते हैं, उन्हें जिले के अन्य अस्पतालों में जाकर भी अपनी सेवाएं देनी पड़ती हैं। ऐसे में निर्धारित तिथि के आधार पर लोगों को अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाया जाता है। इसकी जानकारी उन्हें पहले दे दी जाती है।
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(समाचार: बवीता चंदेल)