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बड़सर अस्पताल में न नियमित अल्ट्रासाउंड सुविधा न स्त्री रोग विशेषज्ञ
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बड़सर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड के लिए खड़ी महिलाएं।
- फोटो : Hamirpur-HP
बड़सर (हमीरपुर)। बड़सर अस्पताल में मरीजों को न अल्ट्रासाउंड की सुविधा मिल रही है और न ही महिला मरीजों को यहां स्त्री रोग विशेषज्ञ की सेवाएं मिल रही हैं। यहां पर अल्ट्रासाउंड की सुविधा सप्ताह में केवल दो दिन सोमवार और बुधवार को ही उपलब्ध है। अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने आने वाले लोगों के लिए बैठने की सुविधा भी नहीं है।
बुजुर्ग, महिला और बच्चों समेत सभी मरीजों को अल्ट्रासाउंड कक्ष के बाहर लाइनों में खड़े रहना पड़ता है। खड़े रहने में असमर्थ कुछ लोगों को आसपास सीढ़ियों पर बैठना पड़ता है। बड़सर अस्पताल में इमारतें तो नई-नई बनाई जा रही हैं, लेकिन उन इमारतों में काम करने वाले स्टाफ और लोगों के लिए सुविधा की कमी है, जो हमारे अधूरे विकास की कहानी को हर दिन बयां कर रही हैं।
अल्ट्रासाउंड की सुविधा नियमित तौर पर न मिलने से क्षेत्रवासियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी के अभाव में बहुत सी महिलाओं को खाली हाथ अस्पताल से लौटना पड़ता है। इमरजेंसी में महिलाओं को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। अमर उजाला ने जब सोमवार को अस्पताल में रियालटी चेक किया तो अल्ट्रासाउंड करवाने आए मरीजों ने बताया कि उन्होंने अल्ट्रासाउंड टेस्ट के लिए एक महीना पहले अप्लाई किया था और उन्हें टेस्ट की डेट एक महीना बाद की मिली। ऐसे में अगर किसी को अल्ट्रासाउंड जल्दी करवाना हो तो उसके पास निजी अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
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हैरानी की बात है कि यहां निजी अस्पतालों में नियमित तौर पर अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं। ऐसे में लोगों को सरकारी अस्पताल की बजाए निजी अस्पतालों में जाकर और अधिक पैसा खर्च कर अल्ट्रासाउंड करवाना पड़ता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जो अस्पताल सरकार ने क्षेत्र की जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के लिए बनाया, वह सुविधा केवल कागजों और भाषणों में ही सिमट कर रह गई है।
उधर, बीएमओ बड़सर डॉ. एचआर कालिया ने बताया कि बड़सर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड के लिए रेडियोलॉजिस्ट का सरकार की तरफ से कोई पद स्वीकृत नहीं है। स्थानीय लोगों को अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए रिक्वेस्ट पर अल्ट्रासाउंड के डॉक्टर बुलवाए हैं। बड़सर अस्पताल में सोमवार व बुधवार को अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं।
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बुजुर्ग, महिला और बच्चों समेत सभी मरीजों को अल्ट्रासाउंड कक्ष के बाहर लाइनों में खड़े रहना पड़ता है। खड़े रहने में असमर्थ कुछ लोगों को आसपास सीढ़ियों पर बैठना पड़ता है। बड़सर अस्पताल में इमारतें तो नई-नई बनाई जा रही हैं, लेकिन उन इमारतों में काम करने वाले स्टाफ और लोगों के लिए सुविधा की कमी है, जो हमारे अधूरे विकास की कहानी को हर दिन बयां कर रही हैं।
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अल्ट्रासाउंड की सुविधा नियमित तौर पर न मिलने से क्षेत्रवासियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी के अभाव में बहुत सी महिलाओं को खाली हाथ अस्पताल से लौटना पड़ता है। इमरजेंसी में महिलाओं को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। अमर उजाला ने जब सोमवार को अस्पताल में रियालटी चेक किया तो अल्ट्रासाउंड करवाने आए मरीजों ने बताया कि उन्होंने अल्ट्रासाउंड टेस्ट के लिए एक महीना पहले अप्लाई किया था और उन्हें टेस्ट की डेट एक महीना बाद की मिली। ऐसे में अगर किसी को अल्ट्रासाउंड जल्दी करवाना हो तो उसके पास निजी अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
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हैरानी की बात है कि यहां निजी अस्पतालों में नियमित तौर पर अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं। ऐसे में लोगों को सरकारी अस्पताल की बजाए निजी अस्पतालों में जाकर और अधिक पैसा खर्च कर अल्ट्रासाउंड करवाना पड़ता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जो अस्पताल सरकार ने क्षेत्र की जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के लिए बनाया, वह सुविधा केवल कागजों और भाषणों में ही सिमट कर रह गई है।
उधर, बीएमओ बड़सर डॉ. एचआर कालिया ने बताया कि बड़सर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड के लिए रेडियोलॉजिस्ट का सरकार की तरफ से कोई पद स्वीकृत नहीं है। स्थानीय लोगों को अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए रिक्वेस्ट पर अल्ट्रासाउंड के डॉक्टर बुलवाए हैं। बड़सर अस्पताल में सोमवार व बुधवार को अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं।